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गंगा की गोद में समा गए आधा दर्जन गांव, कई समा जाने की ओर
Updated Sun, 09 Sep 2018 02:44 AM IST
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शरद गुप्ता
मवाना। आजादी के सात दशक बाद भी हस्तिनापुर के खादर क्षेत्र में बाढ़ से तबाही का स्थायी समाधान नहीं हो सका है। सरकार आई और चली गईं। इसके बावजूद गंगा किनारे पक्का तटबंध नहीं बन सका। इसके चलते आधा दर्जन गांव नक्शे से मिट चुके हैं। कई गांव मिटने की कगार पर हैं।
हस्तिनापुर खादर क्षेत्र के लोगों को वर्षों से बाढ़ का प्रकोप झेलना पड़ रहा है। 56 वर्षीय अजब सिंह बताते हैं वे फतेहपुर प्रेम के राजस्व गांव गांवड़ी के रहने वाले हैं। जब वे छोटे थे तब भी बाढ़ का प्रकोप झेलना पड़ता था। विस्थापित होते-होते बचपन से बुढ़ापा आ गया। उन्होंने बताया कि एक समय था जब गांवड़ी में लगभग 50 परिवार रहते थे, लेकिन 1977 के बाद आज सिर्फ नाम का ही रह गया है। गांव की पूरी भूमि गंगा में समा चुकी है। इसके अतिरिक्त बेला गांव उनकी याद से पहले ही नक्शे से मिट चुका था। बुहा, लालपुर, हादीपुर, शेरपुर गांव का भी यही हाल हुआ। जिस कारण लगभग 300 से अधिक परिवारों को यहां से पलायन करना पड़ा। बाढ़ का स्थायी समाधान न होने से फतेहपुर प्रेम में मात्र 15 से 20 परिवार रह रहे हैं।
हजारों एकड़ भूमि गंगा के में समाई
फतेहपुर प्रेम गांव निवासी कुलदीप सिंह ने बताया कि हर साल बाढ़ के आने के चलते तटबंध टूट जाता है। जिस कारण कटान होने से गंगा का लगातार विस्तार हो रहा है। इससे हजारों एकड़ भूमि गंगा में समा चुकी है। जिस कारण सैकड़ों परिवारों को यहां से पलायन कर गए।
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मुआवजा नहीं, स्थायी समाधान चाहिए
ग्रामीण हरजीत सिंह का कहना है कि बाढ़ के चलते हर वर्ष यहां के किसानों को करोड़ों का नुकसान होता है। संबंधित विभाग के अधिकारी, विधायक, मंत्री दौरा करते हैं और मुआवजे का आश्वासन देते हैं। हरजीत सिंह ने कहा कि सरकार से मुआवजे में मिलता ही क्या है। लाखों के नुकसान का 10-15 हजार रुपये का मुआवजा मिलता है। उन्हें मुआवजा नहीं बल्कि पक्का तटबंध बनाकर स्थायी समाधान चाहिए। यहां पक्का तटबंध बनाने के लिए 2014 से फाइल चल रही है परंतु बाढ़ खत्म होने के बाद फाइल दफ्तरों में दबकर रह जाती है।
2013 के बाद से नहीं उठाया ठोस कदम
ग्रामीण हरजीत सिंह व कुलदीप सिंह ने बताया कि 2013 में केदरनाथ में बाढ़ आने के बाद गंगा के पानी ने खादर क्षेत्र में भी प्रलय मचा दी थी। उस दौरान गंगा किनारे बने तटबंध को ठीक कर दिया था, लेकिन इसके बाद अधिकारियों ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया। बाढ़ आने के बाद अधिकारियों को तटबंध की याद आती है, जबकि यह कार्य समय से पहले अधिकारियों को करना चाहिए। उन्होंने कहा कि बाढ़ को देखते हुए ग्रामीणों को ही मोर्चा संभालना पड़ता है, इसके बाद सिंचाई विभाग आकर कार्य की इतिश्री कर श्रेय लूट लेता है।
बाढ़ से खादर क्षेत्र के गांवों में भारी नुकसान हुआ है। यहां के पीड़ित किसानों को उचित मुआवजा दिलाया जायेगा। साथ ही पक्का तटबंध बनाने के लिए मुख्यमंत्री से मिलकर मांग करेंगे। जल्द ही वह रिपोर्ट मुख्यमंत्री को सौंपेंगे। - सुरेश राणा, गन्ना राज्यमंत्री
