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अहरौरा में सन् 1942 में बुलंद हुआ था भारत छोड़ो का नारा
Updated Wed, 15 Aug 2018 02:00 AM IST
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अहरौरा। स्वतंत्रता संग्राम में 16 वर्ष की अवस्था में कूद पड़े पांडेय जी का गोला निवासी सेनानी नक्की धागर ने अहरौरा क्षेत्र में आजादी की लड़ाई की अलख जगाई थी। 13 अगस्त 1942 को अंग्रेजों पर हमला करने व सरकारी संपत्ति को क्षति पहुंचाने के आरोप में उनको गिरफ्तार किया गया था। छह माह बाद जेल से छूटने पर नक्की फिर से सक्रिय हुए और आजादी की लड़ाई में जुट गए। स्वतंत्रता संग्राम के दिनों को याद करते हुए उन्होंने कहा कि तब से अब में बहुत फर्क आया है। अब न तो सिद्धांत रहे और न ही स्वच्छ राजनीति।
सन 1922 में जन्मे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी नक्की धागर (96) ने स्वतंत्रता संग्राम के दिनों को याद करते हुए बताया कि किस तरह उन्होंने अंग्रेजों के छक्के छुड़ाए थे। बताया कि वह 16 वर्ष की उम्र के हुए तो उन्हें अंग्रेजों की ज्यादती और अत्याचार बर्दाश्त नहीं हो रहा था। नगर में एक दिन 150 लोग एक साथ सत्याग्रह करना शुरू किए। सत्याग्रहियों को जब अंग्रेज पकड़ कर ले जाने लगे तो उन्होंने पत्थर का टुकड़ा उठाकर अंग्रेजों पर हमला कर दिया, जिससे तीन सिपाही घायल हो गए। घायल सिपाहियों के सिर से खून बहने लगा और वहां से सभी अंग्रेज भाग खड़े हुए। कुछ समय बाद दीवान के साथ अंग्रेजी फौज आई और फायरिंग शुरू कर दी। इस गोली कांड में चार लोग शहीद हो गए। 13 अगस्त 1942 को फिर से सत्याग्रह किया गया। अंग्रेज सिपाहियों ने घेराबंदी करते हुए एक साथ 75 सेनानियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। छह माह 17 दिन बाद 2 मार्च 1943 में जेल से छोड़ा गया। जेल से छूटने पर आजादी के लिए जोश कम नहीं होने दिया और देश को आजाद कराने में अपनी भूमिका का निर्वहन किया। वर्तमान राजनीति पर कहते हैं कि अब तो किसी दल का कोई सिद्धांत है और न ही सिद्धांत की राजनीति ही रही। चुनावी घोषणाएं कर लोगों का वोट हासिल करने का तिकड़म किया जाता रहा है।
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सन 1922 में जन्मे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी नक्की धागर (96) ने स्वतंत्रता संग्राम के दिनों को याद करते हुए बताया कि किस तरह उन्होंने अंग्रेजों के छक्के छुड़ाए थे। बताया कि वह 16 वर्ष की उम्र के हुए तो उन्हें अंग्रेजों की ज्यादती और अत्याचार बर्दाश्त नहीं हो रहा था। नगर में एक दिन 150 लोग एक साथ सत्याग्रह करना शुरू किए। सत्याग्रहियों को जब अंग्रेज पकड़ कर ले जाने लगे तो उन्होंने पत्थर का टुकड़ा उठाकर अंग्रेजों पर हमला कर दिया, जिससे तीन सिपाही घायल हो गए। घायल सिपाहियों के सिर से खून बहने लगा और वहां से सभी अंग्रेज भाग खड़े हुए। कुछ समय बाद दीवान के साथ अंग्रेजी फौज आई और फायरिंग शुरू कर दी। इस गोली कांड में चार लोग शहीद हो गए। 13 अगस्त 1942 को फिर से सत्याग्रह किया गया। अंग्रेज सिपाहियों ने घेराबंदी करते हुए एक साथ 75 सेनानियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। छह माह 17 दिन बाद 2 मार्च 1943 में जेल से छोड़ा गया। जेल से छूटने पर आजादी के लिए जोश कम नहीं होने दिया और देश को आजाद कराने में अपनी भूमिका का निर्वहन किया। वर्तमान राजनीति पर कहते हैं कि अब तो किसी दल का कोई सिद्धांत है और न ही सिद्धांत की राजनीति ही रही। चुनावी घोषणाएं कर लोगों का वोट हासिल करने का तिकड़म किया जाता रहा है।
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