मदर्स-डे पर विशेष: वृद्धाश्रम में आखिरी दिन गुजार रही मां ने कही ऐसी बात.. पढ़कर आ जाएंगे आंसू
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होठों पर उसके कभी बद्दुआ नहीं होती,
बस इक मां है जो कभी खफा नहीं होती।
मुन्नवर राणा की ये लाइने मां के किरदार को बखूबी बयां करती हैं। इसकी एक बानगी देखने को मिली यूपी के मुजफ्फरनगर में। यहां श्री मदनानंद वैदिक वानप्रस्थ वृद्ध आश्रम में रह रही वृद्धाओं से जब मर्दस डे के बारे में बात की तो हर किसी के जेहन में अपने बच्चों संग गुजारी यादें ताजा हो गईं।
कहते हैं बच्चे मां को कितने भी खुद से दूर कर दें उन्हें बुरा भला कह लें लेकिन एक मां है कि कभी बद्दुआ नहीं देती। आश्रम में रहने वाली एक वृद्धा कमला ने इस बात को प्रमाणित कर दिया। यहां उन्होंने कही कुछ ऐसी बात कि किसी का भी दिल भर आए -
वृद्धाश्रम में जीवन के आखिरी दिन गुजार रहीं 75 वर्षीय कमला को अपने बेटे से कोई शिकायत नहीं है। उसने कभी सुध नहीं ली, लेकिन मां के दिल से बेटे के लिए दुआ ही निकलती है। कहती हैं कि वो जहां भी रहे खुश रहे। अकेली कमला ही नहीं, अन्य कई महिलाएं जीवन का आखिरी पड़ाव वृद्धाश्रमों में काटने को मजबूर हैं। इनमें से कुछ के बेटे-बहुएं समेत भरापूरा परिवार है, जबकि कुछ ऐसी भी हैं जिनका कोई बेटा नहीं। वे वृद्धाश्रम में रह रही हैं, लेकिन बेटियों की गृहस्थी पर बोझ नहीं बनना चाहती।
श्री मदनानंद वैदिक वानप्रस्थ वृद्ध आश्रम में आठ महिलाएं रहती हैं। कमला भी उन्हीं में से एक है। पति की काफी पहले मौत हो गई थी। बेटा हरिद्वार में कहीं रहता है, लेकिन उसने कभी मां की सुध नहीं ली। भगवती, माया, कमला देवी और अरुणा भी यहीं पर रहती हैं। परिवार का जिक्र छेड़ते ही कहती हैं कि उन्हें किसी से शिकवा नहीं। परिवार में कौन-कौन हैं, यह भी नहीं बताना चाहती। कहती हैं कि आश्रम और जनता के सहयोग से उनका जीवन कट रहा है।
उधर, शहर के नई मंडी क्षेत्र में संचालित मुक्ता महिला आश्रम में रहने वाली कमलेश का कोई पुत्र नहीं है। लंबे समय से आश्रम में रह रही हैं। परिवार के बारे में पूछने पर कहती हैं कि तीन बेटियां हैं। उनका विवाह कर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर दी, अब बेटियों की गृहस्थी पर बोझ नहीं बनना चाहती। इसलिए यहां रह रही हैं।
कांता देवी, कैलाशो, मीरा, राजकुमारी और श्यामो देवी कहती हैं कि परिवार में किसी का सहारा होता तो उन्हें यहां रहने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ता। सुशीला देवी का कोई पुत्र नहीं है। बेटी परिवार के साथ नोएडा में रहती है। कभी-कभार बेटी के पास जाती हैं और कुछ दिन ठहर कर लौट आती हैं।
कहती हैं कि हर परिवार की अपनी कहानी हैं। बताती हैं कि यहां रहने वाली एक अन्य महिला का भरापूरा परिवार है, लेकिन वह भी यहां रहने को मजबूर है। उसे देखकर लगता है कि यदि उनका बेटा और बहू होते तो इस बात की क्या गारंटी थी कि उन्हें आश्रम में नहीं रहना पड़ता। उन्होंने जीवन को अपने तरीके से जीना सीख लिया है।
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