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Meerut News: अल्फाजों में बयां नहीं किया जा सकता गम
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अल्फाजों में बयां नहीं किया जा सकता गम
वैली बाजार में रहने वालीं फराह जाफरी ने विक्टोरिया पार्क अग्निकांड में अपने पति अतहर जाफरी (40) को खोया था। वह बताती हैं कि अतहर एक निजी शिक्षण संस्थान चलाते थे, वह अपने दोस्त के साथ विक्टोरिया पार्क मेले में गए थे। शाम को पता चला कि उनका एक्सीडेंट हो गया है और वह लोकप्रिय अस्पताल में भर्ती हैं। उन्हें यह नहीं बताया गया था कि वह इस हादसे का शिकार हो गए हैं। अस्पताल पहुंची तो देखा बुरी तरह से जले हुए थे। तीन दिन तक वह यहां भर्ती रहे, इसके बाद उन्हें दिल्ली के अस्पताल में शिफ्ट किया गया, लेकिन 14 अप्रैल 2006 को उन्होंने दम तोड़ दिया। मेरे और परिवार के लिए बहुत बड़ा ग़म है, जिसे अल्फाजों में बयां नहीं किया जा सकता। फराह कहती हैं कि विक्टोरिया पार्क अग्निकांड की लड़ाई लड़ रहे लंदन स्पोर्ट्स वाले संजय गुप्ता ने सगे भाई से ज्यादा उनकी मदद की है। अपनी बहन की तरह उनका और उनके परिवार ख्याल रखा है।
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हादसे में माता-पिता को खोया
मनोरंजन पार्क निवासी नरेश तायल बताते हैं कि उनकी मां मालती तायल (70) और पिता रमेश चन्द्र तायल (75) की जान भी 10 अप्रैल 2006 को विक्टोरिया पार्क अग्निकांड में गई थी। प्रशासन ने पिता की मौत को तो माना, मगर मां की मौत 16 साल बाद माना। यह कहते हुए नरेश तायल की आंखें नम हो जाती हैं। नरेश बताए हैं कि हादसे के बाद पहले मां का शव नहीं मिला था। शव इस कदर जले हुए थे कि हम मां को पहचान नहीं पाए। एक महिला के शव की पहचान 9 माह तक नहीं हुई। मेडिकल जांच में पता चला उसके दांत असली थे, जबकि हमारी मां के दांत कृत्रिम थे। इसलिए उस शव को नहीं अपनाया। हालांकि बाद में हमारी संस्था ने ही उस महिला के शव का अंतिम संस्कार किया। शव बदलने के कारण कोई और परिवार मां का शव ले गया था।
मेडिकल की बर्न यूनिट में कब शुरू होगा इलाज
एलएलआरएम मेडिकल कॉलेज में करीब तीन करोड़ रुपये कीमत से बनी बर्न यूनिट का लोकार्पण 10 मई 2022 को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने किया था, लेकिन अभी तक बर्न यूनिट पूरी तरह से चालू नहीं हो पाई है। न ऑक्सीजन पाइप लाइन बिछी है और न ही स्टाफ मिल सका है। अभी भी गंभीर जले हुए मरीजों को रेफर किया जा रहा है। इलाज कब मिलेगा, किसी को पता नहीं है।
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मेरठ में बर्न यूनिट की मांग दशकों पुरानी है। विक्टोरिया पार्क में हुए भीषण अग्निकांड के बाद से इसकी मांग की जा रही थी। माना गया था कि तब अगर बर्न यूनिट होती तो शायद बहुत से लोगों की जान बच जाती। डेढ़ दशक से ज़्यादा वक्त के बाद भी स्वास्थ्य विभाग वहीं खड़ा है। इस बर्न यूनिट में पांच बेड की आईसीयू है 20 बेड का जनरल वार्ड है। मेडिकल कॉलेज में सामान्य तौर पर हर माह 30 से 35 गंभीर जले हुए मरीज आते हैं। कम जले हुए मरीजों को तो भर्ती कर लिया जाता है, मगर गंभीर मरीजों को रेफर करना पड़ता है। मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. आरसी गुप्ता का कहना है कि मरीज भर्ती करने की व्यवस्था है। और बेहतर व्यवस्था करने की कोशिश जारी है। ऑक्सीजन पाइप लाइन और अलग से स्टाफ की मांग शासन से की गई है।
