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साहित्य भूषण से नवाजे जाएंगे डा. अनुज प्रताप सिंह
Updated Sat, 01 Sep 2018 11:56 PM IST
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मिर्जापुर। जिले के साहित्यकार डा. अनुज प्रताप सिंह को समग्र साहित्य साधना के लिए उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान की की ओर से साहित्य भूषण सम्मान देने की घोषणा की गई है। इसके साथ ही डा. सिंह को देश के बीस साहित्यकारों में स्थान मिला है। उन्हें समारोह में दो लाख रुपये भी प्रदान किए जाएंगे। सम्मान मिलने की घोषणा पर प्रसन्नता जताते हुए उन्होंने कहा कि अब उनकी साहित्यिक साधना और भी मजबूत होकर साहित्य प्रेमियों तक पहुंचेंगी। उन्होंने नाथ साहित्य पर तीन किताबें लिखी हैं।
डॉ. अनुज प्रताप सिंह का जन्म सोनभद्र के लिलवाही वर्ष 2015 में हुआ। वे मिर्जापुर में ही रहते हैं। अमेठी उनकी कर्मस्थली रही है। अमेठी में वह रणबीर रणंजय पीजी कालेज में हिंदी विषय के एसोसिएट प्रोफेसर के विभागाध्यक्ष भी बने। अवकाश प्राप्त करने के बाद से वे मिर्जापुर नगर के राजा विजयपुर कोठी में रहकर हिंदी साहित्य की साधना करते हैं। डा. सिंह ने नाथ साहित्य पर तीन किताबें लिखी हैं। अब तक उन्हेें 66 प्रशस्ति-पत्र व पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं। अपनी प्रतिभा के बल पर वे 21 साहित्यिक संस्थाओं से भी जुड़े रहे हैं। अब तक उनकी 42 रचनाएं प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्होंने पत्रकारिता, भाषा, भाषा विज्ञान, उपन्यास, कहानी संग्रह, हिंदी साहित्य के साथ ही इतिहास विषय पर भी काफी काम किया है। डा. सिंह की अब तक करीब एक हजार फुटकर रचनाएं प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी पुस्तक भाषा विज्ञान, पत्रकारिता, हिंदी साहित्य का इतिहास, प्रयोजन मूलक हिंदी की पुस्तकें एमए हिंदी में अवध विश्वविद्यालय सहित गोरखपुर, विद्यापीठ, कानपुर व मेरठ यूनिवर्सिटी में पढ़ाई जाती हैं। डा. सिंह ने बताया कि हिंदी साहित्य का विकास तो हो ही रहा है लेकिन भाषा के माध्यम से अधिक हो रहा है। हिंदी साहित्य के विकास के लिए मीडिया अधिक सहायक है। आज के युवा वही साहित्य पढ़ रहे हैं जो उनके रोजगार व प्रतियोगी परीक्षाओं में सहायक होती हैं।
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डॉ. अनुज प्रताप सिंह का जन्म सोनभद्र के लिलवाही वर्ष 2015 में हुआ। वे मिर्जापुर में ही रहते हैं। अमेठी उनकी कर्मस्थली रही है। अमेठी में वह रणबीर रणंजय पीजी कालेज में हिंदी विषय के एसोसिएट प्रोफेसर के विभागाध्यक्ष भी बने। अवकाश प्राप्त करने के बाद से वे मिर्जापुर नगर के राजा विजयपुर कोठी में रहकर हिंदी साहित्य की साधना करते हैं। डा. सिंह ने नाथ साहित्य पर तीन किताबें लिखी हैं। अब तक उन्हेें 66 प्रशस्ति-पत्र व पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं। अपनी प्रतिभा के बल पर वे 21 साहित्यिक संस्थाओं से भी जुड़े रहे हैं। अब तक उनकी 42 रचनाएं प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्होंने पत्रकारिता, भाषा, भाषा विज्ञान, उपन्यास, कहानी संग्रह, हिंदी साहित्य के साथ ही इतिहास विषय पर भी काफी काम किया है। डा. सिंह की अब तक करीब एक हजार फुटकर रचनाएं प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी पुस्तक भाषा विज्ञान, पत्रकारिता, हिंदी साहित्य का इतिहास, प्रयोजन मूलक हिंदी की पुस्तकें एमए हिंदी में अवध विश्वविद्यालय सहित गोरखपुर, विद्यापीठ, कानपुर व मेरठ यूनिवर्सिटी में पढ़ाई जाती हैं। डा. सिंह ने बताया कि हिंदी साहित्य का विकास तो हो ही रहा है लेकिन भाषा के माध्यम से अधिक हो रहा है। हिंदी साहित्य के विकास के लिए मीडिया अधिक सहायक है। आज के युवा वही साहित्य पढ़ रहे हैं जो उनके रोजगार व प्रतियोगी परीक्षाओं में सहायक होती हैं।
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