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एक साल पहले दो अप्रैल की घटना से नहीं लिया सबक

Mon, 01 Jul 2019 01:21 AM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Mon, 01 Jul 2019 01:21 AM IST
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Less than two April movement not even taken
मेरठ। फैज-ए-आम इंटर कॉलेज में बिना अनुमति के बड़ी जनसभा और उसके बाद जिस तरह जुलूस निकाला गया, उससे साफ हो गया कि पुलिस का सूचना तंत्र जहां पूरी तरह फेल हो गया है। वहीं, पुलिस के पास किसी भी हालात से निपटने के लिए पूर्व नियोजित कोई योजना नहीं है।
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मिश्रित आबादी वाले क्षेत्र इंदिरा चौक पर जिस तरह बिना अनुमति के जुलूस निकालने को लेकर पथराव और लाठीचार्ज हुआ, वह किसी बड़ी घटना का सबब बन सकता था। अहम बात ये है कि इस समय शहरवासियों के साथ पुलिस-प्रशासन प्रह्लाद नगर प्रकरण से पहले ही जूझ रहा है। इससे साफ हो चला है कि 2 अप्रैल 2018 को हुई घटना के बाद से भी पुलिस ने कोई सबक नहीं लिया है।
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सुप्रीम कोर्ट द्वारा एससीएसटी एक्ट में संशोधन के विरोध में 2 अप्रैल 2018 को अनुसूचित जाति के लोगों ने कलक्ट्रेट पर प्रदर्शन का ऐलान किया था। जिसे लेकर पहले ही इनपुट आ चुका था कि यह आंदोलन हिंसक हो सकता है। जिसके चलते किसी भी प्रदर्शन की अनुमति प्रशासन ने नहीं दी। लेकिन पुलिस ने शहर के भीतर गांवों से आने वाली भीड़ पर रोक नहीं लगाई। जब पुलिस ने शहर की सीमा पर भीड़ को रोका तो उसकी संख्या इतनी हो चुकी थी कि वह पुलिस पर भारी पड़ गई और एक बड़ा हिंसक आंदोलन हुआ। इस आंदोलन में पुलिस-प्रशासन की कार्यप्रणाली और सोच को लेकर तमाम सवाल उठे थे।
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हालात तो वैसे ही बने
रविवार को भी इसी तरह के हालात बने। युवा सेवा समिति के आह्वान पर होने वाली जनसभा और जुलूस को अनुमति नहीं दी गई। इसके बाद भी बड़ी संख्या में लोग फैज-ए-आम कॉलेज में इकट्ठा हो गए। करीब डेढ़ घंटे तक ये लोग इकट्ठा रहे। लेकिन पुलिस अधिकारी तमाशबीन बने देखते रहे। जबकि होना यह चाहिए था कि कॉलेज को सील कर वहां भीड़ आने से पहले ही रोकनी चाहिए थी। इसके बाद आसपास के क्षेत्र में भी फोर्स तैनात कर देनी चाहिए थी। लेकिन पुलिस अधिकारियों ने इसे बड़े हल्के में लिया। जिसका परिणाम ये हुआ कि भीड़ सभा के बाद जुलूस निकालने पर आमादा हो गई और भीड़ की संख्या के आगे पुलिस बल बौना साबित हुआ। भीड़ इंदिरा चौक तक पहुंच गई। जहां पर पुलिस ने भीड़ को रोका तो पथराव और लाठीचार्ज हो गया।
संवेदनशील स्थान पर बखेड़ा
जिस जगह ये पथराव और लाठीचार्ज हुआ वह स्थान शहर के सबसे संवेदनशील स्थानों में से है। 1987 के दंगे में भी यहां आग भड़की थी और 1991 के लोकसभा चुनाव में भी यहीं पर पथराव और फायरिंग हुई थी। जहां यह झड़प हुई वह मुख्य मार्ग है, जबकि इस चारो तरफ मिश्रित आबादी बसती है। ऐसे में माहौल जरा सी चूक पर भड़क सकता था। रविवार को हुए इस पूरे मामले में पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं।

बिना अनुमति प्रदर्शन कैसे
भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी ने जुलूस व सभा को लेकर पुलिस-प्रशासन को कटघरे में खड़ा किया है। उन्होंने कहा कि झारखंड की कथित घटना पर विरोध प्रदर्शन करने हेतु बिना अनुमति के इतनी बड़ी संख्या में लोग सड़क पर कैसे आए? जनता इसका जवाब चाहती है। लगता है कि दो अप्रैल की घटना से पुलिस-प्रशासन ने सबक नहीं लिया है। वाजपेयी ने कहा कि शहर हमारा है अधिकारियों का नहीं। यदि कोई अप्रिय घटना घट जाती तो अकर्मण्य अधिकारियों के कारण प्रदेश सरकार की छवि धूमिल होती। उन्होंने कहा कि वह स्वयं इस मामले में उत्तर प्रदेश शासन को अवगत कराएंगे।
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