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कैंट का जंगल बन रहा तेंदुए का हैबीटेट
अमर उजाला ब्यूरो/मेरठ
Updated Sun, 17 Apr 2016 01:50 AM IST
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तेंदुआ
- फोटो : फाइल फोटो
कैंट का जंगल तेंदुए का हैबीटेट बनता जा रहा है। रहने लायक हर चीज यहां मुहैया है। शिकार से लेकर सुनसान इलाका और जंगल। दो बार कैंट में तेंदुए का घुसना संयोग या हादसा नहीं है, बल्कि वह आसपास ही रहते हैं। किसी को नुकसान नहीं पहुंचाते और कम ही दिखाई पड़ते हैं, इस वजह से पता नहीं चलता।अहम बात यह है कि जहां भी तेंदुआ पकड़ा जाता है, वहां दूसरा जरूर पहुंचता है। यह अपने पीछे निशान छोड़ते हैं, जिसका पता दूसरे तेंदुओं को चल जाता है।
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वन्य जीव एक्सपर्ट जीएस खुशारिया के मुताबिक पकड़ा गया तेंदुआ कहीं दूर से नहीं आया, बल्कि शहर के पांच से 10 किमी दायरे का रहने वाला है। उसका रंग बताता है कि वह आसपास का ही है। पहाड़ी इलाकों में मिलने वाले तेंदुए का रंग ज्यादा चमकदार होता है। जैसे-जैसे मैदान में आते हैं यह डल पड़ जाता है। कैंट एरिया का जंगल तेंदुए का हैबीटेट बन रहा है। एक तो यह इलाका उनके लिए सेफ है। शिकारियों का डर नहीं है। रात में सुनसान रहता है, यहां उनके लिए शिकार हैं। 510 आर्मी बेस के पीछे जंगल में काफी संख्या में चीतल हैं।
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कुत्ता, बिल्ली, सूअर आदि की भरमार है। दूसरी अहम बात यह है कि तेंदुए अपनी टैरीटेरी बनाकर रहते हैं। दूसरा तेंदुए उसमें दखल नहीं देता। इसके लिए साइन छोड़कर चलते हैं। तेंदुए अपनी टैरीटेरी में पेड़ पर खरोचकर निशान बनाता है। एनल ग्लेंड से पेड़ पर छिड़काव करता है, जिससे दूसरे तेंदुए को उसकी उपस्थिति और ताकत का एहसास होता है। जब यह साइन मिलने बंद हो जाते हैं तो उसका मतलब क्षेत्र से तेंदुआ जा चुका है। फिर दूसरा उस क्षेत्र में दाखिल देने लगता है। संभावना है कि दूसरा तेंदुए कैंट में दस्तक दे। पकड़ा गया तेंदुआ शहर के आसपास रहा है। वह इंसान का आदि हो चुका था। उसके हावभाव से यह पता चल रहा था।
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जंगल के इलाके में यह न करें
- जंगल या झाड़ियों के पास बैठकर पेशाब न करें। उन पर तेंदुआ हमला कर सकता है।
- जिन ढलान पर पशु पानी पीने जाते हैं, वहां से बचें। पानी के स्रोत के पास तेंदुआ अपने शिकार के लिए घात लगाता है।
- रात में निकलने से परहेज करें। खासतौर पर बच्चों को लेकर।
- अगर जंगल या सुनसान जगह पर जा रहे हैं तो आपस में बात करते हुए चलें।
- मोबाइल पर बात न करें। इससे पता नहीं चलेगा।
पेड़ पसंदीदा ठिकाना
तेंदुए का पेड़ पसंदीदा ठिकाना है। वह कई घंटों तक उस पर बैठ सकता है। 30 से 40 फीट ऊंचाई तक जा सकता है। कैंट में ऊंचे और घने पेड़ का ध्यान रखें। तेंदुआ दिन में उस पर बैठ सकता है।
चार दिन बाद तेंदुए ने खाया मीट
कानपुर चिड़ियाघर में चार दिन बाद तेंदुए ने मीट खाया। तेंदुए का इलाज कर रहे डॉ. आरके सिंह के मुताबिक शुक्रवार रात करीब पांच किलो मीट पिंजरे में रखा गया था। जिसे तेंदुए ने चट कर दिया। स्वास्थ्य बेहतर है। गौरतलब है कि तेंदुआ पांच सात दिन तक बिना मांस खाए रह सकता है। वह एक बार में ही इतना खा लेता है कि कई दिनों तक काम चल जाए। पानी रोज चाहिए।