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विकास के साथ तीर्थो की मौलिकता सुरक्षित रहे: निश्चलानंद
Updated Wed, 13 Jun 2018 01:04 AM IST
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विकास के साथ तीर्थों की मौलिकता सुरक्षित रहे : निश्चलानंद
मुजफ्फरनगर। गोवर्धन मठ जगन्नाथपुरी, उड़ीसा के पीठाधीश्वर एवं जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने कहा कि तीर्थो का विकास ऐसा होना चाहिए की उसकी मौलिकता सुरक्षित रहे। उन्होंने मनु स्मृति की वर्ण व्यवस्था को उचित बताया। उन्होंने कहा कि यदि जीवन में कामयाब होना है तो धैर्य और संतोष को ग्रहण करना होगा।
नई मंडी में उद्यमी योगेंद्र गर्ग के आवास पर पत्रकारों से वार्ता करते हुए जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने कहा कि मनु स्मृति में समाज की वर्ण व्यवस्था सही थी। चौथे वर्ण के हाथों तमाम कुटीर उद्योग थे, इसलिए वो संपन्न थे। उन्होंने वर्ण व्यवस्था को शरीर की भांति बताते हुए कहा कि यदि शरीर का एक भी हिस्सा न हो तो पूरा शरीर बेकार है। शरीर की भांति ही वर्ण व्यवस्था उचित थी। तीर्थो पर होटलों का उन्होंने विरोध किया। कहा कि तीर्थो का विकास होना चाहिए विनाश नहीं, मगर ऐसा हो रहा है। बड़े शहरों की भांति तीर्थो का विकास किया जा रहा है, जिससे तीर्थ की मौलिकता प्रभावित हो रही है, ऐसा नहीं होना चाहिए। उन्होंने आधुनिक आविष्कारों को भी मानव के लिए उचित नहीं माना, कहा कि यांत्रिक युग में धैर्य और संतोष का विलोप हो रहा है। जबकि मानव में धैर्य की पराकाष्ठा होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि स्वस्थ क्रांति के लिए जितना धैर्य होना चाहिए, वो नहीं है। राजनेताओं में भी धैर्य नहीं है। इस दौरान एडीएम प्रशासन हरीशचंद, पूर्व विधायक अशोक कंसल, राजकुमार नरुला, पंडित संजीव शर्मा, प्रवीण जैन आदि मौजूद रहे।
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मुजफ्फरनगर। गोवर्धन मठ जगन्नाथपुरी, उड़ीसा के पीठाधीश्वर एवं जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने कहा कि तीर्थो का विकास ऐसा होना चाहिए की उसकी मौलिकता सुरक्षित रहे। उन्होंने मनु स्मृति की वर्ण व्यवस्था को उचित बताया। उन्होंने कहा कि यदि जीवन में कामयाब होना है तो धैर्य और संतोष को ग्रहण करना होगा।
नई मंडी में उद्यमी योगेंद्र गर्ग के आवास पर पत्रकारों से वार्ता करते हुए जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने कहा कि मनु स्मृति में समाज की वर्ण व्यवस्था सही थी। चौथे वर्ण के हाथों तमाम कुटीर उद्योग थे, इसलिए वो संपन्न थे। उन्होंने वर्ण व्यवस्था को शरीर की भांति बताते हुए कहा कि यदि शरीर का एक भी हिस्सा न हो तो पूरा शरीर बेकार है। शरीर की भांति ही वर्ण व्यवस्था उचित थी। तीर्थो पर होटलों का उन्होंने विरोध किया। कहा कि तीर्थो का विकास होना चाहिए विनाश नहीं, मगर ऐसा हो रहा है। बड़े शहरों की भांति तीर्थो का विकास किया जा रहा है, जिससे तीर्थ की मौलिकता प्रभावित हो रही है, ऐसा नहीं होना चाहिए। उन्होंने आधुनिक आविष्कारों को भी मानव के लिए उचित नहीं माना, कहा कि यांत्रिक युग में धैर्य और संतोष का विलोप हो रहा है। जबकि मानव में धैर्य की पराकाष्ठा होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि स्वस्थ क्रांति के लिए जितना धैर्य होना चाहिए, वो नहीं है। राजनेताओं में भी धैर्य नहीं है। इस दौरान एडीएम प्रशासन हरीशचंद, पूर्व विधायक अशोक कंसल, राजकुमार नरुला, पंडित संजीव शर्मा, प्रवीण जैन आदि मौजूद रहे।
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