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इतिहास में अमर हैं ये वीर सपूत, ऐसे किया अभिनंदन, फिर कहानियां सुनाकर युवाओं में भरा जोश

Fri, 22 Nov 2019 05:19 PM IST
कपिल kapil न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ Published by: कपिल kapil Updated Fri, 22 Nov 2019 05:19 PM IST
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All twenty one Paramveer Chakra winners was greeted in ccsu Meerut
सीसीएसयू में वीर सपूतों का अभिनंदन किया गया - फोटो : अमर उजाला

चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी (सीसीएसयू) में 22 नवंबर शुक्रवार को सभी 21 परमवीर चक्र विजेताओं का अभिनंदन किया गया। इस दौरान सभी परमवीर चक्र विजेताओं की बहादुरी की कहानियां युवाओं को सुनाई गईं। 18 शूरवीरों को यह पुरस्कार मरणोपरांत दिया गया। इसके बारे में भी युवाओं को रूबरू कराया गया। 

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परम वीर चक्र सैन्य सेवा तथा उससे जुड़े हुए लोगों को दिया जाने वाला भारत का सर्वोच्च सैन्य अलंकरण है। यह पदक दुश्मन के सामने अद्वितीय साहस और शूरता का परिचय देने पर प्रदान किया जाता है। इस पदक को देने की शुरुआत 26 जनवरी 1950 से हुई थी और यह पदक मरणोपरांत भी दिया जाता है। 
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कारगिल युद्ध में कई गोलियां लगने के बाद अदम्य साहस और शौर्य का परिचय देकर तिरंगा फहराने वाले परमवीर चक्र विजेता योगेंद्र सिंह यादव ने समारोह में अपनी वीर गाथा से युवाओं में जोश भर दिया। 
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बता दें कि जम्मू कश्मीर में नौ गोलियां लगने के बाद भी आतंकियों का खात्मा करने वाले सीआरपीएफ के जांबाज कमांडेंट चेतन चीता भी इस कार्यक्रम में शामिल रहे। कार्यक्रम का आयोजन सर छोटूराम इंजीनियरिंग कॉलेज और द इनिसिएटिव फॉर द मॉरल एंड कल्चर ट्रेनिंग (आईएमसीटीएफ) की तरफ से नेताजी सुभाष चंद्र बोस प्रेक्षागृह में किया गया।

परमवीर वंदनम कार्यक्रम की कनवीनर प्रो. जयमाला और आईएमसीटीएफ मेरठ के कोआर्डिनेटर आरएन गर्ग ने गुरुवार को प्रेस कांफ्रेंस में इसकी जानकारी दी थी। उन्होंने बताया था कि इस आयोजन का मकसद युवाओं को भारतीय सेना से जोड़ना है, जो देश की रक्षा की खातिर शहीद हो गए।

कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि मेजर जनरल एमके दास वीएसएम सेना मेडल और ब्रिगेडियर हरमीत सेठी भी रहे। आईएमसीटीएफ के ऑल इंडिया को-कनवीनर लक्ष्मी नारायण भालाजी भी कार्यक्रम में बतौर अतिथि शामिल रहे। कुलपति प्रो. एनके तनेजा के निर्देशन में हो रहे इस कार्यक्रम में सभी परमवीर चक्र विजेताओं के बारे में जानकारी दी गई।

आज तक इनको मिला परमवीर चक्र 
परमवीर चक्र भारत का सर्वोच्च शौर्य सैन्य अलंकरण है, जो उच्च कोटि की शूरवीरता एवं त्याग के लिए प्रदान किया जाता है। ज्यादातर स्थितियों में यह सम्मान मरणोपरांत दिया गया है। इस पदक की स्थापना 26 जनवरी 1950 को की गई थी, जब भारत गणराज्य घोषित हुआ था। भारतीय सेना के किसी भी अंग के अधिकारी या कर्मचारी इस पदक के पात्र होते हैं। इससे पहले जब भारतीय सेना ब्रिटिश सेना के तहत कार्य करती थी तो सेना का सर्वोच्च सम्मान विक्टोरिया क्रास हुआ करता था।

भारतीय सेना में ये पदक आज तक 21 वीरों को दिया गया है। 14 वीरों को यह पदक मरणोपरांत दिया गया। जिन शूरवीरों को ये पदक मिला है उनमें मेजर सोमनाथ शर्मा (1947), नायक यदुनाथ सिंह (1948), सेकेंड लेफ्टिनेंट राम राघोबा राणे (1948), कंपनी हवलदार मेजर पीरू सिंह (1948), लांस नायक करम सिंह (1948), कैंप्टन गुरबचन सिंह सलारिया (1961), मेजर धनसिंह थापा (1962), सूबेदार जोगिंदर सिंह (1962), मेजर शैतान सिंह (1962), हवलदार अब्दुल हमीद (1965), लेफ्टिनेंट कर्नल एबी तारापोर (1965), लांस नायक अलबर्ट एक्का (1971), फ्लाइंग ऑफिसर निर्मलजीत सिंह सेखो (1971), लेफ्टिनेंट अरुण खेतरपाल (1971), मेजर होशियार सिंह (1971), नायब सूबेदार बाना सिंह (1987), मेजर रामास्वामी परमेश्वरन (1987), लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडेय (1999), ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव (1999), राइफलमैन संजय कुमार (1999) और कैप्टन विक्रम बत्रा (1999) शामिल हैं। 

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