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वैली बाजार में रहने वालीं फराह जाफरी ने विक्टोरिया पार्क अग्निकांड में अपने पति अतहर जाफरी (40) को खोया था। वह बताती हैं कि अतहर एक निजी शिक्षण संस्थान चलाते थे, वह अपने दोस्त के साथ विक्टोरिया पार्क मेले में गए थे। शाम को पता चला कि उनका एक्सीडेंट हो गया है और वह लोकप्रिय अस्पताल में भर्ती हैं। उन्हें यह नहीं बताया गया था कि वह इस हादसे का शिकार हो गए हैं। अस्पताल पहुंची तो देखा बुरी तरह से जले हुए थे। तीन दिन तक वह यहां भर्ती रहे, इसके बाद उन्हें दिल्ली के अस्पताल में शिफ्ट किया गया, लेकिन 14 अप्रैल 2006 को उन्होंने दम तोड़ दिया। मेरे और परिवार के लिए बहुत बड़ा ग़म है, जिसे अल्फाजों में बयां नहीं किया जा सकता। फराह कहती हैं कि विक्टोरिया पार्क अग्निकांड की लड़ाई लड़ रहे लंदन स्पोर्ट्स वाले संजय गुप्ता ने सगे भाई से ज्यादा उनकी मदद की है। अपनी बहन की तरह उनका और उनके परिवार ख्याल रखा है।
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हादसे में माता-पिता को खोया
मनोरंजन पार्क निवासी नरेश तायल बताते हैं कि उनकी मां मालती तायल (70) और पिता रमेश चन्द्र तायल (75) की जान भी 10 अप्रैल 2006 को विक्टोरिया पार्क अग्निकांड में गई थी। प्रशासन ने पिता की मौत को तो माना, मगर मां की मौत 16 साल बाद माना। यह कहते हुए नरेश तायल की आंखें नम हो जाती हैं। नरेश बताए हैं कि हादसे के बाद पहले मां का शव नहीं मिला था। शव इस कदर जले हुए थे कि हम मां को पहचान नहीं पाए। एक महिला के शव की पहचान 9 माह तक नहीं हुई। मेडिकल जांच में पता चला उसके दांत असली थे, जबकि हमारी मां के दांत कृत्रिम थे। इसलिए उस शव को नहीं अपनाया। हालांकि बाद में हमारी संस्था ने ही उस महिला के शव का अंतिम संस्कार किया। शव बदलने के कारण कोई और परिवार मां का शव ले गया था।
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मेडिकल की बर्न यूनिट में कब शुरू होगा इलाज
एलएलआरएम मेडिकल कॉलेज में करीब तीन करोड़ रुपये कीमत से बनी बर्न यूनिट का लोकार्पण 10 मई 2022 को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने किया था, लेकिन अभी तक बर्न यूनिट पूरी तरह से चालू नहीं हो पाई है। न ऑक्सीजन पाइप लाइन बिछी है और न ही स्टाफ मिल सका है। अभी भी गंभीर जले हुए मरीजों को रेफर किया जा रहा है। इलाज कब मिलेगा, किसी को पता नहीं है।
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मेरठ में बर्न यूनिट की मांग दशकों पुरानी है। विक्टोरिया पार्क में हुए भीषण अग्निकांड के बाद से इसकी मांग की जा रही थी। माना गया था कि तब अगर बर्न यूनिट होती तो शायद बहुत से लोगों की जान बच जाती। डेढ़ दशक से ज़्यादा वक्त के बाद भी स्वास्थ्य विभाग वहीं खड़ा है। इस बर्न यूनिट में पांच बेड की आईसीयू है 20 बेड का जनरल वार्ड है। मेडिकल कॉलेज में सामान्य तौर पर हर माह 30 से 35 गंभीर जले हुए मरीज आते हैं। कम जले हुए मरीजों को तो भर्ती कर लिया जाता है, मगर गंभीर मरीजों को रेफर करना पड़ता है। मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. आरसी गुप्ता का कहना है कि मरीज भर्ती करने की व्यवस्था है। और बेहतर व्यवस्था करने की कोशिश जारी है। ऑक्सीजन पाइप लाइन और अलग से स्टाफ की मांग शासन से की गई है।