एक्सप्लेनर: जिस वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर 25 साल पहले हुआ आतंकी हमला, वो बना कैसे था; गिरने के बाद वहां क्या हुआ?
वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के ट्विन टावर्स कभी न्यूयॉर्क की पहचान और आधुनिक इंजीनियरिंग की मिसाल थे। 110 मंजिला इन टावरों ने दुनिया का ध्यान खींचा, लेकिन 11 सितंबर 2001 के आतंकी हमले ने सब कुछ बदल दिया। आज उसी जगह नया वर्ल्ड ट्रेड सेंटर खड़ा है। आखिर कैसे बना था ये ऐतिहासिक परिसर और हमले के बाद कैसे बदली इसकी तस्वीर? आइए जानते हैं।
विस्तार
न्यूयॉर्क के आसमान पर कभी 110 मंजिला दो टावर खड़े थे, जो कुछ समय के लिए दुनिया की सबसे ऊंची इमारतें रहे। वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के ये ट्विन टावर्स अपनी ऊंचाई के साथ आधुनिक इंजीनियरिंग और अंतरराष्ट्रीय कारोबार की महत्वाकांक्षा का प्रतीक बन गए। लेकिन करीब तीन दशक बाद, 11 सितंबर 2001 के आतंकी हमले में दोनों टावर ढह गए। आज उसी 9/11 के 25 साल पूरे हो गए हैं।
आखिर वर्ल्ड ट्रेड सेंटर का विचार कहां से आया? इसकी पूरी योजना कैसे बनी? जमीन से आसमान तक ये टावर कैसे खड़े किए गए? हमले के बाद उस जगह का क्या हुआ? आइये जानते हैं...
वर्ल्ड ट्रेड सेंटर बनाने का विचार कहां से आया?
वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की योजना अचानक नहीं बनी थी। 1960 में डाउनटाउन-लोअर मैनहैटन एसोसिएशन ने लोअर मैनहैटन में एक बड़े अंतरराष्ट्रीय व्यापार केंद्र की संभावना पर काम शुरू कराया। इसके बाद न्यूयॉर्क और न्यू जर्सी के नेताओं ने पोर्ट ऑफ न्यूयॉर्क अथॉरिटी से इस परियोजना की व्यवहारिकता का अध्ययन करने को कहा।
पोर्ट अथॉरिटी ने मार्च 1961 में अपनी रिपोर्ट में इस तरह के व्यापार केंद्र को आर्थिक रूप से संभव माना। शुरुआत में इसे मैनहैटन के पूर्वी हिस्से में बनाने की योजना थी, लेकिन बाद में जगह बदलकर पश्चिमी हिस्से में कर दी गई। इसकी एक बड़ी वजह वहां मौजूद हडसन एंड मैनहैटन रेलरोड टर्मिनल को परियोजना के साथ जोड़ना था।
27 मार्च 1962 को न्यूयॉर्क और न्यू जर्सी ने ऐसी परियोजना के लिए जरूरी कानून को मंजूरी दी। इसके बाद पोर्ट अथॉरिटी ने हडसन एंड मैनहैटन रेलरोड की संपत्तियां हासिल करना शुरू किया। 1965 तक प्रस्तावित साइट की बाकी संपत्तियां भी खरीदी जा चुकी थीं।
पहले 70 मंजिल का विचार था, फिर दो 110 मंजिला टावर बने
शुरुआती विचार मूर्त रूप में दिखने वाले ट्विन टावर्स जैसा नहीं था। परियोजना के शुरुआती चरण में करीब 70 मंजिला एक टावर बनाने का विचार था। बाद में योजना को बढ़ाया गया और दो 110 मंजिला टावरों का डिजाइन तैयार किया गया।
वास्तुकार मिनोरू यामासाकी और एमरी रोथ एंड सन्स ने परियोजना के डिजाइन पर काम किया। पोर्ट अथॉरिटी के दस्तावेज के अनुसार, दोनों टावरों को परियोजना की सबसे प्रमुख पहचान के तौर पर रखा गया था।
9/11 मेमोरियल के अनुसार, ट्विन टावर्स को दुनिया की सबसे ऊंची इमारतें बनाने के उद्देश्य से डिजाइन किया गया था। इसके लिए उस समय ऊंची इमारतों के निर्माण की नई तकनीकों का इस्तेमाल किया गया।
कितनी ऊंचाई का अनुमान लगाया गया था?
