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Moradabad News: बच्चों का आईक्यू कम कर रहा चैट जीपीटी
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मुरादाबाद। चैट जीपीटी जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक वाले एप की मदद लेकर छात्र अपना होमवर्क कर रहे हैं। स्कूल में जमा करने वाले प्रोजेक्ट इस टूल का सहारा लेकर बना रहे हैं। ऐसे बच्चों की पोल तब खुली जब मासिक परीक्षा में उनके कम नंबर आए। शहर के कुछ स्कूलों व निजी कोचिंग संस्थानों ने इसकी गंभीरता को समझते हुए सख्ती बरतनी शुरू कर दी है।
मनोरोग विशेषज्ञों का मानना है कि इससे बच्चों का आईक्यू लेवल कम हो रहा है। एक निजी स्कूल की शिक्षिका ने बताया कि चैट जीपीटी से किए गए होमवर्क व बनाए गए प्रोजेक्ट में गलतियां नहीं मिलतीं। जब बच्चे से उस विषय के संबंध में सवाल किए जाते हैं तो वह अटक जाते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि बच्चे ने होम वर्क या प्रोजेक्ट वर्क में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद ली है।
विशेषज्ञों की सलाह मानकर स्कूलों ने पैरेंट्स टीचर टीचिंग में इस बात को लेकर खास सत्र आयोजित किया। अभिभावकों की काउंसिलिंग कर बच्चों का भविष्य बचाने के लिए अपील की गई। मनोरोग विशेषज्ञों ने इस सत्र में अभिभावकों से अपील की है कि वह 14 साल की उम्र तक बच्चों को मोबाइल से दूर रखें। कई मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक चैट जीपीटी नीट, यूपीएससी समेत कई परीक्षाओं के प्रश्नपत्रों को हल कर चुका है। अमेरिका की कई स्तरीय परीक्षाओं को पास कर चुका है।
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केस-1
एक निजी कोचिंग संस्थान का छात्र नीट का तैयारी कर रहा है, उसने ऑनलाइन टेस्ट में चैट जीपीटी का सहारा लिया। इसमें अच्छे नंबर आए। क्लास रूम में टेस्ट हुआ तो वह फेल हो गया। शिक्षकों ने छात्र की काउंसिलिंग की तो सारा मामला खुला। उन्होंने अभिभावकों को बुलाकर छात्र को मोबाइल न देने की अपील की। साथ ही क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट से छात्र की काउंसिलिंग भी कराई गई है।
केस-2
सिविल लाइंस स्थित एक स्कूल में 12वीं की छात्रा ने विज्ञान के प्रोजेक्ट वर्क में चैट जीपीटी का सहारा लिया। उसकी प्रस्तुति सबसे बेहतर रही। कहीं कोई कमी नहीं दिखी तो शिक्षक को शक हुआ। उन्होंने प्रोजेक्ट के विषय में छात्रा से कुछ प्रश्न पूछे तो वह हड़बड़ा गई। सख्ती से पूछने के बाद उसने स्वीकार किया कि प्रोजेक्ट चैट जीपीटी की मदद से बनाया है। स्कूल ने परिजनों के सामने छात्रा की काउंसिलिंग कराई और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दुष्प्रभावों पर मनोवैज्ञानिक सत्र आयोजित किया।
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आठ साल की उम्र तक स्क्रीन को हकीकत मानते हैं बच्चे
शहर के वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. बीके दत्त का कहना है कि सात से आठ साल की उम्र तक बच्चों का मस्तिष्क विकसित हो रहा होता है। इस उम्र तक स्कीन पर बच्चे जो देखते हैं, उसे वास्तविक जीवन का हिस्सा समझ लेते हैं। रील्स देखकर बच्चे खुद को नुकसान पहुंचाने लगते हैं। ऐसे मामले कई बार सामने आए हैं। बच्चे का छत से कूदना, खुद को चाकू मारना, परिजनों को गालियां देना यह सब मोबाइल के कारण हो रहा है। लिहाजा बच्चों को मोबाइल देने से परहेज करें, यदि बच्चे नाराज भी होते हैं तो होने दें।
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चैट जीपीटी जैसे एप्लीकेशन बच्चों की मानसिक वृद्धि रोक रहे हैं। मेरे पास ऐसे कई उदाहरण हैं। मैं पिछले तीन साल से इसी मुहिम में जुटा हूं और बच्चों के लिए कई काउंसिलिंग सेशन आयोजित कर चुका हूं। ऐसे एप्लीकेशन पर प्रतिबंध लगना चाहिए। भारत में मोबाइल इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स के इस्तेमाल को लेकर कानून बनना चाहिए।
- विवेक ठाकुर, आईआईटियन
