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Moradabad News: साल में एक बार अभियान, 364 दिन दवा के लिए परेशान
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मुरादाबाद। मानसिक स्वास्थ्य दिवस, हृदय दिवस, टीबी दिवस, सीओपीडी दिवस पर स्वास्थ्य विभाग रोगियों के लिए अभियान चलाता है। बाकी दिन जिला अस्पताल में मरीजों को पर्याप्त मात्रा में दवा भी नहीं मिलती। मानसिक रोगियों के अलावा सर्दी, खांसी, एलर्जी, अस्थमा के मरीजों को भी पर्याप्त दवा नहीं मिल पा रही है।
बृहस्पतिवार को कई मरीज खांसी का सिरप न मिलने के कारण निराश लौट गए। आंख के इंफेक्शन, त्वचा संबंधी परेशानी, जोड़ों की दवा भी पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल रही। वहीं मानसिक रोगियों के लिए दवा की किल्लत छह माह से बनी हुई है। मुरादाबाद में मेडिकल कॉलेज बनेगा तो मरीजों को इस तरह भटकना नहीं पड़ेगा। फिलहाल यहां जो दवाएं उपलब्ध हैं, इनमें भी डॉक्टर 10 दिन की डोज लिखते हैं तो डिस्पेंसरी से तीन दिन की दवा ही मिलती है। इसके कारण मरीज बाहर से दवा खरीदने को मजबूर हैं।
पहले मरीजों को अस्पताल में फ्लूऑक्सेटीन, ड्यूलॉक्सेटीन, रिसपेरीडोन, लिथियम आदि मिल जाती थीं, लेकिन आजकल इनकी भी किल्लत है। जरूरतमंद मरीज पूरा इलाज न मिलने के कारण या तो निजी चिकित्सकों के पास जाकर अच्छी रकम खर्च करने को मजबूर हैं या फिर उनके परिजन बेहतर इलाज के लिए मेडिकल कॉलेज की दौड़ लगाते हैं।
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सात माह से रिक्त है डॉक्टर का पद
जिला अस्पताल में राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत भी ओपीडी होती है। इसके कार्यक्रम के तहत तैनात डॉ. एलके गुप्ता सात माह पहले सेवानिवृत्त हो चुके हैं। तब से यह पद रिक्त है। जिला अस्पताल की ओर से न्यूरो साइकाइट्रिस्ट डॉ. अभिनव शेखर तैनात हैं। उन्होंने बताया कि ओपीडी में हर दिन 100 से 120 मरीज आते हैं। सबसे ज्यादा मरीज डिप्रेशन एंग्जाइटी व शिजोफ्रेनिया के होते हैं। इन रोगों के इलाज के लिए अलग-अलग मरीजों को करीब 10 से 15 प्रकार की दवाओं की जरूरत होती है। अस्पताल में सिर्फ वैलप्रोएट और एस्किटालोप्रेम उपलब्ध हैं। इसी तरह शिजोफ्रेनिया के उपचार में मरीजों की प्रवृत्ति के अनुसार 10 प्रकार की दवाएं काम में आती हैं। अस्पताल में ओलेनजापीन व क्यूलीन उपलब्ध है।
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सिरदर्द व नींद की गोली से चल रहा काम
कई मरीज ऐसे हैं जिन्हें सिरदर्द व नींद की गोली ही थमा दी जाती है। मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत तैनात डॉ. एलके गुप्ता के सेवानिवृत्त होने के बाद सात माह से यह पद रिक्त चल रहा है। इसलिए दवाएं मंगाने के लिए इंडेंट भी शासन को नहीं जा सका। इसके कारण मरीजों को परेशानी हो रही है। अब अस्पताल के परामर्शदाता ने इंडेंट बनाकर भेजा है। वहीं जानकारों का कहना है कि दवाओं की किल्लत मुख्यालय स्तर पर है। दवाएं ऊपर से ही नहीं आ रही हैं। हालांकि, इस बात की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
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मेडिकल कॉलेज बनने से बेशक सुविधाएं बढ़ जाएंगी। जहां तक राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम का सवाल है, हम सप्ताह भर में डॉक्टर की तैनाती कर देंगे। इसके लिए प्रक्रिया चल रही है। यदि स्थायी नियुक्ति नहीं हो पाई तो वैकल्पिक व्यवस्था करेंगे।
- डॉ. कुलदीप सिंह, सीएमओ
