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नवरात्र की तैयारियां पूरी,आज से शुरू होगी नौ दिवसीय पूजा
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मऊ। नवरात्र को लेकर चल रही तैयारी शुक्रवार को पूरी हो गई। पर्व की पूर्व संध्या पर नगर सहित जिले के विभिन्न बाजारों में भक्तों ने जमकर खरीदारी की। भक्तों के उत्साह को देखते हुए यह तय है कि इस बार भी नौ दिनों तक होने वाली मां दुर्गा की पूजा धूमधाम से होगी। जिले में इस बार भी खासतौर से वनदेवी धाम, शीतला माता धाम, मां कोयल मर्याद सहित प्रमुख मंदिरों पर श्रद्धालु विधि विधान से पूजन अर्चन करेंगे।
नवरात्र के अवसर पर नगर क्षेत्र के माता पोखरा का शीतलामाता धाम, आजमगढ़ मोड़ स्थित दुर्गा मंदिर, फातिमा मोड़ का दुर्गा मंदिर सहित जिले के वनदेवी मंदिर, कोयल मर्याद भवानी माई मंदिर, निधियांव स्थित अष्टभुजी सहित विभिन्न मंदिरों में भक्तों का पूरे नौ दिनों तक तांता लगा रहता है। शुक्रवार को एक ओर जहां मंदिरों की सफाई और सजावट का कार्य पूर्ण कराया गया। वहीं भक्तों ने नौ दिवसीय इस पूजा की परंपरा को निभाने के लिए तैयारियों को पूरा करने के क्रम में जमकर खरीदारी की। यही वजह था कि नगर के सहादतपुरा, मिर्जाहादीपुरा, रौजा, चौक, गोला बाजार सहित मुहम्मदाबादगोहना, मधुबन, घोसी, अदरी, चिरैयाकोट, दोहरीघाट सहित जिले के अन्य बाजारों में स्थित पूजा सामग्रियों की दुकानों पर खरीदारों की भारी भीड़ नजर आई। पिपरीडीह : क्षेत्र के विभिन्न इलाकों में नवरात्र की चल रही तैयारी पूरी हो गई। पूर्व संध्या पर भक्त वनदेवी धाम, खरगजेपुर स्थित मां दुर्गा मंदिर सहित विभिन्न मंदिरों को सजाने संवारने में लग रहे। साथ ही बाजारों में खरीदारों की भारी भीड़ नजर आई।
महर्षि बाल्मिकी की साधना स्थली रहा है वनदेवी धाम:
पिपरीडीह। परदहां ब्लाक के कहिनौर गांव के समीप दक्षिण पश्चिमी दिशा में स्थित प्राचीन मंदिर लोगों के आस्था का केंद्र बना हुआ है। वैसे तो मंदिर पर हमेशा भीड़ रहती है। लेकिन नवरात्र में श्रद्धालुओं का विशाल हुजूम उमड़ता है। पूर्वांचल के विभिन्न जिलों से मत्था टेकने के लिए लोगों के आने का क्रम लगातार चलता रहता है। मान्यता है कि यहां सच्चे मन से पूजन अर्चन करने पर सभी मनोकामना पूरी हो जाती है।
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जनश्रुतियों और भौगोलिक साक्ष्यों के आधार पर यह स्थान महर्षि बाल्मिकी की साधना स्थली रहा है। कहा जाता है कि जगत जननी सीता ने भी अपने अखंड पतिव्रत धर्म का पालन करते हुए यहीं पर लव कुश को जन्म दिया था। इस प्रकार यह स्थान आदि पुरुष बाल्मिकी, मर्यादा पुरुषोत्तम राम तथा माता सीता से जुड़ा हुआ है। एक कथा के अनुसार कालांतर में नर्वर के रहने वाले सिंघनुआ के बाबा को स्वप्न में देखा कि देवी कह रही हैं कि मैं यहां अकेली हूं। यहां आकर मेरी पूजा करो। अपने स्वप्न के आधार पर बाबा यहां आए तथा देवी की खोज करने लगे, जहां आज वनदेवी का मंदिर है वहीं उन्हें प्रकाश दिखायी पड़ा। बाबा ने फावड़े से ही भूमि को खोदना शुरू कर दिया। खोदने पर वहां वनदेवी की मूर्ति दिखायी पड़ी। बाबा मूर्ति को अपने घर ले जाना चाहते थे, लेकिन उस मूर्ति को हटा तक नहीं सके और वहीं पर उन्होंने वहीं पर प्राण त्याग दिया था। उनकी मौत के बाद मां वनदेवी अपने सिंहासन के साथ प्रकट हुईं। मान्यताओं के मद्देनजर यहां नवरात्र भर श्रद्धालुओं का तांता लगता है।
