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गोली लगने के बाद दुश्मनों के छक्के छुड़ा दिए थे कैप्टन अखिलेश सक्सेना ने

Moradabad  Bureau मुरादाबाद ब्यूरो
Updated Mon, 26 Jul 2021 01:54 AM IST
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Police accused of beating minors, uproar at the post
मुरादाबाद। कारगिल का मोर्चा फतह करने में देश के 527 वीर सपूतों को अपनी जान की कुर्बानी देनी पड़ी थी। इस लड़ाई में हजारों जवान घायल भी हुए थे, जो आज भी बड़े गर्व के साथ कहते हैं कि हां, हमने कारगिल का मोर्चा फतह किया था। कारगिल की लड़ाई में अदम्य साहस का प्रदर्शन करने वालों में मुरादाबाद के लाल कैप्टन अखिलेश सक्सेना का नाम भी शामिल है, जो घायल होने के बाद भी घंटों दुश्मन से लोहा लेते रहे थे।
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कैप्टन सक्सेना जब कारगिल मोर्चे पर पहुंचे थे उससे एक महीने पहले ही उनकी शादी हुई थी। जब लड़ाई शुरू हुई तो देश की आन-बान की रक्षा करने के लिए मोर्चे पर पहुंच गए। दो राजपूताना राइफल्स में कैप्टन के पद पर तैनात रहे अखिलेश सक्सेना ने बताया कि हमारी बटालियन 30 मई को वहां पहुंच गई थी। वहां की परिस्थितियां बहुत की विषम थीं। दुश्मन कहां छिपकर बैठा है इस बात का अंदाजा लगाना मुश्किल था। हम नीचे थे और दुश्मन ऊपर। तापमान भी माइनस 38 से 42 डिग्री के बीच में था। ऐसे में सांस लेना भी मुश्किल हो रहा था। हमारे पास स्नो बूट और टेंट भी नहीं थे। रात में दुश्मन पर नजर रखने के उपकरण भी नहीं थी। कारगिल में जो चट्टान हैं वो बिल्कुल सपाट हैं। ऐसे में दुश्मन की नजर से छिपना मुश्किल भी था। पहाड़ी के ऊपर हम रस्सी के सहारे ही चढ़ सकते थे, जिसमें काफी खतरा था। उन्होंने बताया कि इसके बाद भी हमने दुश्मन को मुंह तोड़ जवाब दिया था। दो राजपूताना राइफल्स ने तोलोलिंग का मोर्चा फतह कर लिया था। इसके बाद थ्री पिंपल्स की बारी थी।
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कैप्टन अखिलेश सक्सेना ने बताया कि 29 जून को उनकी बटालियन ने थ्री पिंपल्स के मोर्चे को फतह करने के लिए चढ़ाई शुरू की थी। दोनों तरफ से गोलीबारी हो रही थी। बटालियन की आर्टलरी की कमान उनके हाथ में थी। उन्होंने बताया कि हमारे जवानों ने केसरिया बाना पहन लिया था। शपथ ली थी या तो जीतेंगे या फिर वापस नहीं आएंगे। गोलीबारी के बीच कैप्टन सक्सेना के हाथ और पैर में गोली लग गई। गोली लगने के बाद भी उन्होंने अपने साथियों को इस बात का पता नहीं चलने दिया। खुद ही पट्टी बांधकर खून रोकने की कोशिश की। कैप्टन का कहना है कि अगर हमारे जवानों को पता चल जाता कि हमारा अधिकारी घायल हो गया है तो उनके हौसले पस्त हो जाते थे।
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उन्होंने बताया कि कई घंटे तक घायलावस्था में लड़ाई लड़ने के दौरान अधिक खून बह जाने की वजह से वह बेहोश हो गए। इसके बाद साथियों ने पानी डालकर होश में लाया। इसके बाद कैप्टन लगभग आठ किलोमीटर तक पैदल चले तब जाकर उनको प्राथमिक उपचार मिला। इसके बाद उनको हेलीकाप्टर से पहले श्रीनगर ले जाया गया। उनका इलाज श्रीनगर और दिल्ली के अस्पताल में लगभग नौ महीने तक चला। कैप्टन सक्सेना का कहना है कि हमने थ्री पिंपल्स के मोर्चे को फतह कर लिया था। अस्पताल में इलाज के दौरान कैप्टन को पता चला था कि भारतीय सेना ने कारगिल की लड़ाई जीत ली है। उनका कहना है कि कारगिल की लड़ाई जीतने की खुशी तो बहुत है, लेकिन इस बात का गम भी है कि हमने अपने कई साथियों को खो दिया।

एमबीए करके बने बहुराष्ट्रीय कंपनी में अधिकारी
मुरादाबाद। कारगिल की लड़ाई में गंभीर रूप से घायल अखिलेश सक्सेना सेना को अपनी सेवाएं देने की स्थिति में नहीं थे। ऐसे में उन्होंने एमबीए की परीक्षा पास की। एमबीए करने के बाद उन्होंने एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में नौकरी हासिल की। वर्तमान में वो एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट के पद पर कार्यरत हैं।
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