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Meerut News: गठिया बाय और चर्म रोग ठीक करने के लिए विख्यात है बाबा सिद्ध की तपोस्थली
Mon, 29 Jul 2024 02:34 AM IST
मेरठ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, मेरठ
संवाद न्यूज एजेंसी, मेरठ
Updated Mon, 29 Jul 2024 02:34 AM IST
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सहारनपुर, नानौता। गांव सोना अर्जुनपुर बाबा सिद्ध की तपोस्थली के रूप में दूर दूर तक विख्यात है। तपोस्थली के पास स्थित सरोवर की मिट्टी के लेप से गठिया बाय और चर्म रोग ठीक होने की मान्यता के चलते यहां देश के विभिन्न हिस्सों से रोगग्रस्त व्यक्ति पहुंचते हैं। लोगाें का विश्वास है कि तालाब की मिट्टी से लेप करने तथा सूखने पर तालाब में स्नान करने से वह रोग मुक्त हो जाते हैं। इस मिट्टी को ग्रामीण चंदन कहते हैं। इस प्रक्रिया के दौरान रोग ग्रस्त व्यक्ति को गांव के दक्षिणी छोर पर बसे परिवारों के यहां से मांग कर भोजन करना पड़ता है। ठीक होने के बाद वे भंडारा कर बाबा सिद्ध के प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं।
- बाबा ने तपस्या के बाद ले ली थी समाधि
गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि ढाई सौ साल पहले गांव में पहुंचे गुरु गोरखनाथ के भगत एक महात्मा ने तालाब के बीच स्थित मिट्टी के टीले और यहां खड़े वृक्ष को सिद्धपीठ बताते हुए तपस्या की अनुमति मांगी थी। ग्रामीणों की सहमति पर उन्होंने तपस्या शुरू की थी। वह सुबह शाम केवल दूध लेते थे। एक दिन महात्मा जी सुबह तीन बजे स्नान करते समय अपनी आंतों को बाहर निकाल कर सफाई कर रहे थे, जिस पर दूध ले जाने वाला सेवादार घबरा गया। इसके बाद महात्मा जी ने समाधि लेते हुए यह संदेश छोड़ा था कि जो भी गठिया बाय व चर्म रोग से ग्रस्त व्यक्ति इस तालाब की मिट्टी अपने शरीर पर लगा कर सूखने के बाद तालाब में स्नान करेगा तो वह ठीक हो जाएगा। इसके बाद तपोस्थान के सेवादार आभे सिंह ने समाधि स्थल पर मिट्टी से बाबा सिद्ध जी की मूर्ति बनाकर पूजा अर्चना शुरू कर दी। बाद में यहां भव्य मंदिर का निर्माण किया गया।
- समिति रखती है रोगियों की सुविधा का ख्याल
बाबा सिद्ध मंदिर समिति के उपाध्यक्ष बल सिंह पुंडीर ने बताया कि मंदिर समिति द्वारा दूर दराज से आने वाले श्रद्धालुओं व रोगियों के लिए रहने, सोने सहित अन्य सभी सुविधाओं का विशेष ध्यान रखा जाता है। इसके लिए कोई धनराशि नहीं ली जाती है।
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-- मंदिर परिसर में हैं चार सौ साल पुराने कदम के वृक्ष
ग्रामीण सुधीर पुंडीर ने बताया कि बाबा सिद्ध मंदिर परिसर में लगभग चार सौ साल पुराने कदम के वृक्ष है। जो कि सिद्ध वृक्ष है। इनके नीचे बैठकर बाबा सिद्ध जी ने तपस्या करते हुए समाधि ली थी।
- शुभ कार्यों से पहले टेकते हैं माथा
ग्रामीण भोपाल सिंह पुंडीर ने बताया कि गांव में किसी भी समाज के यहां शादी समारोह या कोई भी अन्य आयोजन होने से पूर्व बाबा सिद्ध मंदिर पर आकर माथा टेकते हैं। कार्य सिद्धि के लिए प्रार्थना करते हैं।
- ज्येष्ठ और आषाढ़ मास में भरता है मेला
धर्मपाल सिंह ने बताया कि बाबा सिद्ध मंदिर परिसर में ज्येष्ठ व आषाढ़ मास के शनिवार व रविवार को धार्मिक मेले का आयोजन होता है। इसमें देश के कई राज्यों से श्रद्धालु आते हैं। मनोकामना पूरी और ठीक होने पर श्रद्धालुओं द्वारा मंदिर में भंडारे का आयोजन किया जाता है।
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- बाबा ने तपस्या के बाद ले ली थी समाधि
गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि ढाई सौ साल पहले गांव में पहुंचे गुरु गोरखनाथ के भगत एक महात्मा ने तालाब के बीच स्थित मिट्टी के टीले और यहां खड़े वृक्ष को सिद्धपीठ बताते हुए तपस्या की अनुमति मांगी थी। ग्रामीणों की सहमति पर उन्होंने तपस्या शुरू की थी। वह सुबह शाम केवल दूध लेते थे। एक दिन महात्मा जी सुबह तीन बजे स्नान करते समय अपनी आंतों को बाहर निकाल कर सफाई कर रहे थे, जिस पर दूध ले जाने वाला सेवादार घबरा गया। इसके बाद महात्मा जी ने समाधि लेते हुए यह संदेश छोड़ा था कि जो भी गठिया बाय व चर्म रोग से ग्रस्त व्यक्ति इस तालाब की मिट्टी अपने शरीर पर लगा कर सूखने के बाद तालाब में स्नान करेगा तो वह ठीक हो जाएगा। इसके बाद तपोस्थान के सेवादार आभे सिंह ने समाधि स्थल पर मिट्टी से बाबा सिद्ध जी की मूर्ति बनाकर पूजा अर्चना शुरू कर दी। बाद में यहां भव्य मंदिर का निर्माण किया गया।
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- समिति रखती है रोगियों की सुविधा का ख्याल
बाबा सिद्ध मंदिर समिति के उपाध्यक्ष बल सिंह पुंडीर ने बताया कि मंदिर समिति द्वारा दूर दराज से आने वाले श्रद्धालुओं व रोगियों के लिए रहने, सोने सहित अन्य सभी सुविधाओं का विशेष ध्यान रखा जाता है। इसके लिए कोई धनराशि नहीं ली जाती है।
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ग्रामीण सुधीर पुंडीर ने बताया कि बाबा सिद्ध मंदिर परिसर में लगभग चार सौ साल पुराने कदम के वृक्ष है। जो कि सिद्ध वृक्ष है। इनके नीचे बैठकर बाबा सिद्ध जी ने तपस्या करते हुए समाधि ली थी।
- शुभ कार्यों से पहले टेकते हैं माथा
ग्रामीण भोपाल सिंह पुंडीर ने बताया कि गांव में किसी भी समाज के यहां शादी समारोह या कोई भी अन्य आयोजन होने से पूर्व बाबा सिद्ध मंदिर पर आकर माथा टेकते हैं। कार्य सिद्धि के लिए प्रार्थना करते हैं।
- ज्येष्ठ और आषाढ़ मास में भरता है मेला
धर्मपाल सिंह ने बताया कि बाबा सिद्ध मंदिर परिसर में ज्येष्ठ व आषाढ़ मास के शनिवार व रविवार को धार्मिक मेले का आयोजन होता है। इसमें देश के कई राज्यों से श्रद्धालु आते हैं। मनोकामना पूरी और ठीक होने पर श्रद्धालुओं द्वारा मंदिर में भंडारे का आयोजन किया जाता है।