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चिकित्सकों और सुविधाओं की कमी से जूझ रहे अस्पताल के भरोस सौ गांव
Updated Wed, 27 Jun 2018 08:52 PM IST
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शरद गुप्ता
मवाना। करोड़ों रुपये खर्च करके सीएचसी में महिलाओं के लिए बनाए नए भवन में भी सुविधाओं का टोटा है। इसके लिए शासन को प्रस्ताव भेजे सालों बीत गए परंतु सरकार की हीलाहवाली के चलते क्षेत्रीय महिलाएं निजी अस्पताल में प्रसव कराने को मजबूर हैं।
नगर स्थित सीएचसी परिसर में गर्भवती महिलाओं के लिए लगभग छह साल पहले करोड़ों रुपए खर्च करके नया भवन बनाया गया था। इस दौरान भवन का निर्माण यह सोचकर कराया गया कि यहां से जुड़े लगभग सौ गांवों की गर्भवती महिलाओं को प्रसव के दौरान सभी सुविधाएं मिल सकें। वहीं, गरीब लोग प्राइवेट अस्पतालों में महंगा इलाज कराने से बच सकें। इस भवन में वार्ड, ओटी, नवजात बच्चों के लिए नर्सरी एवं वार्ड बनना था। हालांकि महिलाओं को भर्ती करने के लिए वार्ड के अतिरिक्त यहां कोई अन्य सुविधा आज तक नहीं मिल सकी है। जिस कारण आज भी दूरदराज से प्रसव के लिए आने वाली महिलाओं को प्राइवेट अस्पतालों में ही जाना पड़ रहा है।
महिला चिकित्सक भी नहीं
अस्पताल के निर्माण के बाद यहां दो महिला चिकित्सकों डॉ. सुमन एवं डॉ. रितिका की तैनाती की गई थीं। सर्जन डॉ. सुमन मई में प्रमोशन के चलते दूसरे जिले में जा चुकी हैं। वहीं, फिजिशियन डॉ. रितिका का बुधवार को अन्यत्र स्थानांतरण हो गया। इसके चलते अस्पताल महिला चिकित्सक विहीन हो गया है। इतना ही नहीं यहां पर प्रसव कराने आने वाली गर्भवती महिलाओं की संख्या में प्रत्याशित रूप से कमी आई है।
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माह प्रसव
अप्रैल 332
मई 300
जून 25
उपकेंद्र पर लटके ताले
गांवों से गर्भवती महिलाओं को यहां लाने के लिए वहां पर उपकेंद्र बनाए गए हैं। वहां आशा और एएनएम गर्भवती महिलाओं का टीकाकरण करती हैं। यही नहीं प्रसव की तारीख नजदीक आने के दौरान वे महिलाओं को जिला अस्पताल लाने का भी कार्य करती हैं। उपकेंद्रों पर ताले लटके होने से महिलाओं को सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं। मवाना ब्लॉक के भैंसा गांव में पिछले कई महीने से ताले लटके हुए हैं। परिसर में बड़ी-बड़ी घास उगी हुई है और कमरे में धूल एवं गंदगी का बसेरा है।
अस्पताल बना कुत्तों का बसेरा
तीन मंजिला इमारत के प्रथम तल पर बने वार्ड में महिलाओं को भर्ती किया जाता है। दूसरा और तीसरा तल कोई सुविधा नहीं होने के कारण वीरान पड़े हैं। यहां कुत्ते आराम फरमा रहे हैं। नियमित सफाई नहीं होने के चलते पूरा फर्श धूल से अटा है। यहां तक कि दूसरे एवं तीसरे मंजिल पर लगी लाइटें भी उखाड़ दी गई हैं।
अस्पताल में सुविधाओं के लिए सरकार को प्रस्ताव भेजा हुआ है। इसके स्वीकृत होते ही सभी सुविधाएं मुहैया होंगी। उपकेंद्रों को भी खोलने के लिए सभी को सख्त निर्देश दिए जाएंगे। -डॉ. अनिल शर्मा, कार्यवाहक सीएचसी प्रभारी
मुख्य बातें
अस्पताल में महिला चिकित्सक नहीं होने से प्रसव निजी अस्पतालों में कराने को मजबूर
महिलाओं के लिए बनाए तीन मंजिला भवन में दो मंजिल बंद
सुरक्षित प्रसव के मामलों में करीब 92 फीसदी की गिरावट दर्ज
