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Moradabad News: मेहमान सुरक्षित न मेजबान....गेस्ट हाउस में वर्षों से ठहरी है अनदेखी
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मुरादाबाद। प्लाई की दीवारें। लकड़ी की छत। छोटे छोटे केबिन। जीना इतना पतला कि एक आदमी भी सही से नहीं निकल सकता। सुरक्षा का तो कोई इंतजाम ही नहीं। चार बाई पांच फीट के केबिन को डीलक्स रूम बताकर किराये पर दिया जाता है। कुछ ऐसे ही गेस्ट हाउस खुले हैं रेलवे स्टेशन के सामने। बुधवार की रात को दो गेस्ट हाउस में लगी भीषण आग के बाद बृहस्पतिवार को जब अमर उजाला ने गेस्ट हाउस में सुरक्षा मानकों को देखा तो ऐसा लगा कि यहां वर्षों से अनदेखी ठहरी हुई है। पेश है रिपोर्ट।
अमर उजाला की पड़ताल में सामने आया है कि गेस्ट हाउस में लकड़ी के केबिन को कमरे का नाम देकर प्रति रात 400 से 600 रुपये में किराये पर दिया जा रहा है। यदि एसी वाला रूम चाहिए तो इसका किराया नौ सौ रुपये तक है। इन केबिन के अंदर पतले-पतले सिंगल बेड पड़े हैं, जिनके बगल में बैग रखने की भी जगह नहीं है। आग बुझाने के यंत्र तो दूर, कई जगहों पर तो बल्ब के लिए भी खुले तार लटक रहे हैं। कमरों में सीलन की बदबू है। कुछ देर रुकने पर घुटन महसूस होने लगती है। जहां होटल हैं, उनमें भी अग्निशमन विभाग की ओर से एनओसी नहीं है।
कमरे में नहीं कोई खिड़की, लकड़ी का पार्टिशन
एक गेस्टहाउस में दो कमरे नीचे थे और चार कमरे ऊपर थे। नीचे के कमरों में लकड़ी से पार्टिशन किया गया था। बेड के अलावा कमरे में कोई जगह ही नहीं थी। एक कमरे को तीन बेड का नाम दिया गया था। इस कमरे की छोटी खिड़की बाहर मैदान की तरफ खुल रही थी। इसका किराया सात सौ रुपये बताया। दूसरे कमरे को दो बेड का बनाया था और किराया छह सौ रुपये था। इस कमरे में कोई खिड़की तक नहीं थी। जीने में खड़ी सीढ़ी थीं। पहली मंजिल पर भी तीन कमरे थे। मैनेजर से आग से बचाव के इंतजाम के बारे में पूछने पर कहा कि अग्निशमन विभाग से मिलने वाली एनओसी की जानकारी नहीं है।
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डीलक्स रूम में एल्युमिनियम के दरवाजे
टीम जब दूसरे गेस्टहाउस में पहुंची तो वहां पर एल्युमिनियम के केबिन बने हुए थे। यहां पर तीन केबिन थे और एक-एक पतला बेड पड़ा था। इसी को डीलक्स कमराें का नाम दिया गया था। यहां पर बहुत ज्यादा पतला बाथरूम और शौचालय था। मैनेजर ने कहा कि ज्यादा जगह ही नहीं है, जो बड़े कमरे बनाएं। अब इनमें जरूरतमंद लोगों के लिए व्यवस्था की गई है।
केबिन में एसी, आग से बचाव को दो सिलिंडर
