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आठ कक्षाएं , 621 छात्र, शिक्षक सिर्फ छह, कैसे स्मार्ट बनेंगे सरकारी स्कूलों के बच्चे
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मुरादाबाद। सरकारी विद्यालयों को निजी विद्यालयों की बराबरी और गरीब परिवारों के बच्चों को बेहतर शिक्षा देने के उद्देश्य से परिषदीय विद्यालयों को स्मार्ट बनाया गया है। स्मार्ट विद्यालय बनते ही यहां दाखिला लेने वाले बच्चों की संख्या बढ़ गई है। मेहनत मजदूरी करने वाले अभिभावक बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलाने के लिए प्राइवेट स्कूलों में भेज रहे थे। लेकिन सरकारी स्कूलों के स्मार्ट बनने पर वह यहां भेजना पसंद कर रहे हैं। इसके चलते विद्यालयों में संसाधन कम पड़ने लगे हैं।
शहर के 24 परिषदीय विद्यालयों में स्मार्ट कक्षाएं शुरू कर दी गई हैं। ग्रामीण परिवेश से लेकर साधारण घरों से आने वाले बच्चे अब टच स्क्रीन बोर्ड पर पढ़ते हैं। स्कूल स्मार्ट होने के साथ ही विद्यालयों में नामांकन बढ़े हैं। ऐसे में सभी के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं। विद्यालयों में बच्चों को बैठाने के लिए न तो कमरे पर्याप्त हैं, न ही शिक्षक और फर्नीचर। पिछले वर्ष के मुकाबले करीब 20 से 90 बच्चे सभी विद्यालयों में बढ़े हैं। कंपोजिट विद्यालयों में औसतन सौ विद्यार्थियों पर एक शिक्षक हैै। कक्षाओं में सौ बच्चों को बैठाने की जगह नहीं हैं। यदि सेक्शन बढ़ाए जाएं तो शिक्षक नहीं है। नगर क्षेत्र में कई वर्षों से शिक्षकों की नियुक्ति नहीं हुई है। सेवाकाल पूरा करने वाले शिक्षकों की सेवानिवृत्ति के बाद अनुदेशकों के सहारे काम लिया जा रहा है।
पूर्व के वर्षों में ड्रॉप आउट होने के मामले ज्यादा थे। इस बार विद्यालयों के स्मार्ट होने के कारण बच्चों को भी पढ़ने में रुचि आ रही है और अभिभावक भी उन्हें अच्छी सुविधाओं में पढ़ाना चाहते हैं। लेकिन संसाधनों की कमी कहीं उनकी स्मार्ट शिक्षा के रास्ते का रोड़ा न बन जाए।
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शहर के 24 परिषदीय विद्यालयों में स्मार्ट कक्षाएं शुरू कर दी गई हैं। ग्रामीण परिवेश से लेकर साधारण घरों से आने वाले बच्चे अब टच स्क्रीन बोर्ड पर पढ़ते हैं। स्कूल स्मार्ट होने के साथ ही विद्यालयों में नामांकन बढ़े हैं। ऐसे में सभी के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं। विद्यालयों में बच्चों को बैठाने के लिए न तो कमरे पर्याप्त हैं, न ही शिक्षक और फर्नीचर। पिछले वर्ष के मुकाबले करीब 20 से 90 बच्चे सभी विद्यालयों में बढ़े हैं। कंपोजिट विद्यालयों में औसतन सौ विद्यार्थियों पर एक शिक्षक हैै। कक्षाओं में सौ बच्चों को बैठाने की जगह नहीं हैं। यदि सेक्शन बढ़ाए जाएं तो शिक्षक नहीं है। नगर क्षेत्र में कई वर्षों से शिक्षकों की नियुक्ति नहीं हुई है। सेवाकाल पूरा करने वाले शिक्षकों की सेवानिवृत्ति के बाद अनुदेशकों के सहारे काम लिया जा रहा है।
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पूर्व के वर्षों में ड्रॉप आउट होने के मामले ज्यादा थे। इस बार विद्यालयों के स्मार्ट होने के कारण बच्चों को भी पढ़ने में रुचि आ रही है और अभिभावक भी उन्हें अच्छी सुविधाओं में पढ़ाना चाहते हैं। लेकिन संसाधनों की कमी कहीं उनकी स्मार्ट शिक्षा के रास्ते का रोड़ा न बन जाए।
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