1968 के पोर्ट अथॉरिटी के आधिकारिक दस्तावेज में दोनों टावरों की ऊंचाई करीब 1,350 फीट बताई गई थी। दोनों को 110 मंजिला बनाने की योजना थी। निर्माण पूरा होने के बाद वास्तविक ऊंचाई थोड़ी अलग रही;
- नॉर्थ टावर: 1,368 फीट
- साउथ टावर: 1,362 फीट
- दोनों टावर: 110 मंजिल
- प्रत्येक टावर का आधार: करीब 209 × 209 फीट
नॉर्थ टावर पर बाद में एंटीना भी लगाया गया, जिससे उसकी कुल ऊंचाई लगभग 1,728 फीट तक पहुंच गई।
इतनी ऊंची इमारत बनाने के लिए जमीन कैसे तैयार हुई?
वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की साइट की एक बड़ी खासियत यह थी कि यह प्राकृतिक रूप से मजबूत जमीन पर नहीं थी। लोअर मैनहैटन का यह इलाका बड़े पैमाने पर जमीन भरकर यानी लैंडफिल के जरिए विकसित हुआ था। इसलिए इतनी ऊंची इमारतों की नींव को मजबूत चट्टान यानी बेडरॉक तक पहुंचाना जरूरी था। 9/11 मेमोरियल के अनुसार, बेडरॉक सड़क की सतह से करीब 70 फीट नीचे था।
निर्माण के दौरान साइट से 10 लाख घन गज से ज्यादा मिट्टी और चट्टान निकाली गई। इस सामग्री का इस्तेमाल हडसन नदी के किनारे बैटरी पार्क सिटी के लिए जमीन तैयार करने में भी किया गया।
नदी के पानी को रोकने के लिए बनी भूमिगत दीवार
साइट हडसन नदी के पास थी। इतनी गहरी खुदाई करने पर नदी का पानी निर्माण क्षेत्र में आने का खतरा था। इससे निपटने के लिए स्लरी वॉल तकनीक का इस्तेमाल किया गया।
जमीन में गहरी खाइयां बनाई गईं और उन्हें विशेष मिट्टी-पानी के मिश्रण से भरा गया। इसके बाद उनमें स्टील के सुदृढ़ीकरण के साथ कंक्रीट डाली गई। इससे एक मजबूत भूमिगत दीवार बनी।
इस दीवार में 158 पैनल थे। प्रत्येक पैनल करीब 3 फीट मोटा, 22 फीट चौड़ा और लगभग 70 से 80 फीट गहरा था। पूरी दीवार करीब 3,500 फीट लंबी थी और उसने साइट के बड़े हिस्से को घेर रखा था। इसके बाद अंदर की मिट्टी और चट्टान निकालकर बेडरॉक तक पहुंचा गया। यही भूमिगत हिस्सा आगे टावरों की नींव का आधार बना।
निर्माण कब शुरू हुआ और कितना समय लगा?
वर्ल्ड ट्रेड सेंटर का निर्माण 5 अगस्त 1966 को शुरू हुआ। शुरुआत के लगभग दो वर्षों में ज्यादातर काम जमीन के नीचे हुआ। 1968 में ट्विन टावर्स का ऊर्ध्वाधर निर्माण तेजी से ऊपर बढ़ना शुरू हुआ।
वर्ल्ड ट्रेड सेंटर तारीखों में
- 5 अगस्त 1966 को निर्माण शुरू हुआ।
- 1968 को टावरों का ऊर्ध्वाधर निर्माण शुरू हुआ।
- दिसंबर 1970 में नॉर्थ टावर पूरा हुआ।
- जुलाई 1971 में साउथ टावर पूरा हुआ।
- 4 अप्रैल 1973 को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर का आधिकारिक तौर पर शुरू हुआ।
निर्माण में कितने लोग लगे?