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मवाना। आजादी के सात दशक बाद भी हस्तिनापुर के खादर क्षेत्र में बाढ़ से तबाही का स्थायी समाधान नहीं हो सका है। सरकार आई और चली गईं। इसके बावजूद गंगा किनारे पक्का तटबंध नहीं बन सका। इसके चलते आधा दर्जन गांव नक्शे से मिट चुके हैं। कई गांव मिटने की कगार पर हैं।
हस्तिनापुर खादर क्षेत्र के लोगों को वर्षों से बाढ़ का प्रकोप झेलना पड़ रहा है। 56 वर्षीय अजब सिंह बताते हैं वे फतेहपुर प्रेम के राजस्व गांव गांवड़ी के रहने वाले हैं। जब वे छोटे थे तब भी बाढ़ का प्रकोप झेलना पड़ता था। विस्थापित होते-होते बचपन से बुढ़ापा आ गया। उन्होंने बताया कि एक समय था जब गांवड़ी में लगभग 50 परिवार रहते थे, लेकिन 1977 के बाद आज सिर्फ नाम का ही रह गया है। गांव की पूरी भूमि गंगा में समा चुकी है। इसके अतिरिक्त बेला गांव उनकी याद से पहले ही नक्शे से मिट चुका था। बुहा, लालपुर, हादीपुर, शेरपुर गांव का भी यही हाल हुआ। जिस कारण लगभग 300 से अधिक परिवारों को यहां से पलायन करना पड़ा। बाढ़ का स्थायी समाधान न होने से फतेहपुर प्रेम में मात्र 15 से 20 परिवार रह रहे हैं।
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हजारों एकड़ भूमि गंगा के में समाई
फतेहपुर प्रेम गांव निवासी कुलदीप सिंह ने बताया कि हर साल बाढ़ के आने के चलते तटबंध टूट जाता है। जिस कारण कटान होने से गंगा का लगातार विस्तार हो रहा है। इससे हजारों एकड़ भूमि गंगा में समा चुकी है। जिस कारण सैकड़ों परिवारों को यहां से पलायन कर गए।
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मुआवजा नहीं, स्थायी समाधान चाहिए
ग्रामीण हरजीत सिंह का कहना है कि बाढ़ के चलते हर वर्ष यहां के किसानों को करोड़ों का नुकसान होता है। संबंधित विभाग के अधिकारी, विधायक, मंत्री दौरा करते हैं और मुआवजे का आश्वासन देते हैं। हरजीत सिंह ने कहा कि सरकार से मुआवजे में मिलता ही क्या है। लाखों के नुकसान का 10-15 हजार रुपये का मुआवजा मिलता है। उन्हें मुआवजा नहीं बल्कि पक्का तटबंध बनाकर स्थायी समाधान चाहिए। यहां पक्का तटबंध बनाने के लिए 2014 से फाइल चल रही है परंतु बाढ़ खत्म होने के बाद फाइल दफ्तरों में दबकर रह जाती है।
2013 के बाद से नहीं उठाया ठोस कदम
ग्रामीण हरजीत सिंह व कुलदीप सिंह ने बताया कि 2013 में केदरनाथ में बाढ़ आने के बाद गंगा के पानी ने खादर क्षेत्र में भी प्रलय मचा दी थी। उस दौरान गंगा किनारे बने तटबंध को ठीक कर दिया था, लेकिन इसके बाद अधिकारियों ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया। बाढ़ आने के बाद अधिकारियों को तटबंध की याद आती है, जबकि यह कार्य समय से पहले अधिकारियों को करना चाहिए। उन्होंने कहा कि बाढ़ को देखते हुए ग्रामीणों को ही मोर्चा संभालना पड़ता है, इसके बाद सिंचाई विभाग आकर कार्य की इतिश्री कर श्रेय लूट लेता है।
बाढ़ से खादर क्षेत्र के गांवों में भारी नुकसान हुआ है। यहां के पीड़ित किसानों को उचित मुआवजा दिलाया जायेगा। साथ ही पक्का तटबंध बनाने के लिए मुख्यमंत्री से मिलकर मांग करेंगे। जल्द ही वह रिपोर्ट मुख्यमंत्री को सौंपेंगे। - सुरेश राणा, गन्ना राज्यमंत्री