क्या सिनौली में तो नहीं दफनाए गए योद्धा? इतिहास पर डाले एक नजर
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बागपत के सिनौली में उत्खनन के बाद इतिहासकारों के बीच नई बहस छिड़ गई है। क्या सिनौली की सभ्यता हड़प्पा से प्राचीन है और भारतीय इतिहास को एक नई संस्कृति और मानव सभ्यता मिलने वाली है। शहजाद राय शोध संस्थान के निर्देशक अमित राय जैन दावा करते हैं कि यह भी संभव है कि महाभारत युद्ध के योद्धाओं को सिनौली में दफनाया गया हो।
वह बताते हैं कि कुरू जनपद की राजधानी हस्तिनापुर गंगा नदी के किनारे थी और महाभारत का युद्ध स्थल यमुना नदी के किनारे पर। कुरूक्षेत्र के निकट ही करनाल-पानीपत और सोनीपत हैं। इसके नजदीक ही सिनौली का यह पूरा क्षेत्र है। पांडवों ने यमुना नदी के दोनों ओर प्राचीन वयाग्रप्रस्त (बागपत), वार्णावृत (बरनावा), स्वर्णप्रस्त (सोनीपत) एवं पर्णप्रस्त (पानीपत) गांव मांगे थे। कुरू जनपद में यही यमुना नदी के दोनों ओर का यही हिस्सा है कि जो सबसे अधिक महत्वपूर्ण रहा होगा। महाभारत युद्ध में जिन हथियारों का इस्तेमाल कर युद्ध लड़ा गया।
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सिनौली में कब्रगाह तो कहां रहते थे लोग
सिनौली फिर से चर्चा में है। दूसरी बार उत्खनन में फिर कब्र गाह मिला है। यह तो साबित हो गया कि यहां का इतिहास पांच हजार साल या इससे भी अधिक पुराना है, लेकिन अभी कई सवाल बाकी है। सिनौली में अगर कब्रगाह था तो आबादी कहां थी और यहां से कितनी दूर थी। किस तरह का शहर बसाया गया था या फिर कोई बड़ा ग्रामीण संस्कृति का गांव था। अनुमान तो यह है कि यमुना नदी नजदीक ही है। इसके आसपास ही कोई बड़ा गांव या शहर रहा होगा, गांव या शहर के लोगों के शवों को सिनौली और इसके आसपास के क्षेत्र में दफनाया जाता रहा है।
वहीं एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. केके शर्मा कहते हैं कि यहीं लंबी जांच और सर्वेक्षण का विषय है। पिछले पांच हजार साल में कितने गांव, कितने शहर उजड़े और फिर दोबारा बसाए गए। वर्तमान समय में भी आबादी से दूर ही श्मशान घाट या कब्रिस्तान को दूर बनाया जाता है, तब भी इसी तरह की परंपरा रही होगी।
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