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बेचूबीर धाम... पहुंचते रहे श्रद्धालु

Wed, 13 Nov 2013 05:41 AM IST
Mirzapur
Mirzapur Updated Wed, 13 Nov 2013 05:41 AM IST
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अहरौरा। अहरौरा से 12 किमी. पश्चिम जंगलों व पहाड़ों के गर्भ में बसा बरही नामक निर्जन गांव के लिए कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की दशमी को लाखों भक्तों का जत्था अलग-अलग रवाना हुआ। कुछ पैदल तो कुछ अन्य साधनों से पथरीले दुर्गम मार्ग पर बिना थकान बढ़ते गए। उनकी आंखों में अभिलाषा व चेहरे पर दुख व पीड़ा के मिश्रित भाव तैर रहे थे। मगर मन में बाबा के प्रति श्रद्धा-विश्वास का उत्साह साफ झलक रहा था।
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आकंठ सन्नाटे में डूबे इस बियावान जंगल की तन्मयता लाखों श्रद्धालुओं के कोलाहल और वाहनों की चीत्कार से भंग हो गई। अंतरप्रांतीय भक्तों को एक जगह इकट्ठा करने वाले बाबा के धाम में मानों तिल रखने की भी जगह नहीं बची। नौनिहालों को गोद में लिए हुए पैदल यात्रा में शामिल महिलाओं की दशा दयनीय रही। श्रद्धा पर नतमस्तक वृद्ध औरतें भी किसी तरह लाठी टेकते हुए तो कुछ ट्रैक्टर सवार होकर बाबा के धाम में पहुंचीं। मेला धाम में श्रद्धालु खुले आसमान के नीचे बेसहारा की तरह अपनी मनोकामना पूर्ति की इच्छा संजोए मनरी बजने का इंतजार करते रहे। वीरान स्थल पर विद्यमान नीम के पेड़ के नीचे स्थित बेचूबीर बाबा की चौरी को आकर्षक रूप से सजाया गया है। अधिक भीड़ के चलते इस पहाड़ी और जंगली क्षेत्र में श्रद्धालुओं के दुख-दर्द बांटने की फुर्सत किसी को नहीं है। रोज कमाने-खाने वालों ने इस पर्व पर रास्ते चाय-पान की कई दुकानें लगा रखी हैं, जिससे यातायात में दुर्व्यवस्था नजर आई। मेला क्षेत्र में उड़ने वाली धूल से वातावरण प्रदूषित हो गया है। गंदगी के चलते गर्भवती महिलाओं व नवजात शिशुओं की हालत बद से बदतर हो गई है। संतान प्राप्ति की इच्छा व प्रेत बाधा से ग्रसित महिलाओं के ऊल-जुलूल कारनामों से भय-दहशत एवं रोमांच का माहौल पूरे मेला क्षेत्र में कायम है। दर्शनार्थियों की आस्था और विश्वास का केंद्र वह चौरी है, जिसे आने वाला हर पीड़ित सजल नेत्रों से नतमस्तक हो एकटक देखता ही जा रहा है।
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परंपराओं के अनुसार बेचूबीर के इस मेले में मनरी नामक वाद्य यंत्र के बजते ही पुजारी की विशेष पूजा के बाद भीड़ की कोलाहल ठहर जाती है और श्रद्धालुओं के आस्था और विश्वास के इस पर्व को अश्रुपूरित नजरों से विदा कर दिया जाता है।
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