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30-45 साल उम्र वाले सबसे ज्यादा हेपेटाइटिस-सी के शिकार
Mon, 03 Jun 2019 04:01 AM IST
Gaurav sharma
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
Published by: Gaurav sharma
Updated Mon, 03 Jun 2019 04:01 AM IST
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हेपेटाइटिस सी
- फोटो : अमर उजाला
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हेपेटाइटिस-सी के शिकार सबसे ज्यादा 30 से 45 साल उम्र के लोग हो रहे हैं। यह खुलासा जिला अस्पताल स्थित वेस्ट यूपी के इकलौते हेपेटाइटिस-सी क्लीनिक में आए 8083 मरीजों की जांच में हुआ है। हालात यह रही कि यहां रजिस्ट्रेशन कराने वाले 100 मरीजों में से 85 इस बीमारी से ग्रसित निकले।
यह क्लीनिक 25 जनवरी 2017 में शुरू हुआ था, तब से मई 2019 तक 8083 मरीज स्क्रीनिंग के लिए आए हैं। क्लीनिक के इंचार्ज डॉ. हेमंत ने बताया कि 2913 मरीजों में से 2292 मरीजों का इलाज पूरा हो चुका है, बाकी का इलाज चल रहा है। इनमें करीब 50 प्रतिशत महिलाएं और 50 प्रतिशत पुरुष हैं। 35 प्रतिशत गंभीर रोगी हैं। उन्होंने बताया कि इनमें करीब 70 प्रतिशत मरीज 30 से 45 साल उम्र के हैं। डॉक्टर्स विद्आउट बॉर्डर एक इंटरनेशनल एनजीओ है, जो इसे जिला अस्पताल में संचालित कर रहा है। जिला अस्पताल की ओपीडी में आने वाले मरीजों का इसमें निशुल्क इलाज किया जाता है। हालांकि अब यहां रजिस्ट्रेशन बंद हो चुके हैं। अब यहां तब रजिस्ट्रेशन शुरू होंगे, जब इसे यूपी सरकार टेकओवर कर लेगी। इस वजह से यहां चार हजार से ज्यादा मरीजों का इलाज भी अटक गया है। डॉ. हेमंत ने बताया कि इस बीमारी का पता शुरू में नहीं लग पाता। इस कारण यह जानलेवा हो जाती है। इसके इलाज में 40 से 50 हजार रुपये का खर्च आता है, मगर यहां यह निशुल्क किया जा रहा है।
आसपास के जिलों के भी आए मरीज
इनमें ज्यादातर मरीज तो मेरठ के ही हैं, मगर यहां सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, गाजियाबाद, गौतमबुद्धनगर, बुलंदशहर, शामली, बागपत और हापुड़ आदि जिलों के मरीज भी यहां इलाज कराने के लिए आए हैं। इस क्लीनिक में तीन डॉक्टर, तीन नर्स, तीन काउंसलर, दो लैब टेक्नीशियन समेत 25 लोगों का स्टाफ है।
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एक घंटे में बीमारी का पता चलता है
हेपेटाइटिस सी है या नहीं, यह महज एक घंटे में पता चल जाता है। जिला अस्पताल में यह क्लीनिक इस साल 25 जनवरी 2017 को खोला गया था, मगर इसका पूरा सेटअप तैयार करने के लिए जगह नहीं मिली। सिर्फ एक रूम में ही इसे चलाया जा रहा था। बाद में जिला अस्पताल में रूम नंबर 17 में इसका पूरा सेटअप लग गया।
दो प्रकार के होते हैं मरीज
हेपेटाइटिस सी के मरीज दो प्रकार के होते हैं, एक वे हैं जिनमें पूरी तरह से वायरस फैल चुका है, उन्हें हेपेटाइटिस का मरीज माना जाता है, दूसरे ऐसे होते हैं जिनके ब्लड में हेपेटाइटिस के वायरस होते हैं, लेकिन आसानी से लक्षण का पता नहीं चल पाता है। इन्हें हेपेटाइटिस कैरियर कहा जाता है। इन्हें हेपेटाइटिस की दिक्कत तो नहीं होती, लेकिन इनका ब्लड दूसरे व्यक्ति को चढ़ाने पर यह वायरस तेजी से इंफेक्शन करता है।
हेपेटाइटिस-सी
हेपेटाइटिस-सी (यकृतशोथ ग) इसे काला पीलिया भी कहते हैं। यह एक संक्रामक रोग है, जो हेपेटाइटिस-सी वायरस एचसीवी की वजह से होता है और यकृत को प्रभावित करता है। यह वायरस रक्त से रक्त के संपर्क द्वारा फैलता है। इलाज और देखभाल से यह ठीक हो जाता है।
ऐसे फैलता है
- दूषित सिरिंज का उपयोग करना
- दूषित रेजर या टूथब्रश का इस्तेमाल
- पीड़ित गर्भवती महिला से बच्चे को होना
- दूषित रक्तदान, अंगदान या लंबे समय तक डायलिसिस द्वारा मिलना
- दूषित सुईं से टैटू बनवाना या एक्युपंचर करवाना
- इंजेक्शन से नशीली दवाओं का प्रयोग करना एचसीवी संक्रमण का सबसे आम रास्ता है। कोई भी ऐसा कार्य या गतिविधि जिसमें खून से खून का संपर्क होने की संभावना है, एचसीवी संक्रमण का संभावित स्रोत हो सकता है।
ये हैं लक्षण
भूख कम लगना, थकान, पेट दर्द, पीलिया, अवसाद खुजली और फ्लू आदि जैसे लक्षण शामिल हैं।
