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अदालत तीन तलाक को तलाक नहीं मानती तो सजा कैसी : देवबंदी उलमा

Sun, 17 Dec 2017 12:20 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो/ मेरठ
अमर उजाला ब्यूरो/ मेरठ Updated Sun, 17 Dec 2017 12:20 PM IST
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court does not consider divorce as divorce : deobandi ulema
देवबंद

तीन तलाक को लेकर तीन साल की सजा के प्रावधान को कैबिनेट की मंजूरी मिलने पर देवबंदी उलमा ने इस पर बड़ा सवाल खड़ा किया है। उनका कहना है कि जब अदालत तीन तलाक को मानती ही नहीं तो फिर इसमें सजा देने का क्या औचित्य है। 

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पढ़ें : राजस्थान में लव जिहाद के नाम पर युवक की हत्या शर्मनाक : देवबंदी उलमा
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तंजीम उलमा-ए-हिंद के प्रदेशाध्यक्ष व अरबी के प्रसिद्ध विद्वान मौलाना नदीमुलवाजदी का कहना है कि अभी कानून बना नहीं है उसका मसौदा तैयार हुआ है। यह पार्लियामेंट में पेश होगा उस पर बहस होगी उसके बाद ही यह कानून की शक्ल लेगा। हुकूमत कोई भी कानून बनाए उससे पहले इससे संबंधित लोग जैसे उलमा, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड या दूसरी तजीमों को इस गुफ्तगू में शामिल करना चाहिए और उनसे मशविरा लेना चाहिए। क्योंकि यह मुसलमानों से संबंधित मसला है। मौलाना नदीमुलवाजदी ने कहा कि टेक्निकल सवाल यह है कि जब अदालत तीन तलाक को मानती ही नहीं तो फिर सजा किस बात की दी जाएगी। लेकिन अगर अदालत तीन तलाक को मानती है तो फिर ऑल इंडिया मुस्लिम पसर्नल लॉ बोर्ड और मुसलमानों की बात पर पक्की मुहर लग जाएगी कि इस्लाम में तीन तलाक मान्य है। जिसे अदालत ने मान लिया। क्योंकि पूर्व में अदालत तीन तलाक पर पाबंदी लगा चुकी है, जबकि दारुल उलूम और दूसरे इदारों से जो फतवे आते हैं उसमें साफ कहा गया है कि तीन तलाक देने से तीन तलाक हो जाएगी। वाजदी ने कहा कि हुकूमत तीन तलाक पर सजा देना चाह रही तो सवाल यह भी उठता है कि क्या वह तीन तलाक हुई है या नहीं आगर नहीं हुई है तो सजा किस बात की और अगर हो गई है तो क्या हुकूमत ने मुसलमानों के रुख को तसलीम (मान) लिया है। 
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