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Meerut News: गंगा घाट पर परंपरा आस्था और आध्यात्म के साथ जुड़ी है आर्थिकी

Wed, 05 Nov 2025 07:43 PM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Wed, 05 Nov 2025 07:43 PM IST
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At the Ganga Ghats, tradition, faith and spirituality are intertwined with economics.
गंगा मेले से हजारों लोगों को मिलता है रोजगार
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रविंद्र चौहान
हस्तिनापुर। मखदूमपुर मेला केवल परंपरा, आस्था और आध्यात्म से ही नहीं बल्कि हजारों लोगों की कमाई का भी जरिया है। श्रद्धालुओं के साथ-साथ इस मेले का मेरठ सहित अन्य जनपद के लोगों को भी इंतजार रहता है। मेले में आए कई दुकानदारों ने कहा कि मेले से की गई कमाई कई महीने उनका साथ देती है। बुधवार को मखदूमपुर मेला पांच दिनों के बाद संपन्न हो गया। श्रद्धालुओं के बाद दुकानदारों के लौटने का सिलसिला भी शाम को शुरू हो गया।
गंगा मेले में अपना सामान बेचने आए दुकानदारों में खासा उल्लास था। वह कहते हैं कि यह मेला पूरी तरह निशुल्क होता है और इस मेले में पांच दिनों तक की गई कमाई कई महीने तक उनका साथ देती है। इस मेले का उन्हें बेसब्री से इंतजार रहता है। क्षेत्र ही नहीं आसपास के जनपदों के हजारों लोगों की आर्थिकी भी इस मेले पर टिकी हुई है। इस मेले में एक तरफ गंगा में स्नान पुण्य लाभ के साथ पूर्वजों की मुक्ति का मार्ग है तो दूसरी तरफ बड़ी संख्या में यहां हजारों लोगों को रोजगार भी मिलता है। इसलिए आस्था के इस पवित्र समागम में धर्म और अर्थ दोनों एक साथ देखने को मिले। गंगा मेले में पहुंचने वाले श्रद्धालु यहां पर लगातार पांच दिनों तक कड़कड़ाती ठंड में यूं ही नहीं रुकते क्योंकि उन्हें यहां पर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
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आर्थिक स्थिति के लिए छोटे कारोबार करने वाले स्थानीय लोगों को घर बैठे ही एक बड़ा बाजार मिल जाता है जहां पर वह अपने उत्पादों को अधिक लोगों तक आसानी से पहुंचते हैं गंगा स्नान मेला उनके लिए आर्थिक रूप से और पौराणिक रूप से काफी महत्व रखता है। जहां पर वह अपनी पहचान बनाकर आसानी से आगे बढ़ सकते हैं। (संवाद)
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दुकानदारों बोले-

दौराला निवासी शिवकुमार मेले में खेल का सामान लेकर पहुंचे। उनका कहना है कि पहले खेल के सामानों की खरीदारों की भरमार रहती थी, लेकिन अब सामान की बिक्री कम हो रही है। नई पीढ़ी मोबाइल पर मशगूल रहती है। इसलिए खेल के सामान अधिक खरीद नहीं रही।

मुजफ्फरनगर निवासी राजपाल की मेले में देवी-देवताओं की मूर्तियों की दुकान थी। उनका कहना है कि खूब बिक्री हुई। पहले चंद लोग ही खरीदारी करते थे। अब अच्छे परिवारों की महिलाएं भी देवी-देवताओं की मूर्तियां खरीद कर ले जा रही हैं।


बिजनौर के सलीम ने बताया कि मेले में उनकी कप-प्लेट की दुकान थी। वह दशकों से मेले में आ रहे हैं। उनका कहना है कि पहले मेलों में ही लोग जरूरत का सामान खरीद कर ले जाते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है। अपने आसपास के बाजार से ही खरीदारी कर लेते हैं। मेले आदि का इंतजार नहीं करते।


मेरठ की राजकुमारी ने बताया कि समय के साथ-साथ बदलाव देखे जा रहे हैं। पहले कांच की चूड़ियों का बहुत शौक होता था। महिलाएं पहनती थी और घर के लिए ले जाती थी परंतु आज बिक्री बहुत कम हो गई है फिर भी जो बिकता है उसमें अच्छी कमाई है।
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