कहां से हो इलाज जब खुद ही बीमार पड़े उपस्वास्थ्य केंद्र
बहसूमा। बहसूमा क्षेत्र में संक्रमित रोग तेजी से जड़े जमा रहे हैं। यहां सैकड़ों की तादाद में लोग वायरल बुखार तथा डायरिया की चपेट में हैं। इसके बावजूद ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवा देने के लिए बने उपस्वास्थ्य केंद्र बोझ साबित हो रहे हैं। इन स्वास्थ्य केंद्रों में से ज्यादातर पर ताले लटके हुए हैं। हालांकि देखरेख बहसूमा स्थित उप स्वास्थ्य केंद्र में ऊंची-ऊंची घास उगी है। कुल मिलाकर दूसरों को इलाज देने वाले उप स्वास्थ्य केंद्र खुद बीमार हैं।
बता दें कि शासन द्वारा गंावों में उचित स्वास्थ्य सेवा देने के लिए उप स्वास्थ्य केद्रों का निर्माण कराया गया था। इस पर उचित देखरेख एवं स्टाफ के अभाव में ग्रामीण क्षेत्रों में बने उपस्वास्थ्य केंद्र महज दिखावा साबित हो रहे हैं। इन उपकेंद्रों एक-एक एनएनएम की नियुक्ति होनी चाहिए। एक एएनएम पर कई-कई केंद्रों का भार है। इसके अतिरिक्त क्षेत्र में आशाओं की कमी बनी हुई है। विभागीय स्टाफ की लापरवाही एवं कमी के चलते उपकेंद्र महज दिखावा भर हैं। ग्रामीण अंचल के निवासियों को कोई खास लाभ नहीं मिल रहा है। वहीं, कई स्थानों पर इन केंद्रों में घास खड़ी है। ग्रामीण क्षेत्र में बने इन उपस्वास्थ्य केंद्रों का लाभ नहीं मिल रहा है। जिस कारण पीड़ितों को प्राइवेट अस्पतालों में इलाज कराना पड़ रहा है। उधर, उपस्वास्थ्य केंद्र सुने पडे़ होने से शराबियों और जुआरियों ने इन्हें सुरक्षित अड्डा बना लिया है। वहीं, इस सबंध में हस्तिनापुर सीएचसी प्रभारी सतीश भास्कर का कहना है कि विभागीय स्टाफ की कमी पूरी करने के लिए कई बार उच्च अधिकारियों को अवगत कराया जा चुका है।
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मवाना। करोड़ों रुपये खर्च करके सीएचसी में महिलाओं के लिए बनाए नए भवन में भी सुविधाओं का टोटा है। इसके लिए शासन को प्रस्ताव भेजे सालों बीत गए परंतु सरकार की हीलाहवाली के चलते क्षेत्रीय महिलाएं निजी अस्पताल में प्रसव कराने को मजबूर हैं।
नगर स्थित सीएचसी परिसर में गर्भवती महिलाओं के लिए लगभग छह साल पहले करोड़ों रुपए खर्च करके नया भवन बनाया गया था। इस दौरान भवन का निर्माण यह सोचकर कराया गया कि यहां से जुड़े लगभग सौ गांवों की गर्भवती महिलाओं को प्रसव के दौरान सभी सुविधाएं मिल सकें। वहीं, गरीब लोग प्राइवेट अस्पतालों में महंगा इलाज कराने से बच सकें। इस भवन में वार्ड, ओटी, नवजात बच्चों के लिए नर्सरी एवं वार्ड बनना था। हालांकि महिलाओं को भर्ती करने के लिए वार्ड के अतिरिक्त यहां कोई अन्य सुविधा आज तक नहीं मिल सकी है। जिस कारण आज भी दूरदराज से प्रसव के लिए आने वाली महिलाओं को प्राइवेट अस्पतालों में ही जाना पड़ रहा है।
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महिला चिकित्सक भी नहीं
अस्पताल के निर्माण के बाद यहां दो महिला चिकित्सकों डॉ. सुमन एवं डॉ. रितिका की तैनाती की गई थीं। सर्जन डॉ. सुमन मई में प्रमोशन के चलते दूसरे जिले में जा चुकी हैं। वहीं, फिजिशियन डॉ. रितिका का बुधवार को अन्यत्र स्थानांतरण हो गया। इसके चलते अस्पताल महिला चिकित्सक विहीन हो गया है। इतना ही नहीं यहां पर प्रसव कराने आने वाली गर्भवती महिलाओं की संख्या में प्रत्याशित रूप से कमी आई है।
