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मेडिकल कॉलेज से चिकित्सकों का हो रहा मोहभंग
Updated Fri, 06 Apr 2018 01:56 AM IST
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मेडिकल कॉलेज से चिकित्सकों का हो रहा मोहभंग
मेरठ। एक तरफ विशेषज्ञ चिकित्सकों का टोटा तो दूसरी तरफ मेडिकल कॉलेज से चिकित्सकों के मोहभंग होने का सिलसिला जारी है। हड्डी विभाग से लंबे समय से जुड़े एक विशेषज्ञ चिकित्सक ने इस्तीफा दे दिया है, हालांकि विभाग प्रभारी के न होने के कारण अभी उनका इस्तीफा मंजूर नहीं किया गया है। पिछले 12 माह में इनकेअलावा मेडिकल से पांच विशेषज्ञ चिकित्सक इस्तीफा दे चुके हैं। मेडिकल का खराब माहौल इसकी वजह माना जा रहा है।
हाल ही में हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ. परवेज अहमद ने इस्तीफा दिया था। पिछले साल अक्तूबर में मेडिकल कॉलेज के मानसिक रोग विशेषज्ञ और इस यूनिट के हेड डॉ. रवि राणा ने इस्तीफा दिया था। अब वह निजी प्रैक्टिस कर रहे हैं। वह करीब पांच साल से मेडिकल कॉलेज से जुड़े हुए थे। इन दोनों के अलावा एक साल में मेडिकल से चार और चिकित्सकों ने इस्तीफा दिया था। इनसे पहले बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. अमित उपाध्याय, यूरो सर्जन अभिषेक जैन, प्लास्टिक सर्जन भानू प्रताप और फिजिशियन अमित माहेश्वरी मेडिकल छोड़ चुके हैं। अभी और भी कई चिकित्सक कतार में बताए जा रहे हैं। इस संबंध में मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. एसके गर्ग का कहना है कि उन्हें अभी मौखिक रूप से सूचना मिली है, लेकिन इस्तीफा उन तक नहीं पहुंचा है। यह चिकित्सक संविदा वाले हैं जो बाद में प्राइवेट प्रैक्टिस करते हैं। इनके छोड़ने की वजह सरकार की सख्ती भी है। दूसरी तरफ, हड्डी रोग विभाग के इन चिकित्सक का कहना है कि उन्होंने इस्तीफा दिया है, लेकिन उन्हें शनिवार तक का समय दिया गया है। उनके विभाग के प्रभारी के हस्ताक्षर होने हैं, इसलिए वह अभी नाम जाहिर नहीं करना चाहते।
ऐसे तो कम हो जाएंगे सरकारी चिकित्सक
इसी तरह यदि सरकारी चिकित्सक प्राइवेट प्रैक्टिस करने लगे तो गरीब मरीजों का क्या होगा जो सरकारी अस्पतालों के भरोसे हैं। उन्हें एक्सपर्ट से इलाज कैसे मिल पाएगा। मेडिकल में यह सवाल उठने लगे हैं। चिकित्सक इसके लिए सरकार की कार्यप्रणाली को जिम्मेदार ठहराते हैं। उनका कहना है कि सरकारी चिकित्सक को उतनी तनख्वाह नहीं मिलती, जितनी प्राइवेट प्रैक्टिस के दौरान उसे इनकम होती है। वह मोटी रकम खर्च कर डॉक्टर बनता है। अब चिकित्सक यदि सरकारी अस्पताल में प्रैक्टिस करते हुए निजी प्रैक्टिस करे तो उसे पकड़े जाने का डर रहता है। न करे तो मन मुताबिक सैलरी नहीं मिलती है। लिहाजा चिकित्सक प्राइवेट प्रैक्टिस का विकल्प चुन रहे हैं।
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खास बातें:
एक और चिकित्सक ने दिया इस्तीफा, अभी मंजूर नहीं
एक साल में छह विशेषज्ञ चिकित्सक छोड़ चुके मेडिकल
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मेरठ। एक तरफ विशेषज्ञ चिकित्सकों का टोटा तो दूसरी तरफ मेडिकल कॉलेज से चिकित्सकों के मोहभंग होने का सिलसिला जारी है। हड्डी विभाग से लंबे समय से जुड़े एक विशेषज्ञ चिकित्सक ने इस्तीफा दे दिया है, हालांकि विभाग प्रभारी के न होने के कारण अभी उनका इस्तीफा मंजूर नहीं किया गया है। पिछले 12 माह में इनकेअलावा मेडिकल से पांच विशेषज्ञ चिकित्सक इस्तीफा दे चुके हैं। मेडिकल का खराब माहौल इसकी वजह माना जा रहा है।
हाल ही में हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ. परवेज अहमद ने इस्तीफा दिया था। पिछले साल अक्तूबर में मेडिकल कॉलेज के मानसिक रोग विशेषज्ञ और इस यूनिट के हेड डॉ. रवि राणा ने इस्तीफा दिया था। अब वह निजी प्रैक्टिस कर रहे हैं। वह करीब पांच साल से मेडिकल कॉलेज से जुड़े हुए थे। इन दोनों के अलावा एक साल में मेडिकल से चार और चिकित्सकों ने इस्तीफा दिया था। इनसे पहले बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. अमित उपाध्याय, यूरो सर्जन अभिषेक जैन, प्लास्टिक सर्जन भानू प्रताप और फिजिशियन अमित माहेश्वरी मेडिकल छोड़ चुके हैं। अभी और भी कई चिकित्सक कतार में बताए जा रहे हैं। इस संबंध में मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. एसके गर्ग का कहना है कि उन्हें अभी मौखिक रूप से सूचना मिली है, लेकिन इस्तीफा उन तक नहीं पहुंचा है। यह चिकित्सक संविदा वाले हैं जो बाद में प्राइवेट प्रैक्टिस करते हैं। इनके छोड़ने की वजह सरकार की सख्ती भी है। दूसरी तरफ, हड्डी रोग विभाग के इन चिकित्सक का कहना है कि उन्होंने इस्तीफा दिया है, लेकिन उन्हें शनिवार तक का समय दिया गया है। उनके विभाग के प्रभारी के हस्ताक्षर होने हैं, इसलिए वह अभी नाम जाहिर नहीं करना चाहते।
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ऐसे तो कम हो जाएंगे सरकारी चिकित्सक
इसी तरह यदि सरकारी चिकित्सक प्राइवेट प्रैक्टिस करने लगे तो गरीब मरीजों का क्या होगा जो सरकारी अस्पतालों के भरोसे हैं। उन्हें एक्सपर्ट से इलाज कैसे मिल पाएगा। मेडिकल में यह सवाल उठने लगे हैं। चिकित्सक इसके लिए सरकार की कार्यप्रणाली को जिम्मेदार ठहराते हैं। उनका कहना है कि सरकारी चिकित्सक को उतनी तनख्वाह नहीं मिलती, जितनी प्राइवेट प्रैक्टिस के दौरान उसे इनकम होती है। वह मोटी रकम खर्च कर डॉक्टर बनता है। अब चिकित्सक यदि सरकारी अस्पताल में प्रैक्टिस करते हुए निजी प्रैक्टिस करे तो उसे पकड़े जाने का डर रहता है। न करे तो मन मुताबिक सैलरी नहीं मिलती है। लिहाजा चिकित्सक प्राइवेट प्रैक्टिस का विकल्प चुन रहे हैं।
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खास बातें:
एक और चिकित्सक ने दिया इस्तीफा, अभी मंजूर नहीं
एक साल में छह विशेषज्ञ चिकित्सक छोड़ चुके मेडिकल