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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Meerut News ›   Chaudhary Charan Singh Champion or Farmer from Meerut Who Never Compromised on Issues of Annadata

Chaudhary Charan Singh: यूं ही कोई चौधरी चरण सिंह नहीं हो जाता, अन्नदाता के सवाल पर किसी समझौते को न थे तैयार

Tue, 23 Dec 2025 12:26 PM IST
शाहरुख खान राजकुमार सैनी, अमर उजाला, मेरठ
राजकुमार सैनी, अमर उजाला, मेरठ Published by: शाहरुख खान Updated Tue, 23 Dec 2025 12:26 PM IST
सार

Who was Chaudhary Charan Singh?: भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे हैं, जिनका मूल्यांकन उनके पदों से नहीं, बल्कि उनके विचारों और संघर्षों से किया जाता है। भारत रत्न, पूर्व प्रधानमंत्री और किसानों के महानायक चौधरी चरण सिंह ऐसे ही नेता थे। वे सत्ता के शिखर तक पहुंचे लेकिन उनकी जड़ें खेत-खलिहान, किसान और गांवों में ही रहीं। उनका जीवन भारतीय राजनीति में किसान चेतना, भूमि सुधार और सामाजिक न्याय की निरंतर लड़ाई का दस्तावेज है। मेरठ की माटी से आजादी के आंदोलन में सक्रियता से लेकर देश की कमान संभालने तक उनके जहन में किसान ही रहे।

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Chaudhary Charan Singh Champion or Farmer from Meerut Who Never Compromised on Issues of Annadata
पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

चौधरी चरण सिंह का जन्म 23 दिसंबर 1902 को मेरठ जिले के नूरपुर गांव (अब गाजियाबाद) में हुआ था। ग्रामीण परिवेश ने उनके भीतर किसान जीवन की पीड़ा और सम्मान दोनों को गहराई से स्थापित किया। उन्होंने 1923 में आगरा कॉलेज से बीएससी, 1925 में एमए और 1926 में एलएलबी की डिग्री प्राप्त की। पांच जून 1925 को उनका विवाह गायत्री देवी से हुआ। 1928 में उन्होंने गाजियाबाद में वकालत शुरू की लेकिन किसानों की दशा बदलने के जुनून ने उनका रुख राजनीति की ओर कर दिया।
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1929 में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े और शीघ्र ही पूर्णकालिक राजनीति के लिए वकालत छोड़ दी। 1930 में गांधीजी के नमक सत्याग्रह के दौरान पहली बार जेल गए। यही वह दौर था जब उनका व्यक्तित्व एक आंदोलनकारी और जननेता के रूप में आकार लेने लगा। 1938 में खाद्यान्न डीलरों के शोषण से किसानों को बचाने के लिए उन्होंने कृषि उपज विपणन विधेयक प्रस्तुत किया। तीव्र विरोध के कारण इसे 1964 तक पारित नहीं किया जा सका।
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इसके बाद 1939 से 1946 के बीच वे जिला मेरठ कांग्रेस कमेटी में अध्यक्ष और महासचिव पद पर रहे। इसी अवधि में उन्होंने किसानों के हितों से जुड़े अनेक प्रस्ताव पार्टी और विधानमंडल के सामने रखे। उन्होंने पट्टेदार किसानों और वास्तविक खेतिहर मजदूरों को भूमि का मालिकाना हक देने की रूपरेखा प्रस्तुत की, जमींदारी उन्मूलन के पूर्ववर्ती भूमि उपयोग बिल का मसौदा तैयार किया।
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आपातकाल में भी जेल गए
1975 में इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल के दौरान उन्हें दो वर्षों तक जेल में रहना पड़ा। 1977 में रिहाई के बाद हुए आम चुनावों में कांग्रेस की ऐतिहासिक हार के पीछे किसान और ग्रामीण भारत की जो लामबंदी थी, उसके वैचारिक सूत्रधारों में चरण सिंह प्रमुख थे। जनता सरकार में वे पहले गृह मंत्री बने और फिर उप प्रधानमंत्री तथा केंद्रीय वित्त मंत्री के रूप में कार्य किया। कई साल की राजनीतिक उथल-पुथल के बीच 28 जुलाई 1979 से 14 जनवरी 1980 तक वे भारत के पांचवें प्रधानमंत्री बने। यह काल भले ही संक्षिप्त रहा, लेकिन यह उस किसान नेता के राजनीतिक उत्कर्ष का प्रतीक था।

 

किसानों के सवाल पर किसी समझौते को नहीं थे तैयार
चौधरी चरण सिंह ने यह भी कहा था कि सरकारी नौकरियों और शैक्षिक संस्थानों में प्रवेश के समय जाति संबंधी पूछताछ पर रोक लगनी चाहिए। कांग्रेस नेतृत्व ने इन प्रस्तावों पर कभी गंभीरता से विचार नहीं किया। वे किसानों के सवाल पर किसी समझौते के लिए तैयार नहीं थे।
 

जमीदारी व्यवस्था के विरोध को पुस्तक में उतारा
1947 में चौधरी चरण सिंह की महत्वपूर्ण पुस्तक “जमींदारी को समाप्त कैसे करें” प्रकाशित हुई। इसने स्वतंत्र भारत में भूमि सुधार की दिशा तय करने में बड़ी भूमिका निभाई। 1948 से 1956 तक वे उत्तर प्रदेश कांग्रेस विधानमंडल दल के महासचिव रहे। 1951 में वे कैबिनेट रैंक के न्याय और सूचना मंत्री बने। 1952 में जमींदारी उन्मूलन कानून का पारित होना उनके राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि माना जाता है। इस दौर में उन्होंने “उत्तर प्रदेश में कृषि क्रांति” और “संयुक्त खेती : समस्या और समाधान” जैसी पुस्तकों के माध्यम से अपनी नीतिगत सोच को सार्वजनिक बहस का हिस्सा बनाया।
 

वैचारिक संघर्ष के बीच किया कांग्रेस से किनारा
किसानों सहित अन्य वर्ग के हितों के लिए संघर्ष और कुछ नीतियों को लेकर वैचारिक संघर्ष के बीच 1959 में उन्होंने सरकार से इस्तीफा दिया और सत्ता से बाहर रहकर वैचारिक संघर्ष को आगे बढ़ाया। 1964 में प्रकाशित उनकी पुस्तक “भारत की गरीबी और इसके समाधान” ग्रामीण भारत की बदहाली और नीतिगत विफलताओं का विश्लेषण है। 1967 में उन्होंने कांग्रेस से अलग होकर उत्तर प्रदेश के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली।

यहीं से कांग्रेस और चरण सिंह के रास्ते पूरी तरह अलग हो गए। उन्होंने भारतीय क्रांति दल की स्थापना की। यह आगे चलकर भारतीय लोक दल और फिर लोक दल बना। यह कांग्रेस की शहरी-केंद्रित और उद्योग-प्रधान राजनीति के विकल्प के रूप में किसान-केंद्रित राजनीति का संगठित रूप था। 1970 में वे दूसरी बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और 1971 से 1977 तक विधानसभा में विपक्ष के नेता रहे।
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