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माह प्रसव
अप्रैल 332
मई 300
जून 25
उपकेंद्र पर लटके ताले
गांवों से गर्भवती महिलाओं को यहां लाने के लिए वहां पर उपकेंद्र बनाए गए हैं। वहां आशा और एएनएम गर्भवती महिलाओं का टीकाकरण करती हैं। यही नहीं प्रसव की तारीख नजदीक आने के दौरान वे महिलाओं को जिला अस्पताल लाने का भी कार्य करती हैं। उपकेंद्रों पर ताले लटके होने से महिलाओं को सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं। मवाना ब्लॉक के भैंसा गांव में पिछले कई महीने से ताले लटके हुए हैं। परिसर में बड़ी-बड़ी घास उगी हुई है और कमरे में धूल एवं गंदगी का बसेरा है।
अस्पताल बना कुत्तों का बसेरा
तीन मंजिला इमारत के प्रथम तल पर बने वार्ड में महिलाओं को भर्ती किया जाता है। दूसरा और तीसरा तल कोई सुविधा नहीं होने के कारण वीरान पड़े हैं। यहां कुत्ते आराम फरमा रहे हैं। नियमित सफाई नहीं होने के चलते पूरा फर्श धूल से अटा है। यहां तक कि दूसरे एवं तीसरे मंजिल पर लगी लाइटें भी उखाड़ दी गई हैं।
अस्पताल में सुविधाओं के लिए सरकार को प्रस्ताव भेजा हुआ है। इसके स्वीकृत होते ही सभी सुविधाएं मुहैया होंगी। उपकेंद्रों को भी खोलने के लिए सभी को सख्त निर्देश दिए जाएंगे। -डॉ. अनिल शर्मा, कार्यवाहक सीएचसी प्रभारी
मुख्य बातें
अस्पताल में महिला चिकित्सक नहीं होने से प्रसव निजी अस्पतालों में कराने को मजबूर
महिलाओं के लिए बनाए तीन मंजिला भवन में दो मंजिल बंद
सुरक्षित प्रसव के मामलों में करीब 92 फीसदी की गिरावट दर्ज
कहां से हो इलाज जब खुद ही बीमार पड़े उपस्वास्थ्य केंद्र
बहसूमा। बहसूमा क्षेत्र में संक्रमित रोग तेजी से जड़े जमा रहे हैं। यहां सैकड़ों की तादाद में लोग वायरल बुखार तथा डायरिया की चपेट में हैं। इसके बावजूद ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवा देने के लिए बने उपस्वास्थ्य केंद्र बोझ साबित हो रहे हैं। इन स्वास्थ्य केंद्रों में से ज्यादातर पर ताले लटके हुए हैं। हालांकि देखरेख बहसूमा स्थित उप स्वास्थ्य केंद्र में ऊंची-ऊंची घास उगी है। कुल मिलाकर दूसरों को इलाज देने वाले उप स्वास्थ्य केंद्र खुद बीमार हैं।
बता दें कि शासन द्वारा गंावों में उचित स्वास्थ्य सेवा देने के लिए उप स्वास्थ्य केद्रों का निर्माण कराया गया था। इस पर उचित देखरेख एवं स्टाफ के अभाव में ग्रामीण क्षेत्रों में बने उपस्वास्थ्य केंद्र महज दिखावा साबित हो रहे हैं। इन उपकेंद्रों एक-एक एनएनएम की नियुक्ति होनी चाहिए। एक एएनएम पर कई-कई केंद्रों का भार है। इसके अतिरिक्त क्षेत्र में आशाओं की कमी बनी हुई है। विभागीय स्टाफ की लापरवाही एवं कमी के चलते उपकेंद्र महज दिखावा भर हैं। ग्रामीण अंचल के निवासियों को कोई खास लाभ नहीं मिल रहा है। वहीं, कई स्थानों पर इन केंद्रों में घास खड़ी है। ग्रामीण क्षेत्र में बने इन उपस्वास्थ्य केंद्रों का लाभ नहीं मिल रहा है। जिस कारण पीड़ितों को प्राइवेट अस्पतालों में इलाज कराना पड़ रहा है। उधर, उपस्वास्थ्य केंद्र सुने पडे़ होने से शराबियों और जुआरियों ने इन्हें सुरक्षित अड्डा बना लिया है। वहीं, इस सबंध में हस्तिनापुर सीएचसी प्रभारी सतीश भास्कर का कहना है कि विभागीय स्टाफ की कमी पूरी करने के लिए कई बार उच्च अधिकारियों को अवगत कराया जा चुका है।