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मजदूर का पसीना सूखने से पहले नहीं मिलती मजदूरी

Wed, 01 May 2019 02:23 AM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Wed, 01 May 2019 02:23 AM IST
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मजदूर का पसीना सूखने से पहले नहीं मिलती मजदूरी
मजदूर का पसीना सूखने से पहले नहीं मिलती मजदूरी
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मेरठ। दुनिया भर में 1 मई का दिन अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह दिन श्रमिक वर्ग के लोगों को समर्पित है। पिछले 132 सालों से इस दिन को मनाते आ रहे हैं। लेकिन आज भी मजदूर की हालत में अपेक्षित बदलाव नहीं आया है। कई प्राइवेट सेक्टर में आज भी मजदूर बदहाली में काम करने को मजबूर हैं।
सरकारें आती-जाती रही, इस दौरान मजदूरों के लिए तमाम योजनाएं भी सरकारों द्वारा जारी की गई। लेकिन पारदर्शिता और ईमानदारी के अभाव में यह योजनाएं श्रमिक वर्ग को अपेक्षित लाभ नहीं पहुंचा सकी। आज भी लघु और कुटीर उद्योगों में काम करने वाले मजदूरों को सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित रखा जाता है। हालात ये है कि यदि श्रम विभाग का दबाव बनता है, तो उसका तोड़ भी इन पूंजीपतियों को हाथ में होता है। विभाग द्वारा निर्धारित दर दिखाकर भुगतान करना तो दर्शाया जाता है। लेकिन मजदूर के हाथ में पूरा पैसा न देकर तय किया गया पारिश्रमिक ही पहुंचाया जाता है।
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वर्ष 1877 में मजदूरों ने काम के घंटे तय करने की मांग उठायी। एक मई 1886 को इस मांग को लेकर अमेरिका में लाखों मजदूरों ने आंदोलन शुरू किया तो यह आंदोलन पूरी दुनिया के मजदूरों तक पहुंचना शुरू हो गया। ऐसे में भारत सहित दुनिया के तमाम देशों में मजदूरों के लिए आठ घंटे प्रतिदिन काम करना निर्धारित हो गया। लेकिन यह आदेश भी कागजों तक ही सिमट कर रह गया। आज भी कई सेक्टर ऐसे हैं, जहां पर मजदूरों से 10-12 घंटे काम कराया जाता है। उन्हें कोई अतिरिक्त भुगतान इस अतिरिक्त समय का नहीं किया जाता है। यही नहीं, अवकाश भी तय होने के बावजूद अवकाश नहीं दिया जाता, उल्टे किसी बीमारी आदि में अवकाश लेने पर उनका वेतन काट लिया जाता है।
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मनरेगा भी नहीं बन सकी सहारा
मनरेगा के तहत 220 रुपये मजदूरी तय है। लेकिन आज मजदूर खुले बाजार में 350 रुपये मजदूरी लेता है। ऐसे में सरकार की मनरेगा योजना भी मजदूरों का सहारा नहीं बन सकी है। उल्टे सरकारी तंत्र में यह योजना भी कहीं न कहीं भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ी नजर आती है।
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