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डाला छठ पर्व के लिए महिलाएं कर रही व्रत की तैयारी
Updated Mon, 23 Oct 2017 12:51 AM IST
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मिर्जापुर। डाला छठ का पर्व 24 अक्तूबर से आरंभ हो रहा है। व्रत करने वाली महिलाएं छठ पूजा की तैयारी में जुट गई हैं। पहले दिन नहाय खाय के साथ पर्व शुरू हो जाएगा। सूप दौरी व अन्य जरूरी सामानों की खरीदारी के लिए नगर के विभिन्न बाजारों से खरीदारी शुरू कर दी है। डाला छठ में व्रती महिलाएं गंगा स्नान कर सूर्य की उपसना करती हैं। इस पर्व में व्रती महिलाएं उगते सूर्य व डूबते हुए सूर्य को अर्ध्य देती हैं।
धर्म और विज्ञान दोनों मानता है कि सूर्य की सुबह और शाम की किरणों में जीवनदायिनी शक्तियां हैं। पौराणिक मान्यताओं की व्याख्या करते हुए आध्यात्मिक साहित्यकार सलिल पांडेय ने कहा कि सूर्य षष्ठी का पर्व त्याग का भी संदेश देता है। राजा उत्तानपाद के पुत्र ध्रुव को जब सौतेली माता सुरुचि ने अपमानित किया तब उनकी मां सुनीति ने नीतिगत जीवन जीने के लिए तपस्या की सलाह दी। जंगल में आकर बालक ध्रुव ने पहले अन्न त्यागा, फिर पत्ते, फिर जल, फिर वायु त्याग दिया। इस त्याग के दौरान शरीर में जो तरंगीय ऊर्जा समहित हुई, वहीं भगवान विष्णु की ताकत कहलाई। डाला छट पर व्रती महिलाएं सबसे पहले नहाय-खाय के दिन लौकी और भात, दूसरे दिन खरना में एक वक्त गुड़, चावल की बखीर एवं घी लगी रोटी खाती हैं। तीसरे दिन छठ पूजा को निर्जला व्रत रहने के पीछे शरीर को उन परिस्थितियों के लिए तैयार करने का भी है कि किन्हीं कारणों से यदि किसी वक्त अन्न-जल न मिले तब उस हालात को झेलने के लिए शरीर तैयार रहे। ढलते सूर्य को पानी मे खड़े होकर अर्ध्य के लाभ होते हैं। बहते पानी में नाभि तक खड़े होकर स्नान करने से नाभि के जरिए शरीर के आंतरिक हिस्से को लाभ मिलता है, यह जल-चिकित्सा का भी तरीका है। पूजा के सूप में फल, नारियल, गन्ना, ठोकवा (गुड़-आटे) सभी चिकित्सकीय लाभ की दृष्टि से रखे जाते हैं। अंतिम दिन सुबह स्नान कर नाक के ऊपर से बीच की मांग तक सिंदूर के लाभ से आयुर्वेदशास्त्र भरा-पड़ा है। इस प्रकार डाला छट का पर्व आंतरिक शुद्धीकरण का पर्व है। सामाजिक दृष्टि से यह पर्व परिवार को एकसूत्र में बांधता भी है। डाला छट का पर्व याद दिलाता है कि सिर्फ एक बार नहीं बल्कि जीवन-पर्यन्त सूर्य-किरणों का लाभ लिया जाए तो उसके अनगिनत लाभ हैं। दुर्गा सप्तशती के कवच स्त्रोत में रक्त, मज्जा, वसा, मांस, अस्थि, मेदांसि पार्वती श्लोक में जिन छह प्रमुख अवयवों की रक्षा की प्रार्थना की गई है, वह सूर्यकिरणों से पूर्ण की जा सकती है। तन के अलावा मन के स्तर पर भी सूर्य से तेजस्विता मिलती है।
धर्म और विज्ञान दोनों मानता है कि सूर्य की सुबह और शाम की किरणों में जीवनदायिनी शक्तियां हैं। पौराणिक मान्यताओं की व्याख्या करते हुए आध्यात्मिक साहित्यकार सलिल पांडेय ने कहा कि सूर्य षष्ठी का पर्व त्याग का भी संदेश देता है। राजा उत्तानपाद के पुत्र ध्रुव को जब सौतेली माता सुरुचि ने अपमानित किया तब उनकी मां सुनीति ने नीतिगत जीवन जीने के लिए तपस्या की सलाह दी। जंगल में आकर बालक ध्रुव ने पहले अन्न त्यागा, फिर पत्ते, फिर जल, फिर वायु त्याग दिया। इस त्याग के दौरान शरीर में जो तरंगीय ऊर्जा समहित हुई, वहीं भगवान विष्णु की ताकत कहलाई। डाला छट पर व्रती महिलाएं सबसे पहले नहाय-खाय के दिन लौकी और भात, दूसरे दिन खरना में एक वक्त गुड़, चावल की बखीर एवं घी लगी रोटी खाती हैं। तीसरे दिन छठ पूजा को निर्जला व्रत रहने के पीछे शरीर को उन परिस्थितियों के लिए तैयार करने का भी है कि किन्हीं कारणों से यदि किसी वक्त अन्न-जल न मिले तब उस हालात को झेलने के लिए शरीर तैयार रहे। ढलते सूर्य को पानी मे खड़े होकर अर्ध्य के लाभ होते हैं। बहते पानी में नाभि तक खड़े होकर स्नान करने से नाभि के जरिए शरीर के आंतरिक हिस्से को लाभ मिलता है, यह जल-चिकित्सा का भी तरीका है। पूजा के सूप में फल, नारियल, गन्ना, ठोकवा (गुड़-आटे) सभी चिकित्सकीय लाभ की दृष्टि से रखे जाते हैं। अंतिम दिन सुबह स्नान कर नाक के ऊपर से बीच की मांग तक सिंदूर के लाभ से आयुर्वेदशास्त्र भरा-पड़ा है। इस प्रकार डाला छट का पर्व आंतरिक शुद्धीकरण का पर्व है। सामाजिक दृष्टि से यह पर्व परिवार को एकसूत्र में बांधता भी है। डाला छट का पर्व याद दिलाता है कि सिर्फ एक बार नहीं बल्कि जीवन-पर्यन्त सूर्य-किरणों का लाभ लिया जाए तो उसके अनगिनत लाभ हैं। दुर्गा सप्तशती के कवच स्त्रोत में रक्त, मज्जा, वसा, मांस, अस्थि, मेदांसि पार्वती श्लोक में जिन छह प्रमुख अवयवों की रक्षा की प्रार्थना की गई है, वह सूर्यकिरणों से पूर्ण की जा सकती है। तन के अलावा मन के स्तर पर भी सूर्य से तेजस्विता मिलती है।
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