तीसरे गेस्टहाउस में टीम को फिर वही केबिन वाली व्यवस्था मिली। आग से बचाव के लिए दो सिलिंडर भी थे। यहां एक केबिन में एसी लगाई गई थी। इसे एसी वाला कमरा कहा जा रहा था। दो अन्य केबिन बुक थे। मैनेजर ने कहा कि प्रतियोगी परीक्षाओं के समय सबसे ज्यादा भीड़ रहती है। भूतल पर होने की वजह से डर वाली कोई बात नहीं है।
संकरे जीने और प्लाई की दीवार
टीम जब चौथे गेस्टहाउस में पहुंची तो यह प्रथम तल पर था। यहां पर भी जीना बहुत संकरा और खड़ा था। ऊपर पांच कमरे थे। वहां गैलरी बहुत पतली थी और पानी की बोतलें व अन्य सामान रखा हुआ था। पीछे मैदान की ओर जंगले बने हुए थे। कमरों के नाम पर प्लाई की दीवारों का पार्टिशन था। दो कमरों की छत के नीचे भी प्लाई लगाई हुई थी। एक कमरा बुक था। कमरों में सीलन की बदबू थी। मैनेजर ने कहा कि ज्यादातर यात्री ही आकर ठहरते हैं।
हॉल में लकड़ी के छह केबिन
टीम जब पांचवें गेस्टहाउस में पहुंची तो वह पूरा एक हॉल था। उस हॉल में नीचे दो लकड़ी के केबिन बने हुए थे। करीब पांच फीट ऊंचाई पर लकड़ी का पार्टिशन था। ऊपर की ओर जाने के लिए दो लकड़ी की सीढि़यां लगी हुई थीं। इन सीढि़यों पर संभलकर चढ़ते हुए जब ऊपर पहुंचे तो वहां छत इतनी ज्यादा नीची थी कि चार फीट का व्यक्ति खड़ा नहीं हो सकता था। ऊपर भी दो-दो केबिन बने हुए थे। वहां पर छोटे बेड पर चादर बिछी हुई थी। वेंटीलेशन की कोई व्यवस्था नहीं थी। केबिन के अंदर छोटा पंखा लगा था और तार फैले थे। उसी में एक चिमनीनुमा बॉक्स भी निकल रहा था। मैनेजर ने स्वयं स्वीकार किया कि यह पूरी तरह असुरक्षित है। यहां पर मजदूर वर्ग के लोग आकर रुकते हैं और किराया दो सौ रुपये हैं।
होटलों पर नहीं अग्निशमन विभाग की एनओसी
टीम जब बुधबाजार में एक गली में स्थित एक होटल में पहुंची तो यहां इमरजेंसी गेट के नाम पर सिर्फ एक ही जीना था। इस होटल में 11 कमरे थे, जिसमें आठ कमरों में एसी की व्यवस्था थी। आग से बचाव के लिए पाइप और सिलिंडर लगे हुए थे। हालांकि मैनेजर ने कहा कि अग्निशमन की एनओसी नहीं है। मालवीय नगर के एक होटल में मुख्य गेट के अलावा एक पतला इमरजेंसी गेट था। यहां पर आग से बचाव के लिए सिलिंडर और पाइप थे। मैनेजर ने कहा कि ढ़ाई साल से अग्निशमन विभाग की एनओसी नहीं है। अभी निरीक्षण हो चुका है, लेकिन एनओसी नहीं मिली है।
पतली गलियों में होटल, संकरे जीने
बुधबाजार की ही पतली-पतली गलियों में दो होटल थे। एक होटल इतनी ज्यादा संकरी गली में था कि दो व्यक्ति एक साथ बराबर से नहीं चल सकते। वहीं दूसरा होटल प्रथम और द्वितीय तल पर संचालित था। इस होटल में आठ कमरे थे। तीन कमरे प्रथम तल पर थे और पांच कमरे द्वितीय तल पर थे। कमरे भी छोटे-छोटे थे और वेंटीलेशन की पर्याप्त व्यवस्था नहीं थी। आवाजाही के लिए सिर्फ डेढ़ फीट का जीना ही सहारा था। आग से बचाव के लिए चार सिलिंडर थे। मैनेजर ने दावा किया कि अग्निशमन विभाग की एनओसी है। हालांकि वह दिखा नहीं पाया।
वर्जन...
