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खादर भूमाफिया के हवाले, सरकारी खजाना खाली

Thu, 02 Jun 2016 01:35 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
अमर उजाला ब्यूरो Updated Thu, 02 Jun 2016 01:35 AM IST
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khadar ki bhumi
फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला
खादर क्षेत्र में भूमाफियाओं को प्रशासन ने सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जा करने की छूट दे दी है। ऐसी कब्जे वाली जमीनों पर खेती करने वालों से तहसील प्रशासन औसतन 30 लाख रुपये सालाना वसूलता था। पिछले 11 वर्षों से एक पाई तक नहीं वसूली गई। अब तो तहसील प्रशासन हर तिमाही जमीनों पर अवैध कब्जे न होने का प्रमाणपत्र जारी करता है। जबकि आधा खादर अवैध कब्जे में हैं तो सरकारी खजाना खाली है।
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ठेके पर सरकारी जमीन
यहां भूमाफियाओं के हौसले इतने बुलंद रहे हैं कि करीब डेढ़ दशक पहले तत्कालीन एसडीएम मवाना मानवेंद्र सिंह को भूमाफिया सुरेंद्र ग्रेटा ने टीम समेत बंधक बना लिया था। किसी तरह वे जान बचाकर निकले थे। हस्तिनापुर और परीक्षितगढ़ खादर क्षेत्र में ग्राम समाज की करीब आठ हजार एकड़ और इतनी ही वन विभाग की जमीन है। जिसमें से आधी से ज्यादा जमीन पर भूमाफियाओं ने कब्जा कर खेती की हुई है। अब ये भूमाफिया खुद खेती न कर सरकारी जमीन को ठेके पर दे रहे हैं और बीच में पैसा कमा रहे हैं।
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दस साल चली वसूली
इन भूमाफियाओं के खिलाफ 1995 में अभियान शुरू हुआ। प्रशासन इन्हें जमीन से तो बेदखल नहीं कर सका, लेकिन बोयी गयी फसल पर जुर्माना वसूलना शुरू हुआ। शुरुआत में प्रशासन को गन्ने और गेहूं की फसल से यहां पांच से दस लाख रुपये सालाना का राजस्व प्राप्त हुआ। जो साल दर साल बढ़ते बढ़ते चालीस लाख रुपये तक पहुंच गया। कलक्ट्रेट अभिलेखों के अनुसार भूमाफियाओं से अंतिम वसूली वर्ष 2005 में हुई थी।
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ये था जुर्माना वसूली का गणित
तहसील अधिकारी जुर्माना वसूलने के लिए धनराशि तय करते थे। जिसके अनुसार वर्ष 2005 में एक एकड़ फसल पर चार हजार रुपये जुर्माना तय किया गया था। लेकिन इसमें गरीब, दलित और विस्थापित होकर आये बंगाली परिवारों को कुछ छूट भी दी जाती थी। यदि यह जुर्माना वसूली जारी रहती तो आज इसका रेट सात से आठ हजार रुपये प्रति एकड़ बैठता। साफ है कि इन 11 वर्षों में तहसील प्रशासन ने करीब सात करोड़ रुपये के राजस्व को चूना लगाया है।

अब कब्जा मुक्त का प्रमाणपत्र
2005 के बाद तहसील प्रशासन ने कोई अभियान नहीं चलाया। बावजूद इसके तहसील मवाना से जारी प्रमाण पत्र पर विश्वास करें तो खादर क्षेत्र में अब जमीन पर कब्जा ही नहीं है, इसलिए कोई वसूली नहीं है। पिछले 11 वर्षों से लगातार डीएम कार्यालय में प्रमाणपत्र जमा हो रहा है। इस बार भी मई माह में जुर्माना वसूली की जगह प्रमाणपत्र ही आया है।

वन विभाग ने खुद मारी पैरों में कुल्हाड़ी
वन विभाग ने खुद प्रशासन की राह में अड़ंगा पैदा किया था। पूर्व में प्रशासन ग्राम समाज के साथ वन विभाग की कब्जायी जमीन पर जुर्माना वसूलता रहा। लेकिन वन विभाग ने इस पर आपत्ति जता दी। इसके बाद तहसील ने सिर्फ ग्राम समाज की भूमि से ही जुर्माना वसूलना शुरू कर दिया। ऐसे में वन विभाग न तो अपनी जमीन खाली करा पाया और न ही जुर्माना ही वसूल पाया और पूरी कार्रवाई ठंडे बस्ते में डाल दी।

सीमांकन शुरू होने से पहले ही बंद
खादर क्षेत्र में जमीन को लेकर उठने वाले विवादों का निस्तारण करने के लिए सीमांकन की योजना बनी थी। जिसमें मुरादाबाद जनपद और मेरठ जनपद की जमीनों का सीमांकन करने के साथ ही सरकारी जमीनों का भी सीमांकन होना था। लेकिन इसकी फाइल कागजों में ही दम तोड़ गयी।


यह कहते हैं डीएम
डीएम पंकज यादव के अनुसार यह सही है कि खादर में सरकारी जमीन पर कब्जा है। इस बार जब तहसील दिवस के बाद मैं किशोरपुर गया था तो वहां यह बात मेरे संज्ञान में आयी थी और उसके बाद सभी भूमाफियाओं को नोटिस जारी करने के आदेश दिए गए हैं। कुछ को नोटिस जारी भी हुए हैँ। शीघ्र ही जमीन को कब्जा मुक्त कराने और जुर्माना वसूली की कार्रवाई शुरू की जाएगी।
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