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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Mau News ›   the production of milk is not lucrative business

सरकारी उपेक्षा से दूध उत्पादन हुआ घाटे का सौदा

Wed, 01 Jun 2016 12:07 AM IST
मऊ/अमर उजाला ब्यूरो
मऊ/अमर उजाला ब्यूरो Updated Wed, 01 Jun 2016 12:07 AM IST
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कहते हैं कभी यहां दूध की नदियां बहती थी लेकिन आज बच्चों को भी पीने के लिए दूध का संकट खड़ा हो गया है। उचित मूल्य के अभाव में दूध का उत्पादन बढ़ने के बजाए और घट ही रहा है। इसके चलते यहां पर संचालित सहकारी एवं प्राइवेट कंपनियां पड़ोसी जनपदों से दूध लेकर किसी प्रकार अपनी जरूरतों पूरी कर रही हैं। दो बार के जबरदस्त सूखे से चारे आदि के संकट के साथ ही दूध के उत्पादन पर असर पड़ा है। वहीं पशुपालकों को दूध के वाजिब दाम नहीं मिल रहे। इसके चलते भी वे दुग्ध उत्पादन व्यवसाय से दूरी बनाने जा रहे हैं । पशुपालकों का कहना है की 20 रुपया लीटर पानी आसानी से बिक जा रहा है लेकिन एक किलो दूध का उचित दाम देने के लिए कोई तैयार नहीं है।
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जिले में दूध उत्पादन को बढ़ावा देने एवं पशुपालकों के यहां दूध की खपत को लेकर जिला सहकारी दुग्ध उत्पादक संघ के साथ ही मधुबन क्षेत्र के फतेहपुर ताल चवर में एक कौतूकी नाम से बड़ी कंपनी भी है जो दुग्ध उत्पाद बेचती है। बावजूद इसके जिले में दूध की किल्लत का हालत यह है कि गैर जनपद से दूध मंगाकर किसी प्रकार जरूरत पूरी की जाती है। सहकारी दुग्ध उत्पादक संघ में दूध उत्पादकों को बढ़ावा देने के लिए गांव स्तर पर दुग्ध समितियां संचालित हैं
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वर्तमान में 45 दुग्ध समितियां ही संचालित हैं जब कि पूर्व में यह सैकड़ों में थी। इन स्थानों पर विभाग की गाड़ी दूध लेने खुद उनके गांव जाती थी और दूध का फैट के हिसाब से पशुपालकों को उसका मूल्य भुगतान करती हैं। वर्तमान में सहकारी दुग्ध संघ का प्रति लीटर रेट पशुपालकों को मुश्किल से 28 से लेकर 30 रुपये तक मिल पा रहा है जब कि प्राइवेट कंपनियां भी फैट के हिसाब से ही 30 रुपये से लेकर 33 रुपये तक प्रति लीटर दूध का भुगतान करती हैं। पशुपालक महेंद्र यादव कहते हैं कि दूध का कारोबार ठीक तो है लेकिन इस धंधे में दूध का उचित रेट ना मिलने के चलते लोगों का रुझान कम है। कहते हैं लोग आसानी से 20 रुपये  लीटर बोतल बंद पानी खरीद ले रहे हैं लेकिन 30  रुपये लीटर दूध होने से आखिरकार किस प्रकार पशुओं एवं उनके चारा का खर्च निकलेगा और कितना मजदूरी मिलेगी।
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