{"_id":"58864e484f1c1bbb7ecf4670","slug":"kutte-ki-kimat","type":"story","status":"publish","title_hn":"नोटबंदी का अबतक असर, कट्टे की कीमत ली, आलू का बीज फ्री दिया","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
नोटबंदी का अबतक असर, कट्टे की कीमत ली, आलू का बीज फ्री दिया
अमर उजाला ब्यूरो/ मेरठ
Updated Tue, 24 Jan 2017 11:16 AM IST
विज्ञापन
फाइल फोटो
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
नोटबंदी के कारण आलू का बीज कौड़ियों के दाम बिका। सीजन में जिस बीज को खरीदने के लिए किसानों की लाइन लगी थी। नोटबंदी के बाद एक भी किसान बीज लेने नहीं आया। समय गुजरता देख 1230 रुपये की कीमत के कट्टे को मात्र 25 रुपये में बेचा गया। यह कीमत बीज की नहीं, बल्कि कट्टे की ली गई। इससे जहां किसानों को राहत मिली, वहीं शीतगृह केंद्र को नुकसान उठाना पड़ा।
विज्ञापन
मोदीपुरम के राजकीय शीतगृह केंद्र से मेरठ समेत वेस्ट यूपी के किसानों को बीज भेजा जाता है। समय से पहले ही किसान अपने प्रार्थना पत्र लगा देते हैं। इस बार सरकार ने 2460 रुपये प्रति क्विंटल बीज का मूल्य घोषित किया था। 600 से अधिक किसानों ने बीज के लिए आवेदन किया। इस बीच प्रधानमंत्री ने नोटबंदी की घोषणा कर दी, पैसे न होने के कारण किसान बीज नहीं ले गए। बिक्री के लिए तीन बार नीलामी की प्रक्रिया अपनाई गई, लेकिन फिर भी शीतगृह केंद्र पर बीज रह गया। आखिर में जब बीज नहीं बिका तो फिर मुफ्त ही बीज की बिक्री करनी पड़ी। राजकीय शीतगृह केंद्र पर विभिन्न प्रजातियों का 1150 क्विंटल बीज को 25 रुपये कट्टे के हिसाब से बिक्री शुरू की गई। केवल 25 रुपये कट्टे के ही लिए गए, बीज का कोई पैसा नहीं लिया।
विज्ञापन
इन जनपदों में जाता है बीज
मेरठ, बागपत, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, बिजनौर, शामली, गाजियाबाद, गौतमबुद्धनगर, मुरादाबाद, रामपुर, बरेली, आगरा, मथुरा, बदायूं, एटा, फिरोजाबाद, शिकोहाबाद, हाथरस, अलीगढ़, बुलंदशहर, संभल, इटावा, पीलीभीत समेत अन्य जनपदों को बीज भेजा जाता है। आलू के बीज के एक कट्टे (50 किलो) की कीमत 1230 रुपये है, लेकिन बीज की बिक्री न होने पर मात्र 25 रुपये में ही बेचा गया।
विज्ञापन
बुवाई भी हुई कम
समय बीतने के बाद आलू की नीलामी की गई है। बाद में किसान बुवाई के लिए कम और पशुओं को चारे के रूप में खिलाने के लिए अधिक ले गए। बुवाई कम होने के कारण इस बार आलू का क्षेत्रफल भी कम हो गया है। इसका असर आने वाले समय में होगा।