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सपा का साथ छोड़ते दिखे मुसलमान
Updated Mon, 27 Nov 2017 12:46 AM IST
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सपा का साथ छोड़ते दिखे मुसलमान
मुजफ्फरनगर। निकाय चुनाव में मुस्लिम मतदाताओं ने अंतिम वक्त तक भी अपने दिलों के राज नहीं खोले। संसदीय और विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव के साथ खड़े रहने वाले मुस्लिम पालिका चुनाव में सपा का साथ छोड़ते दिखाई दिए। सपा की साइकिल पीछे छूट गई और मुस्लिमों ने हाथ के पंजे को थाम लिया। बसपा प्रत्याशी को मुस्लिम होने का भी अधिक सियासी फायदा नहीं हो पाया।
नगर पालिका चुनाव में मुस्लिम मतदाताओं ने अपने मन की बात अंतिम क्षणों तक बाहर नहीं आने दी। वोट करने के बाद भी पूरी तरह से लबों पर खामोशी रखी। सियासी दलों के साथ समर्थकों ने भी खूब पैरोकारी कर राज जानने के लिए जद्दोजहद की। हालांकि चुनाव परिणाम तय करने में मुस्लिम वोटर मुख्य भूमिका में खड़े हैं। अब तक साइकिल चलाने वाले मुस्लिम वोटरों में लोकसभा-विधानसभा चुनाव जैसा माहौल नहीं दिखा। पालिका चुनाव में मुस्लिम सपा का साथ छोड़ते दिखाई दिए। दंगा प्रभावित जनपद में वर्ष 2014 में सपा को एकतरफा मुस्लिम वोट मिले थे। ऐसा ही हाल 2017 विधानसभा चुनाव में रहा है। मुस्लिमों पर अखिलेश का जादू बरकरार रहा। पालिका चुनाव में मुस्लिम साइकिल से दूर होते नजर आ रहे हैं। अधिकांश क्षेत्रों में मुस्लिमों ने साइकिल की सवारी से उतरकर हाथ का पंजा थाम लिया। हाथ का पंजा थोक में मुस्लिमों में सेंधमारी करने में सफल रहा। वहीं, अन्य जनपदों की तरह बसपा को यहां भी दलित-मुस्लिम फैक्टर की उम्मीदें थीं, जिसके चलते शहर सीट पर बसपा ने मुस्लिम प्रत्याशी रखा, लेकिन उसे मुस्लिम होने का भी अधिक लाभ मिलता नहीं दिख रहा है। शहर सीट पर करीब आधा दर्जन मुस्लिम क्षेत्र प्रत्याशी की हार-जीत तय करने में सबसे अहम रहेंगे। मुस्लिमों के बदले मिजाज से सियासी दलों की बेचैनी बढ़ गई है, जबकि मुस्लिमों का बिखराव कइयों का गणित बिगाड़ सकता है। भले ही मुस्लिम वोटरों ने अपने मन के राज खोलने से गुरेज रखा हो, मगर इतना जरुर है कि मुस्लिमों के बदले मिजाज से 2019 की तस्वीर की झलक दिख रही है। निकाय चुनाव का असर लोकसभा पर भी पड़ सकता है।
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मुजफ्फरनगर। निकाय चुनाव में मुस्लिम मतदाताओं ने अंतिम वक्त तक भी अपने दिलों के राज नहीं खोले। संसदीय और विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव के साथ खड़े रहने वाले मुस्लिम पालिका चुनाव में सपा का साथ छोड़ते दिखाई दिए। सपा की साइकिल पीछे छूट गई और मुस्लिमों ने हाथ के पंजे को थाम लिया। बसपा प्रत्याशी को मुस्लिम होने का भी अधिक सियासी फायदा नहीं हो पाया।
नगर पालिका चुनाव में मुस्लिम मतदाताओं ने अपने मन की बात अंतिम क्षणों तक बाहर नहीं आने दी। वोट करने के बाद भी पूरी तरह से लबों पर खामोशी रखी। सियासी दलों के साथ समर्थकों ने भी खूब पैरोकारी कर राज जानने के लिए जद्दोजहद की। हालांकि चुनाव परिणाम तय करने में मुस्लिम वोटर मुख्य भूमिका में खड़े हैं। अब तक साइकिल चलाने वाले मुस्लिम वोटरों में लोकसभा-विधानसभा चुनाव जैसा माहौल नहीं दिखा। पालिका चुनाव में मुस्लिम सपा का साथ छोड़ते दिखाई दिए। दंगा प्रभावित जनपद में वर्ष 2014 में सपा को एकतरफा मुस्लिम वोट मिले थे। ऐसा ही हाल 2017 विधानसभा चुनाव में रहा है। मुस्लिमों पर अखिलेश का जादू बरकरार रहा। पालिका चुनाव में मुस्लिम साइकिल से दूर होते नजर आ रहे हैं। अधिकांश क्षेत्रों में मुस्लिमों ने साइकिल की सवारी से उतरकर हाथ का पंजा थाम लिया। हाथ का पंजा थोक में मुस्लिमों में सेंधमारी करने में सफल रहा। वहीं, अन्य जनपदों की तरह बसपा को यहां भी दलित-मुस्लिम फैक्टर की उम्मीदें थीं, जिसके चलते शहर सीट पर बसपा ने मुस्लिम प्रत्याशी रखा, लेकिन उसे मुस्लिम होने का भी अधिक लाभ मिलता नहीं दिख रहा है। शहर सीट पर करीब आधा दर्जन मुस्लिम क्षेत्र प्रत्याशी की हार-जीत तय करने में सबसे अहम रहेंगे। मुस्लिमों के बदले मिजाज से सियासी दलों की बेचैनी बढ़ गई है, जबकि मुस्लिमों का बिखराव कइयों का गणित बिगाड़ सकता है। भले ही मुस्लिम वोटरों ने अपने मन के राज खोलने से गुरेज रखा हो, मगर इतना जरुर है कि मुस्लिमों के बदले मिजाज से 2019 की तस्वीर की झलक दिख रही है। निकाय चुनाव का असर लोकसभा पर भी पड़ सकता है।
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