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चैट जीपीटी से बच्चों की रचनात्मकता को खतरा है। मेरे पास ओपीडी में अब तक कुछ केस आ चुके हैं। इसे गंभीरता से नहीं लिया गया तो बहुत खराब परिणाम हो सकते हैं। सख्त कानून बनने में जितनी देर हो रही है, उतना ही हम अपनी भावी पीढ़ी को नुकसान पहुंचा रहे हैं।
- डॉ. दिशांतर गोयल, मनोरोग विशेषज्ञ
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मनोरोग विशेषज्ञों का मानना है कि इससे बच्चों का आईक्यू लेवल कम हो रहा है। एक निजी स्कूल की शिक्षिका ने बताया कि चैट जीपीटी से किए गए होमवर्क व बनाए गए प्रोजेक्ट में गलतियां नहीं मिलतीं। जब बच्चे से उस विषय के संबंध में सवाल किए जाते हैं तो वह अटक जाते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि बच्चे ने होम वर्क या प्रोजेक्ट वर्क में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद ली है।
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विशेषज्ञों की सलाह मानकर स्कूलों ने पैरेंट्स टीचर टीचिंग में इस बात को लेकर खास सत्र आयोजित किया। अभिभावकों की काउंसिलिंग कर बच्चों का भविष्य बचाने के लिए अपील की गई। मनोरोग विशेषज्ञों ने इस सत्र में अभिभावकों से अपील की है कि वह 14 साल की उम्र तक बच्चों को मोबाइल से दूर रखें। कई मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक चैट जीपीटी नीट, यूपीएससी समेत कई परीक्षाओं के प्रश्नपत्रों को हल कर चुका है। अमेरिका की कई स्तरीय परीक्षाओं को पास कर चुका है।
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केस-1
एक निजी कोचिंग संस्थान का छात्र नीट का तैयारी कर रहा है, उसने ऑनलाइन टेस्ट में चैट जीपीटी का सहारा लिया। इसमें अच्छे नंबर आए। क्लास रूम में टेस्ट हुआ तो वह फेल हो गया। शिक्षकों ने छात्र की काउंसिलिंग की तो सारा मामला खुला। उन्होंने अभिभावकों को बुलाकर छात्र को मोबाइल न देने की अपील की। साथ ही क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट से छात्र की काउंसिलिंग भी कराई गई है।
केस-2
सिविल लाइंस स्थित एक स्कूल में 12वीं की छात्रा ने विज्ञान के प्रोजेक्ट वर्क में चैट जीपीटी का सहारा लिया। उसकी प्रस्तुति सबसे बेहतर रही। कहीं कोई कमी नहीं दिखी तो शिक्षक को शक हुआ। उन्होंने प्रोजेक्ट के विषय में छात्रा से कुछ प्रश्न पूछे तो वह हड़बड़ा गई। सख्ती से पूछने के बाद उसने स्वीकार किया कि प्रोजेक्ट चैट जीपीटी की मदद से बनाया है। स्कूल ने परिजनों के सामने छात्रा की काउंसिलिंग कराई और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दुष्प्रभावों पर मनोवैज्ञानिक सत्र आयोजित किया।
आठ साल की उम्र तक स्क्रीन को हकीकत मानते हैं बच्चे
शहर के वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. बीके दत्त का कहना है कि सात से आठ साल की उम्र तक बच्चों का मस्तिष्क विकसित हो रहा होता है। इस उम्र तक स्कीन पर बच्चे जो देखते हैं, उसे वास्तविक जीवन का हिस्सा समझ लेते हैं। रील्स देखकर बच्चे खुद को नुकसान पहुंचाने लगते हैं। ऐसे मामले कई बार सामने आए हैं। बच्चे का छत से कूदना, खुद को चाकू मारना, परिजनों को गालियां देना यह सब मोबाइल के कारण हो रहा है। लिहाजा बच्चों को मोबाइल देने से परहेज करें, यदि बच्चे नाराज भी होते हैं तो होने दें।
चैट जीपीटी जैसे एप्लीकेशन बच्चों की मानसिक वृद्धि रोक रहे हैं। मेरे पास ऐसे कई उदाहरण हैं। मैं पिछले तीन साल से इसी मुहिम में जुटा हूं और बच्चों के लिए कई काउंसिलिंग सेशन आयोजित कर चुका हूं। ऐसे एप्लीकेशन पर प्रतिबंध लगना चाहिए। भारत में मोबाइल इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स के इस्तेमाल को लेकर कानून बनना चाहिए।
- विवेक ठाकुर, आईआईटियन
चैट जीपीटी से बच्चों की रचनात्मकता को खतरा है। मेरे पास ओपीडी में अब तक कुछ केस आ चुके हैं। इसे गंभीरता से नहीं लिया गया तो बहुत खराब परिणाम हो सकते हैं। सख्त कानून बनने में जितनी देर हो रही है, उतना ही हम अपनी भावी पीढ़ी को नुकसान पहुंचा रहे हैं।
- डॉ. दिशांतर गोयल, मनोरोग विशेषज्ञ