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मेडिकल कॉलेज में हुआ दुर्लभतम बीमारी का सफल इलाज
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मेरठ। एलएलआरएम मेडिकल कॉलेज में एक दुर्लभतम बीमारी लैम्बर्ट ईटन मायस्थेनिक सिंड्रोम (एलईएमएस) का सफल इलाज किया गया। यह बीमारी मांसपेशियों में कमजोरी और थकान का कारण बनती है। इसका पता रिपीटिटिव नर्व स्टिमुलेशन टेस्ट (आरएनएसटी) से चलता है। मेडिकल कॉलेज में यह जांच पहली बार की गई है।
यह इल्केट्रोडायग्नोस्टिक परीक्षण है, जिसमें तंत्रिका को बार-बार उत्तेजित किया जाता है। टेस्ट तंत्रिकाओं और मांसपेशियों के बीच संचार में असामान्यताओं की पहचान करने में मदद करता है।
न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. दीपिका सागर ने बताया कि यह 47 वर्षीय मरीज कस्बा बुढ़ाना, मुजफ्फरनगर के रहने वाले हैं (दुर्लभ बीमारी की वजह से मरीज की पहचान छिपाई गई है)। पिछले 2 साल से इनके हाथों और पैरों में ताकत की कमी थी जो पिछले लगभग 6 महीने से बढ़ गई थी। मरीज चलने में असमर्थ था। काफी इलाज के बाद भी इन्हें कोई फायदा नहीं हो रहा था। 10 दिन पहले परिजनों ने इन्हें मेडिकल के न्यूरोलॉजी वार्ड में भर्ती कराया। लक्षणों के आधार पर एलईएमएस बीमारी की आशंका हुई जिसकी पुष्टि के लिए आरएनएसटी जांच की गई। उन्होंने कहा कि यह जांच पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पहली बार किसी भी सरकारी मेडिकल कॉलेज में की गई है। अब मरीज स्वस्थ है। अपने सभी काम खुद कर रहे हैं।
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10 लाख में दो-तीन लोगों को ही होती है बीमारी
डॉ. दीपिका सागर ने बताया कि यह एक दुर्लभ बीमारी है जो लगभग 10 लाख लोगों में से 2-3 लोगों को ही होती है। यह एक स्वप्रतिरक्षी रोग (ऑटो इम्यून डिसऑर्डर) होता है। इस स्थिति में शरीर की प्रतिरक्षण प्रणाली अपने शरीर के ही स्वस्थ ऊतकों पर हमला कर देती है।
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340 रुपये में हुआ इलाज
मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. आरसी गुप्ता ने बताया कि निजी चिकित्सालय में इस बीमारी के इलाज के लिए लगभग 8000 से 12000 रुपये का खर्च आता है जबकि मेडिकल कॉलेज में महज 340 रुपये के सरकारी खर्च में पूरा इलाज किया गया है।
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यह इल्केट्रोडायग्नोस्टिक परीक्षण है, जिसमें तंत्रिका को बार-बार उत्तेजित किया जाता है। टेस्ट तंत्रिकाओं और मांसपेशियों के बीच संचार में असामान्यताओं की पहचान करने में मदद करता है।
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न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. दीपिका सागर ने बताया कि यह 47 वर्षीय मरीज कस्बा बुढ़ाना, मुजफ्फरनगर के रहने वाले हैं (दुर्लभ बीमारी की वजह से मरीज की पहचान छिपाई गई है)। पिछले 2 साल से इनके हाथों और पैरों में ताकत की कमी थी जो पिछले लगभग 6 महीने से बढ़ गई थी। मरीज चलने में असमर्थ था। काफी इलाज के बाद भी इन्हें कोई फायदा नहीं हो रहा था। 10 दिन पहले परिजनों ने इन्हें मेडिकल के न्यूरोलॉजी वार्ड में भर्ती कराया। लक्षणों के आधार पर एलईएमएस बीमारी की आशंका हुई जिसकी पुष्टि के लिए आरएनएसटी जांच की गई। उन्होंने कहा कि यह जांच पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पहली बार किसी भी सरकारी मेडिकल कॉलेज में की गई है। अब मरीज स्वस्थ है। अपने सभी काम खुद कर रहे हैं।
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10 लाख में दो-तीन लोगों को ही होती है बीमारी
डॉ. दीपिका सागर ने बताया कि यह एक दुर्लभ बीमारी है जो लगभग 10 लाख लोगों में से 2-3 लोगों को ही होती है। यह एक स्वप्रतिरक्षी रोग (ऑटो इम्यून डिसऑर्डर) होता है। इस स्थिति में शरीर की प्रतिरक्षण प्रणाली अपने शरीर के ही स्वस्थ ऊतकों पर हमला कर देती है।
340 रुपये में हुआ इलाज
मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. आरसी गुप्ता ने बताया कि निजी चिकित्सालय में इस बीमारी के इलाज के लिए लगभग 8000 से 12000 रुपये का खर्च आता है जबकि मेडिकल कॉलेज में महज 340 रुपये के सरकारी खर्च में पूरा इलाज किया गया है।