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‘समय भ्ायावह, मनुष्यता के सामने बड़ा संकट’
Sun, 17 Feb 2019 11:14 PM IST
पवन सिंह
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Published by: पवन सिंह
Updated Sun, 17 Feb 2019 11:14 PM IST
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नगर के हिन्दी भवन सभागार में आयोजित कार्यक्रम में कमलेश राय की भोजपुरी काव्य संग्रह का लोकार्पण किया गया।
- फोटो : mau
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पूर्वांचल साहित्य कला परिषद एवं नेफोर्ड के तत्वावधान में नगर के हिंदी भवन में गीतकार डॉ. कमलेश राय के गीत संग्रह ‘अइसन आज कबीर कहां’ का लोकार्पण समारोह आयोजित किया गया।
कार्यक्रम का शुभारंभ पं. गिरिजा शंकर तिवारी के सरस्वती वंदना से हुआ। मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए हिंदी विभाग बीएचयू वाराणसी के प्रो. अवधेश प्रधान ने कहा कि आज का समय बहुत भयावह है। वैश्विक स्तर पर मनुष्यता के सामने बहुत बड़ा संकट है। युद्ध की स्थितियां पास-पड़ोस में निरंतर बनी हुई हैं। आत्म केंद्रित व्यक्तिवाद ने मूल्यों मान्ताओं को ध्वस्त किया है। ऐसे में साहित्य का विराट संसार भी प्रभावित हुआ है। उसका दायरा भी छोटा हुआ है, लेकिन थोड़ी बहुत संभावना जो शेष है, वह साहित्य से ही शेष है। हमारा लोक-साहित्य जीवन की चिन्ताओं और भावनात्मक रिश्तों एवं आपसी संबंधों का जीवंत दस्तावेज है।
भोजपुरी की वाचिक परंपरा समृद्ध है। कबीर से लेकर आज के समय के रचनात्मक साहित्य में भोजपुरी की सामर्थ्य का रेखांकन किया जा सकता है। भोजपुरी की भाषाई आंदोलन में जिस रचनात्मक साहित्य की जरूरत है, वह सब डॉ. कमलेश राय के गीतों में है। दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. अनिल कुमार राय ने कहा कि डॉ. कमलेश राय एक सामर्थ्यवान गीतकार और समर्पित सेवी हैं। डॉ. रामकठिन सिंह ने कहा कि कमलेश राय एक समर्पित साहित्यकर्मी के साथ ही भोजपुरी के श्रेष्ठ नवगीतकार हैं।
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समारोह को डॉ. अरविंद कुमार मिश्र, काशीनाथ द्विवेदी, सत्यनारायण दूबे आदि ने संबोधित किया। इस अवसर पर जन्मेजय सिंह, संतोष मिश्र, डॉ. अलका राय, उर्मिला राय, श्वेता राय, शकुंतला तिवारी, गुड़िया, उमेश मिश्र, डॉ. शिवशंकर सिंह, डॉ.चंद्र प्रकाश राय, विशाल पांडेय, रवीश तिवारी आदि रहे।
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कार्यक्रम का शुभारंभ पं. गिरिजा शंकर तिवारी के सरस्वती वंदना से हुआ। मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए हिंदी विभाग बीएचयू वाराणसी के प्रो. अवधेश प्रधान ने कहा कि आज का समय बहुत भयावह है। वैश्विक स्तर पर मनुष्यता के सामने बहुत बड़ा संकट है। युद्ध की स्थितियां पास-पड़ोस में निरंतर बनी हुई हैं। आत्म केंद्रित व्यक्तिवाद ने मूल्यों मान्ताओं को ध्वस्त किया है। ऐसे में साहित्य का विराट संसार भी प्रभावित हुआ है। उसका दायरा भी छोटा हुआ है, लेकिन थोड़ी बहुत संभावना जो शेष है, वह साहित्य से ही शेष है। हमारा लोक-साहित्य जीवन की चिन्ताओं और भावनात्मक रिश्तों एवं आपसी संबंधों का जीवंत दस्तावेज है।
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भोजपुरी की वाचिक परंपरा समृद्ध है। कबीर से लेकर आज के समय के रचनात्मक साहित्य में भोजपुरी की सामर्थ्य का रेखांकन किया जा सकता है। भोजपुरी की भाषाई आंदोलन में जिस रचनात्मक साहित्य की जरूरत है, वह सब डॉ. कमलेश राय के गीतों में है। दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. अनिल कुमार राय ने कहा कि डॉ. कमलेश राय एक सामर्थ्यवान गीतकार और समर्पित सेवी हैं। डॉ. रामकठिन सिंह ने कहा कि कमलेश राय एक समर्पित साहित्यकर्मी के साथ ही भोजपुरी के श्रेष्ठ नवगीतकार हैं।
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समारोह को डॉ. अरविंद कुमार मिश्र, काशीनाथ द्विवेदी, सत्यनारायण दूबे आदि ने संबोधित किया। इस अवसर पर जन्मेजय सिंह, संतोष मिश्र, डॉ. अलका राय, उर्मिला राय, श्वेता राय, शकुंतला तिवारी, गुड़िया, उमेश मिश्र, डॉ. शिवशंकर सिंह, डॉ.चंद्र प्रकाश राय, विशाल पांडेय, रवीश तिवारी आदि रहे।