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यूं ही नहीं छोड़ा अल्वी और राजबब्बर ने मैदान
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मुरादाबाद। राशिद अल्वी और राजबब्बर, दोनों कांग्रेस के दिग्गज नेताओं में शुमार होते हैं। दोनों को अलग - बगल की लोकसभा सीट मुरादाबाद और अमरोहा से कांग्रेस ने उम्मीदवार बनाया। दोनों ही चुनाव मैदान से हट गए। इसे लेकर कई तरह की चर्चाएं हैं। पार्टी के कुछ अहम ओहदेदारों का कहना है कि दोनों ने यूं ही पीछे हटने का फैसला नहीं किया। बल्कि इनके चुनाव मैदान से हटने की अपनी - अपनी ठोस वजहें हैं। अल्वी के अमरोहा से हटने की वजह टिकट में देरी और राजबब्बर के शुरू में मुरादाबाद आने की वजह फतेहपुर सीकरी में भाजपा से ड्रीम गर्ल की दस्तक बताई जा रही है।
कांग्रेस के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि राशिद अल्वी डेढ़ महीना पहले तक अमरोहा से चुनाव लड़ने के इच्छुक थे। उन्हाेंने यह इच्छा नेतृत्व को भी बता दी थी। लेकिन टिकट में देरी से बदले अमरोहा सीट के समीकरणों ने उनकी यह इच्छा खत्म कर दी। सूत्रों का कहना है कि यदि डेढ़ माह पहले अल्वी को टिकट घोषित हो जाता तो गठबंधन प्रत्याशी के रूप में बसपा दानिश अली की जगह संभवत: किसी दूसरे प्रत्याशी को उतारती। बसपा का प्रत्याशी गैर मुस्लिम हो सकता था। अल्वी के नाम का एलान पहले हो जाता तो बिजनौर से प्रत्याशी बनाए गए मलूक नागर का नाम भी बसपा से अमरोहा सीट पर आ सकता था। गठबंधन और भाजपा से गैर मुस्लिम प्रत्याशी होता तो कांग्रेस से राशिद अल्वी के जीत के समीकरण बन सकते थे। लेकिन टिकट में देरी ने इन समीकरणों के पलट दिया। पार्टी सूत्रों का कहना है कि बदले हुए समीकरणों में सीट को फंसता देख अल्वी ने कदम पीछे खींचे हैं। यह फैसला करने से पहले उन्होंने मंडल में पार्टी के कुछ अहम पदाधिकारियों से राय शुमारी भी की। सूत्रों का कहना है कि संगठन बूथ स्तर पर उतना मजबूत नहीं है कि 20 दिन में प्रत्याशी के लिए माहौल बना सके। इतने कम वक्त में सभी विधानसभाओं को कवर करने चुनौतियों पर भी उन्होंने पार्टी पदाधिकारियों से बात की। मंथन के बाद उन्होंने कदम पीछे खींचने का फैसला किया।
राजबब्बर के मुरादाबाद आने और फिर अचानक वापस जाने के पीछे भी फतेहपुर सीकरी सीट पर बदले समीकरणों को बताया जा रहा है। पार्टी के एक अहम पदाधिकारी का कहना है कि फतेहपुर सीकरी से सांसद रहे राजबब्बर वहीं से लड़ना चाहते थे। लेकिन जाट बहुल इस सीट पर भाजपा से हेमा मालिनी के उतरने की प्रबल संभावनाओं के बीच उन्होंने मुरादाबाद का रुख किया। एक कांग्रेस नेता का कहना है कि हेमा मालिनी का नाम मथुरा से पक्का होने के बाद राज को अपनी पुरानी सीट मुरादाबाद से अधिक सहज लगी। पार्टी सूत्रों का कहना है कि राजबब्बर खुद प्रदेश अध्यक्ष हैं। मुरादाबाद से उनका टिकट उनकी मर्जी के बगैर नहीं हुआ था। लेकिन फतेहपुर सीकरी सीट के बदले समीकरणाें ने उनकी इच्छा को फिर से परिवर्तित कर दिया।
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कांग्रेस के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि राशिद अल्वी डेढ़ महीना पहले तक अमरोहा से चुनाव लड़ने के इच्छुक थे। उन्हाेंने यह इच्छा नेतृत्व को भी बता दी थी। लेकिन टिकट में देरी से बदले अमरोहा सीट के समीकरणों ने उनकी यह इच्छा खत्म कर दी। सूत्रों का कहना है कि यदि डेढ़ माह पहले अल्वी को टिकट घोषित हो जाता तो गठबंधन प्रत्याशी के रूप में बसपा दानिश अली की जगह संभवत: किसी दूसरे प्रत्याशी को उतारती। बसपा का प्रत्याशी गैर मुस्लिम हो सकता था। अल्वी के नाम का एलान पहले हो जाता तो बिजनौर से प्रत्याशी बनाए गए मलूक नागर का नाम भी बसपा से अमरोहा सीट पर आ सकता था। गठबंधन और भाजपा से गैर मुस्लिम प्रत्याशी होता तो कांग्रेस से राशिद अल्वी के जीत के समीकरण बन सकते थे। लेकिन टिकट में देरी ने इन समीकरणों के पलट दिया। पार्टी सूत्रों का कहना है कि बदले हुए समीकरणों में सीट को फंसता देख अल्वी ने कदम पीछे खींचे हैं। यह फैसला करने से पहले उन्होंने मंडल में पार्टी के कुछ अहम पदाधिकारियों से राय शुमारी भी की। सूत्रों का कहना है कि संगठन बूथ स्तर पर उतना मजबूत नहीं है कि 20 दिन में प्रत्याशी के लिए माहौल बना सके। इतने कम वक्त में सभी विधानसभाओं को कवर करने चुनौतियों पर भी उन्होंने पार्टी पदाधिकारियों से बात की। मंथन के बाद उन्होंने कदम पीछे खींचने का फैसला किया।
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राजबब्बर के मुरादाबाद आने और फिर अचानक वापस जाने के पीछे भी फतेहपुर सीकरी सीट पर बदले समीकरणों को बताया जा रहा है। पार्टी के एक अहम पदाधिकारी का कहना है कि फतेहपुर सीकरी से सांसद रहे राजबब्बर वहीं से लड़ना चाहते थे। लेकिन जाट बहुल इस सीट पर भाजपा से हेमा मालिनी के उतरने की प्रबल संभावनाओं के बीच उन्होंने मुरादाबाद का रुख किया। एक कांग्रेस नेता का कहना है कि हेमा मालिनी का नाम मथुरा से पक्का होने के बाद राज को अपनी पुरानी सीट मुरादाबाद से अधिक सहज लगी। पार्टी सूत्रों का कहना है कि राजबब्बर खुद प्रदेश अध्यक्ष हैं। मुरादाबाद से उनका टिकट उनकी मर्जी के बगैर नहीं हुआ था। लेकिन फतेहपुर सीकरी सीट के बदले समीकरणाें ने उनकी इच्छा को फिर से परिवर्तित कर दिया।
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