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अहंकार का त्याग करने वाला ही सम्मान पाता है
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मिर्जापुर। कटरा बाजीराव स्थित एक लाज में चल रही संगीतमय श्रीराम कथा के आयोजन के छठवें दिन मंगलवार को धनुषभंग एवं सीताराम विवाह के प्रसंग का वर्णन किया गया।
व्यास बालसंत सच्चिदानंद ने श्रीराम की ललित कलाओं का वर्णन करते हुए धनुष भंग में निहित ज्ञान को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि शिव धनुष अहंकार का प्रतीक है। महाराज जनक की सभा में एक से बढ़कर एक वीर योद्धा आए लेकिन वह धनुष किसी से भी नहीं उठा । लेकिन राम के छूते ही टूट गया। उन्होंने कहा कि अहंकारी से अहंकार नहीं टूटता, भगवान अहंकार से रहित हैं। कहा कि किसी ने कहा कि वह धनुष इतना अभागा था कि श्रीराम के हाथों में भी पहुंचकर खंड- खंड हो गया तो संतों ने कहा कि यह धनुष का अहोभाग्य था कि वह भगवान के हाथों से उठा और उनके चरणों में गिरा। व्यास ने कहा कि जो अहंकार का त्याग करता है वही समाज में सम्मान पाता है।
श्रीराम ने भगवान शिव के धनुष को तोड़ा लेकिन अभिमान नहीं किया। इसीलिए सीता ने उनको जयमाला पहनाया। दोनों का विवाह हुआ। आयोजकों ने बताया कि अयोध्या में श्रीराम जन्म भूमि निर्माण के हर्ष में तथा पुरुषोत्तम मास होने के कारण यह आयोजन हो रहा है। मुख्य यजमान गोवर्धन त्रिपाठी के साथ डा. गणेश प्रसाद अवस्थी, राजेंद्र पांडेय, राजेंद्र अग्रवाल, पन्नालाल, विष्णु मालवीय, नितिन अवस्थी, रमेश त्रिपाठी, कृष्णमोहन गोस्वामी आदि थे।
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व्यास बालसंत सच्चिदानंद ने श्रीराम की ललित कलाओं का वर्णन करते हुए धनुष भंग में निहित ज्ञान को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि शिव धनुष अहंकार का प्रतीक है। महाराज जनक की सभा में एक से बढ़कर एक वीर योद्धा आए लेकिन वह धनुष किसी से भी नहीं उठा । लेकिन राम के छूते ही टूट गया। उन्होंने कहा कि अहंकारी से अहंकार नहीं टूटता, भगवान अहंकार से रहित हैं। कहा कि किसी ने कहा कि वह धनुष इतना अभागा था कि श्रीराम के हाथों में भी पहुंचकर खंड- खंड हो गया तो संतों ने कहा कि यह धनुष का अहोभाग्य था कि वह भगवान के हाथों से उठा और उनके चरणों में गिरा। व्यास ने कहा कि जो अहंकार का त्याग करता है वही समाज में सम्मान पाता है।
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श्रीराम ने भगवान शिव के धनुष को तोड़ा लेकिन अभिमान नहीं किया। इसीलिए सीता ने उनको जयमाला पहनाया। दोनों का विवाह हुआ। आयोजकों ने बताया कि अयोध्या में श्रीराम जन्म भूमि निर्माण के हर्ष में तथा पुरुषोत्तम मास होने के कारण यह आयोजन हो रहा है। मुख्य यजमान गोवर्धन त्रिपाठी के साथ डा. गणेश प्रसाद अवस्थी, राजेंद्र पांडेय, राजेंद्र अग्रवाल, पन्नालाल, विष्णु मालवीय, नितिन अवस्थी, रमेश त्रिपाठी, कृष्णमोहन गोस्वामी आदि थे।
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