जिले में करीब 115 बड़े होटल और रेस्टोरेंट के पास विभाग की एनओसी है। जहां मानक पूरे नहीं हो सकते हैं, वहां एनओसी नहीं दी जाती है। इसके अलावा बीच-बीच में अभियान चलाकर जांच की जाती है। बगैर एनओसी वाले गेस्टहाउस, होटल व रेस्टोरेंट को नोटिस दिया जाता है। संतोषजनक जवाब न मिलने पर कार्रवाई भी की जाती है।
डॉ. राजीव कुमार पांडेय, मुख्य अग्निशमन अधिकारी
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अमर उजाला की पड़ताल में सामने आया है कि गेस्ट हाउस में लकड़ी के केबिन को कमरे का नाम देकर प्रति रात 400 से 600 रुपये में किराये पर दिया जा रहा है। यदि एसी वाला रूम चाहिए तो इसका किराया नौ सौ रुपये तक है। इन केबिन के अंदर पतले-पतले सिंगल बेड पड़े हैं, जिनके बगल में बैग रखने की भी जगह नहीं है। आग बुझाने के यंत्र तो दूर, कई जगहों पर तो बल्ब के लिए भी खुले तार लटक रहे हैं। कमरों में सीलन की बदबू है। कुछ देर रुकने पर घुटन महसूस होने लगती है। जहां होटल हैं, उनमें भी अग्निशमन विभाग की ओर से एनओसी नहीं है।
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कमरे में नहीं कोई खिड़की, लकड़ी का पार्टिशन
एक गेस्टहाउस में दो कमरे नीचे थे और चार कमरे ऊपर थे। नीचे के कमरों में लकड़ी से पार्टिशन किया गया था। बेड के अलावा कमरे में कोई जगह ही नहीं थी। एक कमरे को तीन बेड का नाम दिया गया था। इस कमरे की छोटी खिड़की बाहर मैदान की तरफ खुल रही थी। इसका किराया सात सौ रुपये बताया। दूसरे कमरे को दो बेड का बनाया था और किराया छह सौ रुपये था। इस कमरे में कोई खिड़की तक नहीं थी। जीने में खड़ी सीढ़ी थीं। पहली मंजिल पर भी तीन कमरे थे। मैनेजर से आग से बचाव के इंतजाम के बारे में पूछने पर कहा कि अग्निशमन विभाग से मिलने वाली एनओसी की जानकारी नहीं है।
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डीलक्स रूम में एल्युमिनियम के दरवाजे
टीम जब दूसरे गेस्टहाउस में पहुंची तो वहां पर एल्युमिनियम के केबिन बने हुए थे। यहां पर तीन केबिन थे और एक-एक पतला बेड पड़ा था। इसी को डीलक्स कमराें का नाम दिया गया था। यहां पर बहुत ज्यादा पतला बाथरूम और शौचालय था। मैनेजर ने कहा कि ज्यादा जगह ही नहीं है, जो बड़े कमरे बनाएं। अब इनमें जरूरतमंद लोगों के लिए व्यवस्था की गई है।
केबिन में एसी, आग से बचाव को दो सिलिंडर
तीसरे गेस्टहाउस में टीम को फिर वही केबिन वाली व्यवस्था मिली। आग से बचाव के लिए दो सिलिंडर भी थे। यहां एक केबिन में एसी लगाई गई थी। इसे एसी वाला कमरा कहा जा रहा था। दो अन्य केबिन बुक थे। मैनेजर ने कहा कि प्रतियोगी परीक्षाओं के समय सबसे ज्यादा भीड़ रहती है। भूतल पर होने की वजह से डर वाली कोई बात नहीं है।
संकरे जीने और प्लाई की दीवार