---
सावधानी
- शराब न पिएं
- लिवर में वसा के इकट्ठे होने को नियंत्रित करें
- पानी अधिक मात्रा में लें
- जांचें नियमित कराते रहें
- आराम करें और नींद पूरी लें
- कच्चा या अधपका भोजन न करें
- शक्कर और नमक की उच्च मात्रा वाले आहार न लें
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यह क्लीनिक 25 जनवरी 2017 में शुरू हुआ था, तब से मई 2019 तक 8083 मरीज स्क्रीनिंग के लिए आए हैं। क्लीनिक के इंचार्ज डॉ. हेमंत ने बताया कि 2913 मरीजों में से 2292 मरीजों का इलाज पूरा हो चुका है, बाकी का इलाज चल रहा है। इनमें करीब 50 प्रतिशत महिलाएं और 50 प्रतिशत पुरुष हैं। 35 प्रतिशत गंभीर रोगी हैं। उन्होंने बताया कि इनमें करीब 70 प्रतिशत मरीज 30 से 45 साल उम्र के हैं। डॉक्टर्स विद्आउट बॉर्डर एक इंटरनेशनल एनजीओ है, जो इसे जिला अस्पताल में संचालित कर रहा है। जिला अस्पताल की ओपीडी में आने वाले मरीजों का इसमें निशुल्क इलाज किया जाता है। हालांकि अब यहां रजिस्ट्रेशन बंद हो चुके हैं। अब यहां तब रजिस्ट्रेशन शुरू होंगे, जब इसे यूपी सरकार टेकओवर कर लेगी। इस वजह से यहां चार हजार से ज्यादा मरीजों का इलाज भी अटक गया है। डॉ. हेमंत ने बताया कि इस बीमारी का पता शुरू में नहीं लग पाता। इस कारण यह जानलेवा हो जाती है। इसके इलाज में 40 से 50 हजार रुपये का खर्च आता है, मगर यहां यह निशुल्क किया जा रहा है।
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आसपास के जिलों के भी आए मरीज
इनमें ज्यादातर मरीज तो मेरठ के ही हैं, मगर यहां सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, गाजियाबाद, गौतमबुद्धनगर, बुलंदशहर, शामली, बागपत और हापुड़ आदि जिलों के मरीज भी यहां इलाज कराने के लिए आए हैं। इस क्लीनिक में तीन डॉक्टर, तीन नर्स, तीन काउंसलर, दो लैब टेक्नीशियन समेत 25 लोगों का स्टाफ है।
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एक घंटे में बीमारी का पता चलता है
हेपेटाइटिस सी है या नहीं, यह महज एक घंटे में पता चल जाता है। जिला अस्पताल में यह क्लीनिक इस साल 25 जनवरी 2017 को खोला गया था, मगर इसका पूरा सेटअप तैयार करने के लिए जगह नहीं मिली। सिर्फ एक रूम में ही इसे चलाया जा रहा था। बाद में जिला अस्पताल में रूम नंबर 17 में इसका पूरा सेटअप लग गया।
दो प्रकार के होते हैं मरीज
हेपेटाइटिस सी के मरीज दो प्रकार के होते हैं, एक वे हैं जिनमें पूरी तरह से वायरस फैल चुका है, उन्हें हेपेटाइटिस का मरीज माना जाता है, दूसरे ऐसे होते हैं जिनके ब्लड में हेपेटाइटिस के वायरस होते हैं, लेकिन आसानी से लक्षण का पता नहीं चल पाता है। इन्हें हेपेटाइटिस कैरियर कहा जाता है। इन्हें हेपेटाइटिस की दिक्कत तो नहीं होती, लेकिन इनका ब्लड दूसरे व्यक्ति को चढ़ाने पर यह वायरस तेजी से इंफेक्शन करता है।
हेपेटाइटिस-सी
हेपेटाइटिस-सी (यकृतशोथ ग) इसे काला पीलिया भी कहते हैं। यह एक संक्रामक रोग है, जो हेपेटाइटिस-सी वायरस एचसीवी की वजह से होता है और यकृत को प्रभावित करता है। यह वायरस रक्त से रक्त के संपर्क द्वारा फैलता है। इलाज और देखभाल से यह ठीक हो जाता है।
ऐसे फैलता है
- दूषित सिरिंज का उपयोग करना
- दूषित रेजर या टूथब्रश का इस्तेमाल
- पीड़ित गर्भवती महिला से बच्चे को होना
- दूषित रक्तदान, अंगदान या लंबे समय तक डायलिसिस द्वारा मिलना
- दूषित सुईं से टैटू बनवाना या एक्युपंचर करवाना
- इंजेक्शन से नशीली दवाओं का प्रयोग करना एचसीवी संक्रमण का सबसे आम रास्ता है। कोई भी ऐसा कार्य या गतिविधि जिसमें खून से खून का संपर्क होने की संभावना है, एचसीवी संक्रमण का संभावित स्रोत हो सकता है।
ये हैं लक्षण
भूख कम लगना, थकान, पेट दर्द, पीलिया, अवसाद खुजली और फ्लू आदि जैसे लक्षण शामिल हैं।
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सावधानी
- शराब न पिएं
- लिवर में वसा के इकट्ठे होने को नियंत्रित करें
- पानी अधिक मात्रा में लें
- जांचें नियमित कराते रहें
- आराम करें और नींद पूरी लें
- कच्चा या अधपका भोजन न करें
- शक्कर और नमक की उच्च मात्रा वाले आहार न लें