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नवरात्र के अवसर पर नगर क्षेत्र के माता पोखरा का शीतलामाता धाम, आजमगढ़ मोड़ स्थित दुर्गा मंदिर, फातिमा मोड़ का दुर्गा मंदिर सहित जिले के वनदेवी मंदिर, कोयल मर्याद भवानी माई मंदिर, निधियांव स्थित अष्टभुजी सहित विभिन्न मंदिरों में भक्तों का पूरे नौ दिनों तक तांता लगा रहता है। शुक्रवार को एक ओर जहां मंदिरों की सफाई और सजावट का कार्य पूर्ण कराया गया। वहीं भक्तों ने नौ दिवसीय इस पूजा की परंपरा को निभाने के लिए तैयारियों को पूरा करने के क्रम में जमकर खरीदारी की। यही वजह था कि नगर के सहादतपुरा, मिर्जाहादीपुरा, रौजा, चौक, गोला बाजार सहित मुहम्मदाबादगोहना, मधुबन, घोसी, अदरी, चिरैयाकोट, दोहरीघाट सहित जिले के अन्य बाजारों में स्थित पूजा सामग्रियों की दुकानों पर खरीदारों की भारी भीड़ नजर आई। पिपरीडीह : क्षेत्र के विभिन्न इलाकों में नवरात्र की चल रही तैयारी पूरी हो गई। पूर्व संध्या पर भक्त वनदेवी धाम, खरगजेपुर स्थित मां दुर्गा मंदिर सहित विभिन्न मंदिरों को सजाने संवारने में लग रहे। साथ ही बाजारों में खरीदारों की भारी भीड़ नजर आई।
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महर्षि बाल्मिकी की साधना स्थली रहा है वनदेवी धाम:
पिपरीडीह। परदहां ब्लाक के कहिनौर गांव के समीप दक्षिण पश्चिमी दिशा में स्थित प्राचीन मंदिर लोगों के आस्था का केंद्र बना हुआ है। वैसे तो मंदिर पर हमेशा भीड़ रहती है। लेकिन नवरात्र में श्रद्धालुओं का विशाल हुजूम उमड़ता है। पूर्वांचल के विभिन्न जिलों से मत्था टेकने के लिए लोगों के आने का क्रम लगातार चलता रहता है। मान्यता है कि यहां सच्चे मन से पूजन अर्चन करने पर सभी मनोकामना पूरी हो जाती है।
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जनश्रुतियों और भौगोलिक साक्ष्यों के आधार पर यह स्थान महर्षि बाल्मिकी की साधना स्थली रहा है। कहा जाता है कि जगत जननी सीता ने भी अपने अखंड पतिव्रत धर्म का पालन करते हुए यहीं पर लव कुश को जन्म दिया था। इस प्रकार यह स्थान आदि पुरुष बाल्मिकी, मर्यादा पुरुषोत्तम राम तथा माता सीता से जुड़ा हुआ है। एक कथा के अनुसार कालांतर में नर्वर के रहने वाले सिंघनुआ के बाबा को स्वप्न में देखा कि देवी कह रही हैं कि मैं यहां अकेली हूं। यहां आकर मेरी पूजा करो। अपने स्वप्न के आधार पर बाबा यहां आए तथा देवी की खोज करने लगे, जहां आज वनदेवी का मंदिर है वहीं उन्हें प्रकाश दिखायी पड़ा। बाबा ने फावड़े से ही भूमि को खोदना शुरू कर दिया। खोदने पर वहां वनदेवी की मूर्ति दिखायी पड़ी। बाबा मूर्ति को अपने घर ले जाना चाहते थे, लेकिन उस मूर्ति को हटा तक नहीं सके और वहीं पर उन्होंने वहीं पर प्राण त्याग दिया था। उनकी मौत के बाद मां वनदेवी अपने सिंहासन के साथ प्रकट हुईं। मान्यताओं के मद्देनजर यहां नवरात्र भर श्रद्धालुओं का तांता लगता है।