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सुबह बताई खैरियत, शाम को शहादत की खबर आ गई, भाई की शादी के बाद ड्यूटी से लौटा था प्रदीप

Fri, 15 Feb 2019 07:33 AM IST
राजेश सैनी रोहित अग्रवाल, शामली
रोहित अग्रवाल, शामली Published by: राजेश सैनी Updated Fri, 15 Feb 2019 07:33 AM IST
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Pradeep martyr in pulwama attack joined duty after marriage of his brother
pradeep

जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में सीआरपीएफ कैंप पर हुए आतंकी हमले में प्रदीप दो दिन पहले ही तयेरे भाई की शादी के बाद लौटा था। सुबह 11 बजे भी परिजनों से प्रदीप की फोन पर बात हुई थी, लेकिन शाम को ही उसकी शहादत की खबर आ गई। प्रदीप के पिता जगदीश का कहना है कि उसे गर्व है कि उसका बेटा देश के लिए शहीद हुआ है, लेकिन वह चाहते हैं कि मोदी सरकार उसकी शहादत का ऐसा बदला ले।

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परिजनों के अनुसार प्रदीप वर्ष 2003 में सीआरपीएफ में भर्ती हुआ था। वर्तमान में उसकी पोस्टिंग श्रीनगर में थी। उसकी पत्नी कामिनी और दो बेटे सिद्धार्थ और दुष्यंत गाजियाबाद में रहते हैं। बाकी परिजन गांव में। परिजनों ने बताया कि आठ फरवरी को ही वो अपने ताऊ के लड़के अमित की शादी में छुट्टी लेकर आया था। गाजियाबाद के गोविंदपुरम निवासी उसकी पत्नी और बच्चे भी आए थे। सब बड़े खुश थे। 12 फरवरी को ही वो वापस ड्यूटी पर गया था। चचेरे भाई उमेश कुमार के अनुसार  के अनुसार बृहस्पतिवार सुबह 11 बजे ही प्रदीप का फोन उनके पास आया था।
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उसने कहा था कि वो अपनी ड्यूटी पर पहुंच गया है। परिजन भी निश्चिंत हो गए थे, लेकिन शाम को वहां आतंकी हमले की खबर मीडिया पर चलने के बाद वे परेशान हो गए। प्रदीप का फोन मिलाया, लेकिन वो नहीं लगा। वे लोग प्रदीप के परिचितों से संपर्क में लगे थे। इस बीच रात करीब सवा नौ बजे उसकी बटालियन के किसी अधिकारी का फोन आया कि प्रदीप कुमार आतंकी हमले में शहीद हो गए हैं। ये सुनकर उन्हें यकीन ही नहीं हुआ कि ये भी हो सकता है।

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खबर आते ही प्रदीप के घर उमड़ा पूरा गांव 
प्रदीप की शहादत की खबर आते ही प्रदीप के घर ग्रामीणों का जमावड़ा लगना शुरू हो गया। ग्रामीण परिजनों को सांत्वना देने पहुंच रहे थे। प्रदीप की पत्नी और बच्चे गाजियाबाद में ही थे। उन्हें भी परिजनों ने देर रात तक खबर नहीं दी थी। रात करीब 11 बजे सैकड़ों ग्रामीण प्रदीप के घर पर जुटे थे। आदर्श मंडी थाना पुलिस भी मौके पर पहुंची और परिजनों से बात की।

परिजनों पर टूट पड़ा गमों का पहाड़
परिजनों के अनुसार प्रदीप के परिवार में उसके पिता जगदीश और मां हैं। जो बनत में रहते हैं। पिता खेती बाड़ी करते हैं। प्रदीप अपने भाइयों में सबसे बड़ा था। उसका बीच का भाई अमित भी आर्मी से रिटायर हो चुका है। सबसे छोटा भाई नवीन शामली में एक निजी चिकित्सक के यहां काम करता है। एक बहन आरजू हैं, जिसकी शादी हो चुकी है। इस घटना को सुनकर परिवार में गमों का पहाड़ टूट पड़ा था। उसकी पत्नी और बच्चे गाजियाबाद में ही थे।
नाम -   कां. प्रदीप कुमार
पिता-     जगदीश प्रसाद 
उम्र -       37
पता       गांव बनत, जिला शामली
बटालियन -21वीं बटालियन सीआरपीएफ 