टीम जब चौथे गेस्टहाउस में पहुंची तो यह प्रथम तल पर था। यहां पर भी जीना बहुत संकरा और खड़ा था। ऊपर पांच कमरे थे। वहां गैलरी बहुत पतली थी और पानी की बोतलें व अन्य सामान रखा हुआ था। पीछे मैदान की ओर जंगले बने हुए थे। कमरों के नाम पर प्लाई की दीवारों का पार्टिशन था। दो कमरों की छत के नीचे भी प्लाई लगाई हुई थी। एक कमरा बुक था। कमरों में सीलन की बदबू थी। मैनेजर ने कहा कि ज्यादातर यात्री ही आकर ठहरते हैं।
हॉल में लकड़ी के छह केबिन
टीम जब पांचवें गेस्टहाउस में पहुंची तो वह पूरा एक हॉल था। उस हॉल में नीचे दो लकड़ी के केबिन बने हुए थे। करीब पांच फीट ऊंचाई पर लकड़ी का पार्टिशन था। ऊपर की ओर जाने के लिए दो लकड़ी की सीढि़यां लगी हुई थीं। इन सीढि़यों पर संभलकर चढ़ते हुए जब ऊपर पहुंचे तो वहां छत इतनी ज्यादा नीची थी कि चार फीट का व्यक्ति खड़ा नहीं हो सकता था। ऊपर भी दो-दो केबिन बने हुए थे। वहां पर छोटे बेड पर चादर बिछी हुई थी। वेंटीलेशन की कोई व्यवस्था नहीं थी। केबिन के अंदर छोटा पंखा लगा था और तार फैले थे। उसी में एक चिमनीनुमा बॉक्स भी निकल रहा था। मैनेजर ने स्वयं स्वीकार किया कि यह पूरी तरह असुरक्षित है। यहां पर मजदूर वर्ग के लोग आकर रुकते हैं और किराया दो सौ रुपये हैं।
होटलों पर नहीं अग्निशमन विभाग की एनओसी
टीम जब बुधबाजार में एक गली में स्थित एक होटल में पहुंची तो यहां इमरजेंसी गेट के नाम पर सिर्फ एक ही जीना था। इस होटल में 11 कमरे थे, जिसमें आठ कमरों में एसी की व्यवस्था थी। आग से बचाव के लिए पाइप और सिलिंडर लगे हुए थे। हालांकि मैनेजर ने कहा कि अग्निशमन की एनओसी नहीं है। मालवीय नगर के एक होटल में मुख्य गेट के अलावा एक पतला इमरजेंसी गेट था। यहां पर आग से बचाव के लिए सिलिंडर और पाइप थे। मैनेजर ने कहा कि ढ़ाई साल से अग्निशमन विभाग की एनओसी नहीं है। अभी निरीक्षण हो चुका है, लेकिन एनओसी नहीं मिली है।
पतली गलियों में होटल, संकरे जीने
बुधबाजार की ही पतली-पतली गलियों में दो होटल थे। एक होटल इतनी ज्यादा संकरी गली में था कि दो व्यक्ति एक साथ बराबर से नहीं चल सकते। वहीं दूसरा होटल प्रथम और द्वितीय तल पर संचालित था। इस होटल में आठ कमरे थे। तीन कमरे प्रथम तल पर थे और पांच कमरे द्वितीय तल पर थे। कमरे भी छोटे-छोटे थे और वेंटीलेशन की पर्याप्त व्यवस्था नहीं थी। आवाजाही के लिए सिर्फ डेढ़ फीट का जीना ही सहारा था। आग से बचाव के लिए चार सिलिंडर थे। मैनेजर ने दावा किया कि अग्निशमन विभाग की एनओसी है। हालांकि वह दिखा नहीं पाया।
वर्जन...
जिले में करीब 115 बड़े होटल और रेस्टोरेंट के पास विभाग की एनओसी है। जहां मानक पूरे नहीं हो सकते हैं, वहां एनओसी नहीं दी जाती है। इसके अलावा बीच-बीच में अभियान चलाकर जांच की जाती है। बगैर एनओसी वाले गेस्टहाउस, होटल व रेस्टोरेंट को नोटिस दिया जाता है। संतोषजनक जवाब न मिलने पर कार्रवाई भी की जाती है।
डॉ. राजीव कुमार पांडेय, मुख्य अग्निशमन अधिकारी