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Mau News: अमर शहीद होने के दशकों बाद भी गांव में नहीं लग सकी प्रतिमा
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घोसी- मधुबन मार्ग से उत्तर दिशा में स्थित एक छोटे से गांव बीबीपुर में अमर शहीद ब्रिगेडियर उस्मान का जन्म 15 जुलाई 1913 में मुहम्मद फारूक के घर हुआ था। पाक कबायलियों को अपने पराक्रम से खदेड़ते हुए तीन जुलाई 1948 को शहीद हो गए। शहीद होने के बाद उनको मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया। लेकिन दशकों बाद भी उनके गांव में अमर शहीद की प्रतिमा तक नहीं लगी है।
इस परिवार की गिनती उस समय के बड़े जमींदार घरानों में हुआ करती थी। ज़मींदारी शानो शौकत के बावजूद भी बाप और बेटे दोनों में देश प्रेम और समाज सेवा की भावना थी। तभी तो पिता मुहम्मद फारूक ने सिपाही के रूप में पुलिस विभाग की नौकरी स्वीकारी और अपनी साहसिक कार्यप्रणाली से पूर्वी उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी कोतवाली बनारस के प्रभारी रहे।
वहीं मुहम्मद फारूक के तीन बेटों में दूसरे नंबर के मुहम्मद उस्मान ने पिता के सानिध्य में रहकर बनारस के हरिश्चंद्र काॅलेज से स्नातक की उपाधि हासिल कर भारतीय सेना में भर्ती हुए और कमीशन प्राप्त कर ब्रिगेडियर के पद तक पहुंचे। जबकि बड़े भाई मुहम्मद सुब्हान टाइम्स ऑफ इंडिया में उप सम्पादक बने। छोटे भाई मुहम्मद गुफरान भी भारतीय सेना का हिस्सा बनकर ब्रिगेडियर का पद प्राप्त किया।
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1947 में आजादी के समय देश विभाजन के बाद कश्मीर की नौशेरा पहाड़ी से पाक कबायलियों को अपने पराक्रम से खदेड़ते हुए तीन जुलाई 1948 को शहीद हो गए। ब्रिगेडियर उस्मान को भारत सरकार ने महावीर चक्र (मरणोपरांत) से सम्मानित किया। आज उनकी शहादत दिवस के सात दशक बीतने के बाद भी उनकी स्मृतियों को सहेजना तो दूर प्रतिमा तक नहीं लगाई गा सकी है। उनका गांव बदहाली के दौर से गुजरते हुए अपने विकास की बाट जोह रहा है।
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इस परिवार की गिनती उस समय के बड़े जमींदार घरानों में हुआ करती थी। ज़मींदारी शानो शौकत के बावजूद भी बाप और बेटे दोनों में देश प्रेम और समाज सेवा की भावना थी। तभी तो पिता मुहम्मद फारूक ने सिपाही के रूप में पुलिस विभाग की नौकरी स्वीकारी और अपनी साहसिक कार्यप्रणाली से पूर्वी उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी कोतवाली बनारस के प्रभारी रहे।
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वहीं मुहम्मद फारूक के तीन बेटों में दूसरे नंबर के मुहम्मद उस्मान ने पिता के सानिध्य में रहकर बनारस के हरिश्चंद्र काॅलेज से स्नातक की उपाधि हासिल कर भारतीय सेना में भर्ती हुए और कमीशन प्राप्त कर ब्रिगेडियर के पद तक पहुंचे। जबकि बड़े भाई मुहम्मद सुब्हान टाइम्स ऑफ इंडिया में उप सम्पादक बने। छोटे भाई मुहम्मद गुफरान भी भारतीय सेना का हिस्सा बनकर ब्रिगेडियर का पद प्राप्त किया।
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1947 में आजादी के समय देश विभाजन के बाद कश्मीर की नौशेरा पहाड़ी से पाक कबायलियों को अपने पराक्रम से खदेड़ते हुए तीन जुलाई 1948 को शहीद हो गए। ब्रिगेडियर उस्मान को भारत सरकार ने महावीर चक्र (मरणोपरांत) से सम्मानित किया। आज उनकी शहादत दिवस के सात दशक बीतने के बाद भी उनकी स्मृतियों को सहेजना तो दूर प्रतिमा तक नहीं लगाई गा सकी है। उनका गांव बदहाली के दौर से गुजरते हुए अपने विकास की बाट जोह रहा है।