पत्नी बेटों को सूचना देने की हिम्मत नहीं जुटा सके
परिजनों के अनुसार प्रदीप अपने दो बेटों को बहुत प्यार करता था। वह अक्सर उनसे फोन पर बात करता था। बड़ा बेटा सिद्धार्थ कक्षा 12 और छोटा बेटा दुष्यंत कक्षा नौ में पढ़ता है। दोनों गाजियाबाद में रहते और पढ़ते हैं। परिजनों के अनुसार वे लोग उसकी शहादत की खबर गाजियाबाद में उसकी पत्नी और बच्चे को देने की हिम्मत भी नहीं जुटा पा रहे थे। 

आज रात तक शव आने की उम्मीद
शामली। प्रदीप का शव शुक्रवार रात या शनिवार तड़के तक ही आने की संभावना है। बताया जाता है कि शव के पोस्टमार्टम और तमाम प्रक्रिया के बाद जवान उसके शव को लेकर यहां आएंगे।  पूरे सैनिक सम्मान के साथ उसका अंतिम संस्कार होगा। हालांकि इस संबंध में देर रात तक कोई भी अधिकारिक आदेश जिला पुलिस को नहीं मिले थे। 

बहुत मिलनसार था प्रदीप
बनत के ग्रामीणों ने बताया कि प्रदीप काफी मिलनसार था। उसका परिवार भले ही गाजियाबाद रहता हो, लेकिन जब भी वो छुट्टी आता था गांव में जरूर आता था। बच्चों के साथ यहां आता था। गांव में अपने दोस्तों और आसपड़ोस वालों से मिलता था। उन्हें कश्मीर और सेना के किस्से सुनाता था। वो काफी मिलनसार था। हसमुख स्वभाव और मिलनसार होने का ही नतीजा था कि उसकी शहादत की खबर आते ही उसके गांव के दोस्त और सैकड़ों ग्रामीण वहां जुट गए थे। 

मेरा बेटा बहादुर था
शामली। प्रदीप के पिता जगदीश का कहना है कि उसे गर्व है कि उसका बेटा देश के लिए शहीद हुआ है। लेकिन वह चाहते हैं कि सरकार उसकी शाहदत का ऐसा बदला ले कि आतंकियों और पाकिस्तान की सात पुश्तें याद रखें। प्रदीप की शहादत की खबर मिलते ही परिवार में गमों का पहाड़ टूट गया था। परिवार में कोहराम था।  पिता जगदीश और मां सुरेंता की आंखों में आंसू थे। पिता जगदीश ने कहा कि उनका बेटा बहादुर था।

वो जब भी आता बताया करता कि किस तरह हमारी सेना आतंकियों के छक्के छुड़ाती है। उन्हें बेटे के खोने का गम तो है, लेकिन तसल्ली इस बात है कि उनका बेटा देश के लिए शहीद हुआ है। बस वे सरकार से यही चाहते हैं कि उसके बेटे की शहादत का ऐसा बदला ले कि आतंकियों और उनके शरणदाता पाकिस्तान की सात नस्लें भी याद रखें, तभी इस हमले के शहीद जवानों की चिता ठंडी होगी। 

अमित नाम को लेकर बना रहा असमंजस
कश्मीर के पुलवामा में शहीद हुए जवानों की सूची में अमित नाम को लेकर असमंजस की स्थिति बनी रही। इंस्पेक्टर आदर्श मंडी थाना कर्मवीर सिंह के अनुसार शहर के रेलपार कालोनी निवासी अमित भी सीआरपीएफ में ही पुलवामा में तैनात है। इस घटना की खबर आने के बाद उसके परिजन उसका फोन मिला देर रात तक मिलाते रहे हैं, लेकिन संपर्क नहीं हो रहा। उन्होंने खुद थाने आकर इसकी जानकारी दी। इंस्पेक्टर के अनुसार परिजनों ने बताया कि शहीदों की सूची में जिस अमित का नाम है उसे कांस्टेबल हेडमोहर्रिर बताया गया है, जबकि रेलपार का अमित वासरमैन है। इसे लेकर देर रात तक उसके परिजन चिंतित रहे। इंस्पेक्टर ने बताया कि कोई अधिकृत पुष्टि नहीं है।

सरकारी तौर पर अभी तक पुलवामा में शहीद शामली जनपद के किसी भी जवान के बारे में कोई लिखित सूचना नहीं मिली है। बनत के प्रदीप नाम के जवान के परिजन ही उसकी शहादत की पुष्टि कर रहे हैं। - अजय कुमार एसपी शामली
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