1968 के पोर्ट अथॉरिटी दस्तावेज में अनुमान लगाया गया था कि पूरे प्रोजेक्ट में करीब 20,000 से 30,000 मानव-वर्ष का काम होगा। निर्माण के सबसे व्यस्त दौर में एक समय पर करीब 7,000 से 8,000 लोग काम कर सकते थे।
अनुमानित लागत कितनी थी?
पीबीएस के अनुसार, वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की निर्माण लागत शुरुआती 57.5 करोड़ डॉलर के अनुमान से बढ़कर 1973 में कॉम्प्लेक्स खुलने तक करीब 80 करोड़ डॉलर पहुंच गई थी। इनमें नींव, भूमिगत दीवार, लिफ्ट और एस्केलेटर, स्टील और बाहरी एल्यूमिनियम दीवारों से जुड़े काम शामिल थे।
टावरों का ढांचा इतना अलग क्यों था?
ट्विन टावर्स की सबसे खास इंजीनियरिंग उनकी बाहरी संरचना थी। एनआईएसटी के अनुसार, टावरों में चार प्रमुख संरचनात्मक हिस्से थे;
- बाहरी ढांचा
- केंद्रीय ढांचा
- फर्श की संरचना
- ऊपरी हैट ट्रस
बाहरी हिस्से को इस तरह डिजाइन किया गया था कि वह हवा से पैदा होने वाले क्षैतिज दबाव को संभाल सके। इसे फ्रेम्ड-ट्यूब संरचना कहा गया। इसका फायदा यह था कि अंदर बहुत ज्यादा स्तंभ लगाने की जरूरत नहीं पड़ती थी और बड़े खुले कार्यालय क्षेत्र बनाए जा सकते थे।
बाहर से दिखने वाले स्तंभ कैसे लगाए गए थे?
1968 के दस्तावेज के अनुसार, टावर के निचले हिस्से में बाहरी स्तंभ करीब 10 फीट के अंतर पर थे। करीब 40 फीट की ऊंचाई पर ये तीन-तीन स्तंभों में विभाजित हो जाते थे। इनके बीच करीब 3 फीट 4 इंच की दूरी थी। इन स्तंभों के बीच फर्श से छत तक की खिड़कियां थीं, जिनकी चौड़ाई करीब 22 इंच थी। ऊपर जाते-जाते स्तंभ एक खास सजावटी ढांचे में समाप्त होते थे।
अंदर का ढांचा कैसे काम करता था?
टावर के बीच में केंद्रीय कोर था। इसमें लिफ्ट, सीढ़ियां और दूसरी जरूरी सुविधाएं थीं। फर्शों में स्टील ट्रस और कंक्रीट स्लैब की संयुक्त व्यवस्था थी। एनआईएसटी के अनुसार, ज्यादातर किरायेदार फर्शों में स्टील ट्रस कंक्रीट स्लैब के साथ मिलकर काम करते थे। इससे बड़े खुले कार्यालय क्षेत्र बनाना संभव हुआ। यानी इमारत का भार सिर्फ बीच के हिस्से पर नहीं था। बाहरी स्टील ढांचा भी संरचना का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा था।
इतनी ऊंची इमारत हवा में कैसे स्थिर रहती थी?
110 मंजिला टावर के लिए हवा सबसे बड़ी इंजीनियरिंग चुनौतियों में से एक थी। डिजाइन में हवा के दबाव को विशेष रूप से ध्यान में रखा गया। तेज हवा में टावरों का ऊपरी हिस्सा अगल-बगल करीब 12 इंच तक झूल सकता था। यह झूलना इमारत के कमजोर होने का संकेत नहीं था, बल्कि इतनी ऊंची इमारत के हवा के दबाव के साथ नियंत्रित तरीके से हिलने का हिस्सा था।
टावरों में लिफ्ट की व्यवस्था भी अनोखी थी
110 मंजिला इमारत में हर मंजिल तक अलग लिफ्ट चलाने से काफी जगह लिफ्ट शाफ्ट में चली जाती। इसलिए ट्विन टावर्स में एक्सप्रेस और स्थानीय लिफ्ट की व्यवस्था बनाई गई।
टावरों को तीन लिफ्ट क्षेत्रों में बांटा गया था। यात्रियों को एक्सप्रेस लिफ्ट से एक निश्चित स्तर तक ले जाया जाता और वहां से स्थानीय लिफ्ट के जरिए अपनी मंजिल तक पहुंचाया जाता। इन स्तरों को स्काई लॉबी कहा गया। इससे लिफ्ट शाफ्ट की संख्या कम हुई और ऑफिस के लिए ज्यादा जगह उपलब्ध हुई। अंतिम रूप में दोनों टावरों में कुल 198 लिफ्ट थीं और लिफ्ट शाफ्ट की कुल लंबाई करीब 15 मील थी। एक एक्सप्रेस लिफ्ट में करीब 55 वयस्क आ सकते थे।
टावरों में कितना स्टील और कंक्रीट लगा?
