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अध्ययन में आचार्य द्विवेदी जैसा साधक होना जरूरी
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मऊ। डीसीएसके खंडेलवाल पीजी कालेज तथा हिंदुस्तानी एकेडेमी प्रयागराज के संयुक्त तत्वावधान में नगर स्थित डीसीएसके पीजी कालेज में चल रही तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में सोमवार को वक्ताओं ने आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डाला।
मुख्य अतिथि हिंदुस्तानी एकेडेमी प्रयागराज के अध्यक्ष डॉ. उदय प्रताप सिंह ने कहा कि साहित्यकार समाज से पृथक नहीं हो सकता है। भारतीय संस्कृति की मूल संकल्पना सबका मंगल है। इसी विचारधारा से आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी काम करते थे। उन्होंने कहा कि द्विवेदी जी भाषा की शुद्धता पर बल देते थे और समकालीन साहित्यकारों की भाषा पर अनुशासन रखते हैं। हमारी सांस्कृतिक एकता हमारे जीवन का आधार है और द्विवेदी जी इसी के पुरोधा थे।
अध्यक्षता कर रहे प्राचार्य डॉ. अरविंद कुमार मिश्र ने कहा कि विभिन्न भाषाओं के मध्य भाईचारे का संबंध होता है। अध्ययन में निरंतरता आवश्यक है। जब तक अध्यापक के रूप में साधक नहीं बनेंगे, तब तक सफल नहीं होंगे। अध्ययन में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की तरह साधक होना अनिवार्य है।
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मुख्य वक्ता इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के स्कूल आफ ट्रांसलेशन स्टडी एंड ट्रेनिंग के निदेशक प्रो. राजेंद्र प्रसाद पांडेय ने कहा कि सही मायने आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी हिंदी के व्यवस्थित रूप से पहले आलोचक थे। कहा कि वे उपयोगितावादी दृष्टि के पक्षधर थे और ज्ञान किसी भी भाषा या साहित्य से आने उसको आने देना चाहिए।
विशिष्ट अतिथि जयप्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा के हिंदी विभाग के प्रो. सिद्धार्थ शंकर ने कहा कि ज्ञान परंपरा स्थिर और जड़ न होकर पुनर्नवता का गुण लिए हुए होती है। द्विवेदी जी ऐसा भारत चाहते थे, जो आधुनिकता की बुनियाद पर अवस्थित हो और ऐसा देश बने जो पश्चिम की अवधारणाओं का भी समन्वय कर सके। इस अवसर पर हिंदुस्तानी एकेडेमी के अंकेश, रतन पांडेय, डॉ. चंद्रप्रकाश राय, डॉ. आनंद प्रकाश द्विवेदी, डॉ. रशिका रियाज, ऋचा अनिमेश, वीणा गुप्ता, डॉ. रामप्रवेश सिंह, डॉ. सुरेश सिंह दीक्षित, डॉ. तपस्या आदि शामिल रहे।
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मुख्य अतिथि हिंदुस्तानी एकेडेमी प्रयागराज के अध्यक्ष डॉ. उदय प्रताप सिंह ने कहा कि साहित्यकार समाज से पृथक नहीं हो सकता है। भारतीय संस्कृति की मूल संकल्पना सबका मंगल है। इसी विचारधारा से आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी काम करते थे। उन्होंने कहा कि द्विवेदी जी भाषा की शुद्धता पर बल देते थे और समकालीन साहित्यकारों की भाषा पर अनुशासन रखते हैं। हमारी सांस्कृतिक एकता हमारे जीवन का आधार है और द्विवेदी जी इसी के पुरोधा थे।
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अध्यक्षता कर रहे प्राचार्य डॉ. अरविंद कुमार मिश्र ने कहा कि विभिन्न भाषाओं के मध्य भाईचारे का संबंध होता है। अध्ययन में निरंतरता आवश्यक है। जब तक अध्यापक के रूप में साधक नहीं बनेंगे, तब तक सफल नहीं होंगे। अध्ययन में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की तरह साधक होना अनिवार्य है।
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मुख्य वक्ता इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के स्कूल आफ ट्रांसलेशन स्टडी एंड ट्रेनिंग के निदेशक प्रो. राजेंद्र प्रसाद पांडेय ने कहा कि सही मायने आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी हिंदी के व्यवस्थित रूप से पहले आलोचक थे। कहा कि वे उपयोगितावादी दृष्टि के पक्षधर थे और ज्ञान किसी भी भाषा या साहित्य से आने उसको आने देना चाहिए।
विशिष्ट अतिथि जयप्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा के हिंदी विभाग के प्रो. सिद्धार्थ शंकर ने कहा कि ज्ञान परंपरा स्थिर और जड़ न होकर पुनर्नवता का गुण लिए हुए होती है। द्विवेदी जी ऐसा भारत चाहते थे, जो आधुनिकता की बुनियाद पर अवस्थित हो और ऐसा देश बने जो पश्चिम की अवधारणाओं का भी समन्वय कर सके। इस अवसर पर हिंदुस्तानी एकेडेमी के अंकेश, रतन पांडेय, डॉ. चंद्रप्रकाश राय, डॉ. आनंद प्रकाश द्विवेदी, डॉ. रशिका रियाज, ऋचा अनिमेश, वीणा गुप्ता, डॉ. रामप्रवेश सिंह, डॉ. सुरेश सिंह दीक्षित, डॉ. तपस्या आदि शामिल रहे।