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ट्रेजरी घोटाले के कसूरवारों पर कार्रवाई से कतरा रहे अफसर
Updated Tue, 18 Dec 2018 01:53 AM IST
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मुरादाबाद।
ट्रेजरी से साल दर साल सरकारी खजाना फर्जी बिलों के जरिए लुटता रहा और अफसर अंजान बने रहे। पेंशनर्स के भुगतान में नाकों चने चबाने वाली ट्रेजरी करोड़ों रुपये के फर्जी बिलों का आंखें मूंदकर भुगतान करती रही। पिछले छह साल से फर्जी बिल बनते रहे और तहसीलों से लेकर कलक्ट्रेट तक आगे खिसकते गए। अभी तक प्रकाश में आ चुके 15 करोड़ से अधिक के इस घोटाले का ठीकरा महज एक सेवानिवृत्त भूलेख लिपिक के सिर फोड़कर अफसर सरकारी कारिंदों को बचाने की कोशिशाें में जुटे हैं।
ट्रेजरी घोटाले की जांच में जुटे अधिकारी सेवानिवृत्त भूलेख लिपिक अनिल मेहरोत्रा और पूर्व लेखपाल अरुण भटनागर को इस घोटाले का मास्टरमाइंड बता रहे हैं। अधिकारियों का दावा है कि बगैर सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों की मदद के यह दोनों पिछले छह साल से ट्रेजरी को लूटते रहे। दोनों जेल में बंद हैं। इनके साथ ही 25 अन्य लोग भी घोटाले में जेल जा चुके हैं। घोटाले में फंसे कोषागार के दो बाबुआें को निलंबित किया गया लेकिन उनका नाम एफआईआर में शामिल नहीं किया गया। कोषागार के एक लेखाकार का नाम घोटाले की पांचवीं एफआईआर में है, लेकिन उसकी गिरफ्तारी नही हुई है। एक लेखपाल का नाम घोटाले की दो एफआईआर में आ चुका है। हर साल ट्रेजरी से फर्जी बिलों से निकली रकम में से लेखपाल और उसके बेटे के बैंक खाते में रकम पहुंची। लेकिन पूरी ठसक से सरकारी ड्यूटी बजा रहे इस लेखपाल को पुलिस गिरफ्तार नहीं कर सकी है। एक अन्य लेखपाल का नाम भी घोटाले में आया लेकिन उसके खिलाफ भी कोई कार्रवाई नहीं हुई। दोनों लेखपाल सरकारी ड्यूटी पर हैं। जबकि इन्हीं की तर्ज बाकी जिन लोगों के बैंक खातों में घोटाले की रकम पहुंची उन सभी को गिरफ्तार करके पुलिस जेल भेज चुकी है। अपर जिलाधिकारी प्रशासन लक्ष्मी शंकर सिंह का कहना है कि दोषियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की सिफारिश हो चुकी है। अभियोजन की अनुमति दी जा चुकी है। पुलिस को गिरफ्तारी से नहीं रोका गया है। पुलिस जब चाहे अभियुक्तों को गिरफ्तार कर सकती है।
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ट्रेजरी से साल दर साल सरकारी खजाना फर्जी बिलों के जरिए लुटता रहा और अफसर अंजान बने रहे। पेंशनर्स के भुगतान में नाकों चने चबाने वाली ट्रेजरी करोड़ों रुपये के फर्जी बिलों का आंखें मूंदकर भुगतान करती रही। पिछले छह साल से फर्जी बिल बनते रहे और तहसीलों से लेकर कलक्ट्रेट तक आगे खिसकते गए। अभी तक प्रकाश में आ चुके 15 करोड़ से अधिक के इस घोटाले का ठीकरा महज एक सेवानिवृत्त भूलेख लिपिक के सिर फोड़कर अफसर सरकारी कारिंदों को बचाने की कोशिशाें में जुटे हैं।
ट्रेजरी घोटाले की जांच में जुटे अधिकारी सेवानिवृत्त भूलेख लिपिक अनिल मेहरोत्रा और पूर्व लेखपाल अरुण भटनागर को इस घोटाले का मास्टरमाइंड बता रहे हैं। अधिकारियों का दावा है कि बगैर सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों की मदद के यह दोनों पिछले छह साल से ट्रेजरी को लूटते रहे। दोनों जेल में बंद हैं। इनके साथ ही 25 अन्य लोग भी घोटाले में जेल जा चुके हैं। घोटाले में फंसे कोषागार के दो बाबुआें को निलंबित किया गया लेकिन उनका नाम एफआईआर में शामिल नहीं किया गया। कोषागार के एक लेखाकार का नाम घोटाले की पांचवीं एफआईआर में है, लेकिन उसकी गिरफ्तारी नही हुई है। एक लेखपाल का नाम घोटाले की दो एफआईआर में आ चुका है। हर साल ट्रेजरी से फर्जी बिलों से निकली रकम में से लेखपाल और उसके बेटे के बैंक खाते में रकम पहुंची। लेकिन पूरी ठसक से सरकारी ड्यूटी बजा रहे इस लेखपाल को पुलिस गिरफ्तार नहीं कर सकी है। एक अन्य लेखपाल का नाम भी घोटाले में आया लेकिन उसके खिलाफ भी कोई कार्रवाई नहीं हुई। दोनों लेखपाल सरकारी ड्यूटी पर हैं। जबकि इन्हीं की तर्ज बाकी जिन लोगों के बैंक खातों में घोटाले की रकम पहुंची उन सभी को गिरफ्तार करके पुलिस जेल भेज चुकी है। अपर जिलाधिकारी प्रशासन लक्ष्मी शंकर सिंह का कहना है कि दोषियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की सिफारिश हो चुकी है। अभियोजन की अनुमति दी जा चुकी है। पुलिस को गिरफ्तारी से नहीं रोका गया है। पुलिस जब चाहे अभियुक्तों को गिरफ्तार कर सकती है।
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