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गरीबों का दाखिला लेने से कतरा रहे निजी स्कूल

Fri, 20 Jul 2018 12:55 AM IST
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mau Updated Fri, 20 Jul 2018 12:55 AM IST
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Private schools straying from admission of poor
किताबों से पढ़ते बच्चे। - फोटो : amar ujala
बेसिक शिक्षा विभाग तथा जिला प्रशासन की तरफ से व्यापक पैमाने पर प्रचार प्रसार न होने तथा निजी स्कूलों में सीटों के अनुुपात के सापेक्ष गरीब बच्चों को दाखिला मिलता नजर नहीं आ रहा है। आरटीई के तहत अब हर निजी विद्यालयों को गरीब बच्चों को 25 प्रतिशत सीटों पर निशुल्क प्रवेश लेना है। 1003 आवेदन के सापेक्ष 757 बच्चों का प्रवेश लेने के लिए 100 विद्यालयों को आदेश जारी किया गया है। कई निजी स्कूलों में शासन की तरफ से गत वर्ष की फीस प्रतिपूर्ति न मिलने से बच्चों को लौटा दिया जा रहा। परेशान अभिभावकों ने गुहार लगाई, लेकिन सुनवाई नहीं हुई।
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जिले में 542 मान्यता प्राप्त निजी स्कूल हैं। सरकारी विद्यालयों में शैक्षिक गुणवत्ता दयनीय होने से गरीब वर्ग के बच्चों का रुझान निजी स्कूलों की तरफ बढ़ा है।
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शासन की तरफ से निजी स्कूलों में गरीब बच्चों को सीटों के सापेक्ष 25 प्रतिशत दाखिला देना होता है। वर्ष 2018-19 में प्रथम चरण में 63 आनलाइन आवेदन के सापेक्ष 54, दूसरे चरण में 230 के सापेक्ष 165, तीसरे चरण में 112 के सापेक्ष 51 सहित 100 स्कूलों में 757 बच्चों का एडमिशन लेने के लिए विद्यालय संचालकों को आदेश दिया गया है। जबकि जबकि ग्रामीण क्षेत्रों मेें प्रथम चरण में 202 आवेदन के सापेक्ष 152 तथा दूसरे चरण में 396 के सापेक्ष 323 बच्चों को दाखिला दिलाने के लिए विद्यालय  संचालकों को आदेश दिया गया है।
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वर्ष 2017-18 में 500 बच्चों को दाखिला दिया गया था।
 
शासन की तरफ से प्रति बच्चा 4500 रुपया वार्षिक फीस प्रतिपूर्ति दी जाती है। लेकिन वर्ष 2017-18 में तीन माह की ही फीस प्रतिपूर्ति ही दी जा सकी। शासन की तरफ से वित्तीय वर्ष के अंतिम दिन बजट मिला, लेकिन तकनीकी अड़चन के चलते धन वापस चला गया। प्रतिपूर्ति नहीं मिलने के चलते एवरग्रीन पब्लिक स्कूल रतनपुरा, मेरी चिल्ड्रेन स्कूल सहित कई स्कूल बच्चों को बैरंग लौटा दे रहे हैं। न तो नया एडमिशन ले रहे हैं और न ही पढ़ने दे रहे हैं।


गत दिनों अभिभावकों ने जिलाधिकारी सहित विभागीय अधिकारियों को ज्ञापन भी सौंपा था, लेकिन मामले का निस्तारण नहीं किया जा सका है।
सूत्रों की मानें तो निजी स्कूलों में प्रत्येक कक्षाओं में कई सेक्शन तो चलते हैं, लेकिन सरकारी कागजात में प्रति कक्षा 40 सीट ही दिखाते हैं। इसके चलते गरीब बच्चों को सीटों के अनुपात में दाखिला नहीं मिल पा रहा है। न तो प्रशासन और न ही विभाग की तरफ से सीटों का सत्यापन करने की जहमत उठाई गई। अभिभावकों का कहना था कि प्रशासन की तरफ से व्यापक प्रचार प्रसार होता तो आवेदनों की संख्या काफी ज्यादा होती।

 
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