यह परियोजना स्टील और कंक्रीट के इस्तेमाल के लिहाज से भी बहुत बड़ी थी। 1968 के पोर्ट अथॉरिटी दस्तावेज में दो टावरों और ग्रीनविच स्ट्रीट के पश्चिम के भूमिगत हिस्सों के लिए 1,92,000 टन स्टील की निर्माण और स्थापना का उल्लेख था।
बाद के आधिकारिक आंकड़े पूरे वर्ल्ड ट्रेड सेंटर निर्माण के लिए दो लाख टन से ज्यादा संरचनात्मक स्टील बताते हैं। कम से कम सात कारखानों ने यह स्टील उपलब्ध कराया था। पूरे वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के निर्माण में 4,25,000 घन गज से ज्यादा कंक्रीट इस्तेमाल हुआ। टावरों में करीब 43,600 खिड़कियां थीं और उनके शीशे का कुल क्षेत्रफल छह लाख वर्ग फीट से ज्यादा था।
बाहर से कैसी दिखती थी पूरी इमारत?
ट्विन टावर्स के अलावा पांच एकड़ का विशाल प्लाजा था। प्लाजा के आसपास कम ऊंचाई वाली इमारतें थीं। पोर्ट अथॉरिटी के दस्तावेज में यूएस कस्टम्स बिल्डिंग, नॉर्थईस्ट और साउथईस्ट प्लाजा बिल्डिंग और वर्ल्ड ट्रेड इंफॉर्मेशन सेंटर व होटल का उल्लेख है। प्लाजा के नीचे एक बड़ा कॉनकोर्स था, जो पूरे परिसर का मुख्य पैदल मार्ग था और पीएटीएच तथा न्यूयॉर्क की सबवे व्यवस्था से जुड़ता था।
2001 तक पूरे वर्ल्ड ट्रेड सेंटर परिसर में सात इमारतें थीं और यहां 430 से ज्यादा कंपनियां तथा 28 देशों से जुड़ी कारोबारी संस्थाएं मौजूद थीं। परिसर में करीब एक करोड़ वर्ग फीट किराये योग्य कार्यालय क्षेत्र था।
11 सितंबर 2001 को क्या हुआ?
11 सितंबर 2001 की सुबह अमेरिका में चार यात्री विमानों को आतंकवादियों ने हाईजैक किया। इनमें से दो विमानों को न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के ट्विन टावर्स से टकराया गया। इस हमले में 2997 लोगों की मौत हो गई। इसी हमले की जिम्मेदारी आतंकवादी संगठन अल-कायदा ने ली थी।
- सुबह 8:46 बजे अमेरिकन एयरलाइंस की फ्लाइट 11 नॉर्थ टावर से टकराई।
- सुबह 9:02 बजे यूनाइटेड एयरलाइंस की फ्लाइट 175 साउथ टावर से टकराई।
दोनों टावर विमान के टकराने के तुरंत बाद नहीं गिरे। उनकी मजबूत संरचना ने शुरुआती प्रभाव के बाद भी कुछ समय तक भार को दूसरे हिस्सों में बांटकर इमारत को खड़ा रखा। लेकिन विमान की टक्कर से स्टील के कई स्तंभ क्षतिग्रस्त हुए और कई जगह स्टील पर लगी फायरप्रूफिंग हट गई। विमान का ईंधन कई मंजिलों पर फैल गया और भीषण आग लग गई।
क्या आग में स्टील पिघल गया था?
