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मानस में है जीवन की हर समस्या का हल
Mirzapur
Updated Fri, 23 Nov 2012 12:00 PM IST
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चील्ह। मल्लेपुर गांव में रुद्र महायज्ञ के तहत चल रहे मानस प्रवचन के चौथे दिन कथावाचक पं. धरणीधर उपाध्याय जी नेे धनुषयज्ञ एवं श्रीराम विवाह का बड़े ही मनोहोरी ढंग से वर्णन कर भक्तों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
कथावाचक श्री उपाध्याय जी ने कहा कि महाराज जनक के दरबार में बड़े-बड़े बलशाली राजा-महाराजाओं को आमंत्रित किया गया था। सीता के स्वयंवर में जनक जी ने शर्त रखी थी कि जो भी शिव जी के धनुष को खंडित करेगा, उसी से सीता का विवाह करा दिया जाएगा। दरबार में उपस्थित बड़े-बड़े राजा धनुष को तोड़ने की कौन कहे उसे टस से मस तक भी नहीं कर पाए। इस पर महाराज जनक चिंतित हो उठे। उन्होंने पृथ्वी को बलशालियों से हीन होने की बात कही। इस पर लक्ष्मण भरी सभा में क्रोधित हो उठे। बाद में गुरु वशिष्ठ ने श्रीराम को धनुष को खंडित करने का आदेश दिया और प्रभु श्रीराम ने एक ही बार में प्रत्यंचा को चढ़ाकर धनुष को खंडित कर दिया। शिव धनुष के टूटते ही महाराज जनक जी के दरबार में पुष्पों की वर्षा होने लगी और जनक दुलारी सीता ने श्रीराम को वर माला पहना कर उनका वरण कर लिया। महाराज जनक का दरबार श्रीराम और सीता के जयघोष से गुंजायमान हो रहा था। कथावाचक ने कहा कि श्रीरामचरित मानस में व्यक्ति के जीवन में आने वाली हर तरह की समस्याओं का हल विद्यमान है। व्यक्ति को चाहिए कि वह सच्चे मन से प्रभु श्रीराम का स्मरण कर अपने जीवन को प्रगति के मार्ग पर अग्रसर करे। इस दौरान कार्यक्रम आयोजक रामेश्वर नाथ दूबे, कमलाशंकर दूबे, आनंद कुमार, मनोज दूबे, श्रेयांश, शिवम, शिव प्रसाद, सुरेंद्र प्रसाद, प्रशांत, प्रमोद कुमार सहित बड़ी संख्या में नर-नारी उपस्थित रहे।
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कथावाचक श्री उपाध्याय जी ने कहा कि महाराज जनक के दरबार में बड़े-बड़े बलशाली राजा-महाराजाओं को आमंत्रित किया गया था। सीता के स्वयंवर में जनक जी ने शर्त रखी थी कि जो भी शिव जी के धनुष को खंडित करेगा, उसी से सीता का विवाह करा दिया जाएगा। दरबार में उपस्थित बड़े-बड़े राजा धनुष को तोड़ने की कौन कहे उसे टस से मस तक भी नहीं कर पाए। इस पर महाराज जनक चिंतित हो उठे। उन्होंने पृथ्वी को बलशालियों से हीन होने की बात कही। इस पर लक्ष्मण भरी सभा में क्रोधित हो उठे। बाद में गुरु वशिष्ठ ने श्रीराम को धनुष को खंडित करने का आदेश दिया और प्रभु श्रीराम ने एक ही बार में प्रत्यंचा को चढ़ाकर धनुष को खंडित कर दिया। शिव धनुष के टूटते ही महाराज जनक जी के दरबार में पुष्पों की वर्षा होने लगी और जनक दुलारी सीता ने श्रीराम को वर माला पहना कर उनका वरण कर लिया। महाराज जनक का दरबार श्रीराम और सीता के जयघोष से गुंजायमान हो रहा था। कथावाचक ने कहा कि श्रीरामचरित मानस में व्यक्ति के जीवन में आने वाली हर तरह की समस्याओं का हल विद्यमान है। व्यक्ति को चाहिए कि वह सच्चे मन से प्रभु श्रीराम का स्मरण कर अपने जीवन को प्रगति के मार्ग पर अग्रसर करे। इस दौरान कार्यक्रम आयोजक रामेश्वर नाथ दूबे, कमलाशंकर दूबे, आनंद कुमार, मनोज दूबे, श्रेयांश, शिवम, शिव प्रसाद, सुरेंद्र प्रसाद, प्रशांत, प्रमोद कुमार सहित बड़ी संख्या में नर-नारी उपस्थित रहे।
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