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अस्पताल में जिन रोगों की ओपीडी होती है, उनकी ज्यादातर दवाएं उपलब्ध हैं। मानसिक रोगों की जो दवाएं सप्लाई में आ रही हैं, उनका वितरण किया जा रहा है। यदि मरीजों को परेशानी आ रही है तो कारण जानकर उसका निस्तारण किया जाएगा।
- डॉ. राजेंद्र कुमार, चिकित्साधीक्षक, जिला अस्पताल
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बृहस्पतिवार को कई मरीज खांसी का सिरप न मिलने के कारण निराश लौट गए। आंख के इंफेक्शन, त्वचा संबंधी परेशानी, जोड़ों की दवा भी पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल रही। वहीं मानसिक रोगियों के लिए दवा की किल्लत छह माह से बनी हुई है। मुरादाबाद में मेडिकल कॉलेज बनेगा तो मरीजों को इस तरह भटकना नहीं पड़ेगा। फिलहाल यहां जो दवाएं उपलब्ध हैं, इनमें भी डॉक्टर 10 दिन की डोज लिखते हैं तो डिस्पेंसरी से तीन दिन की दवा ही मिलती है। इसके कारण मरीज बाहर से दवा खरीदने को मजबूर हैं।
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पहले मरीजों को अस्पताल में फ्लूऑक्सेटीन, ड्यूलॉक्सेटीन, रिसपेरीडोन, लिथियम आदि मिल जाती थीं, लेकिन आजकल इनकी भी किल्लत है। जरूरतमंद मरीज पूरा इलाज न मिलने के कारण या तो निजी चिकित्सकों के पास जाकर अच्छी रकम खर्च करने को मजबूर हैं या फिर उनके परिजन बेहतर इलाज के लिए मेडिकल कॉलेज की दौड़ लगाते हैं।
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सात माह से रिक्त है डॉक्टर का पद
जिला अस्पताल में राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत भी ओपीडी होती है। इसके कार्यक्रम के तहत तैनात डॉ. एलके गुप्ता सात माह पहले सेवानिवृत्त हो चुके हैं। तब से यह पद रिक्त है। जिला अस्पताल की ओर से न्यूरो साइकाइट्रिस्ट डॉ. अभिनव शेखर तैनात हैं। उन्होंने बताया कि ओपीडी में हर दिन 100 से 120 मरीज आते हैं। सबसे ज्यादा मरीज डिप्रेशन एंग्जाइटी व शिजोफ्रेनिया के होते हैं। इन रोगों के इलाज के लिए अलग-अलग मरीजों को करीब 10 से 15 प्रकार की दवाओं की जरूरत होती है। अस्पताल में सिर्फ वैलप्रोएट और एस्किटालोप्रेम उपलब्ध हैं। इसी तरह शिजोफ्रेनिया के उपचार में मरीजों की प्रवृत्ति के अनुसार 10 प्रकार की दवाएं काम में आती हैं। अस्पताल में ओलेनजापीन व क्यूलीन उपलब्ध है।
सिरदर्द व नींद की गोली से चल रहा काम
कई मरीज ऐसे हैं जिन्हें सिरदर्द व नींद की गोली ही थमा दी जाती है। मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत तैनात डॉ. एलके गुप्ता के सेवानिवृत्त होने के बाद सात माह से यह पद रिक्त चल रहा है। इसलिए दवाएं मंगाने के लिए इंडेंट भी शासन को नहीं जा सका। इसके कारण मरीजों को परेशानी हो रही है। अब अस्पताल के परामर्शदाता ने इंडेंट बनाकर भेजा है। वहीं जानकारों का कहना है कि दवाओं की किल्लत मुख्यालय स्तर पर है। दवाएं ऊपर से ही नहीं आ रही हैं। हालांकि, इस बात की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
मेडिकल कॉलेज बनने से बेशक सुविधाएं बढ़ जाएंगी। जहां तक राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम का सवाल है, हम सप्ताह भर में डॉक्टर की तैनाती कर देंगे। इसके लिए प्रक्रिया चल रही है। यदि स्थायी नियुक्ति नहीं हो पाई तो वैकल्पिक व्यवस्था करेंगे।
- डॉ. कुलदीप सिंह, सीएमओ
अस्पताल में जिन रोगों की ओपीडी होती है, उनकी ज्यादातर दवाएं उपलब्ध हैं। मानसिक रोगों की जो दवाएं सप्लाई में आ रही हैं, उनका वितरण किया जा रहा है। यदि मरीजों को परेशानी आ रही है तो कारण जानकर उसका निस्तारण किया जाएगा।
- डॉ. राजेंद्र कुमार, चिकित्साधीक्षक, जिला अस्पताल