एनआईएसटी की जांच के अनुसार, टावरों के ढहने के लिए स्टील का पिघलना जरूरी नहीं था। विमान की टक्कर से फायरप्रूफिंग हट गई थी और उसके बाद कई मंजिलों पर लगी भीषण आग ने स्टील और फर्श की संरचना को कमजोर किया।
गर्मी के कारण फर्श झुकने लगे। इन झुके हुए फर्शों ने बाहरी स्तंभों को अंदर की ओर खींचा। जब बाहरी स्तंभ अपना भार संभालने की स्थिति में नहीं रहे, तो ऊपर का हिस्सा नीचे की ओर ढहना शुरू हुआ।
कौन सा टावर पहले गिरा?
- साउथ टावर पर हमला नॉर्थ टावर के बाद हुआ था, लेकिन वह पहले ढहा।
- सुबह 9:58 बजे साउथ टावर गिर गया, विमान की टक्कर के करीब 56 मिनट बाद।
- इसके बाद सुबह 10:28 बजे नॉर्थ टावर ढह गया, विमान की टक्कर के करीब 102 मिनट बाद।
- जांच में पाया गया कि दोनों टावरों में ढहने की प्रक्रिया विमान की टक्कर और आग से सबसे ज्यादा प्रभावित हिस्सों में शुरू हुई और फिर नीचे की ओर बढ़ी। जांच में टावरों के ढहने के लिए नियंत्रित विस्फोट का कोई प्रमाण नहीं पाया गया।
इतनी ऊंचाई पर विमान टकराने की आशंका भी जताई गई थी?
ट्विन टावर्स की असाधारण ऊंचाई को लेकर उस समय विमानन सुरक्षा से जुड़ी चिंता भी सामने आई थी। 2 मई 1968 को न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित एक विज्ञापन में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की प्रस्तावित ऊंचाई से हवाई यातायात पर पड़ने वाले असर को लेकर सवाल उठाए गए थे। विज्ञापन में चेतावनी दी गई थी कि इतनी ऊंची इमारतों की वजह से विमानों के उड़ान मार्ग और न्यूनतम उड़ान ऊंचाई में बदलाव करना पड़ सकता है। विज्ञापन के चित्र में एक विमान को नॉर्थ टावर के शीर्ष के बेहद करीब दिखाया गया था।
हालांकि, उस समय किसी ने यह कल्पना नहीं की थी कि यात्री विमानों को जानबूझकर टावरों से टकराया जाएगा। 9/11 मेमोरियल के अनुसार, बाद में 9/11 आयोग ने इसे फेल्योर ऑफ इमैजिनेशन यानी खतरे की कल्पना न कर पाने के संदर्भ में बताया।
ट्विन टावर्स की जगह अब क्या है?
टावरों के ढहने के बाद इस जगह का पुनर्विकास किया गया। पुराने टावरों की जगह आज 9/11 मेमोरियल के दो बड़े जलकुंड हैं। ये दोनों उसी स्थान पर बनाए गए हैं जहां नॉर्थ और साउथ टावर खड़े थे। इनके चारों ओर 11 सितंबर 2001 के हमले और 1993 के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर बम धमाके में मारे गए लोगों के नाम अंकित हैं।
इसके आसपास नया वर्ल्ड ट्रेड सेंटर परिसर विकसित किया गया, जिसमें 9/11 मेमोरियल एंड म्यूजियम, परिवहन केंद्र और कई नई इमारतें शामिल हैं।
उसी जगह फिर बना वन वर्ल्ड ट्रेड सेंटर
ट्विन टावर्स की जगह बने नए परिसर की सबसे प्रमुख इमारत वन वर्ल्ड ट्रेड सेंटर है। इसकी ऊंचाई 1,776 फीट रखी गई, जो 1776 में अमेरिकी स्वतंत्रता की घोषणा का प्रतीक है। इसमें 104 मंजिलें हैं और 2014 में यह पूरी तरह खुला। यानी जिस जगह पर कभी 110 मंजिला ट्विन टावर्स खड़े थे, उसी जगह के पुनर्विकास में आज 1,776 फीट ऊंचा वन वर्ल्ड ट्रेड सेंटर खड़ा है।