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श्रद्धा और विश्वास के बिना भागवत सिद्धि असम्भव-- स्वामी ज्ञानानंद
Updated Fri, 27 Oct 2017 12:02 AM IST
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मुहम्मदाबाद गोहना। ब्लाक के सुरहुरपुर स्थित एपीबीपी स्मृति बालिका इंटर कालेज के प्रांगण में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा सप्ताह महायज्ञ के चौथे दिन स्वामी ज्ञानानंद सरस्वती ने कहा कि मनुष्य की प्रज्ञा श्रद्धावान होनी चाहिए । अंधी श्रद्धा विनाशक होती है। श्रद्धा से नि:श्रेयस ज्ञान वृद्धि का अभ्युदय होता है। उन्होंने श्लोक श्रद्धावान लभते ज्ञानम की विस्तृत व्याख्या करते हुए श्रद्धालुओं को जीवन की सच्चाइयों से अवगत कराया।
ज्ञानानंद सरस्वती ने कहा कि माता उत्तरा के पुत्र महाराज परीक्षित ज्ञानपथ, पथिक, श्रद्धा ,संपन्न, और समर्पण के मूर्तिमान विग्रह हैं। बोले उत्तरा ने परीक्षित रूपी श्रद्धा वृत्ति को साक्षात जन्म दिया है। वहीं अटल भक्ति स्वरूप ध्रुव को माता सुनीति ने जन्म दिया है। परीक्षित श्रद्धा के मूर्तिमान विग्रह हैं तो ध्रुव जी विश्वास के मूर्तिमान विग्रह हैं। श्रद्धा और विश्वास के समनव्यक अनुष्ठान के बिना न तो भगवत सिद्धि होगी और न ही भागवत सिद्धि होगी। गोस्वामी जी ने भी लिखा है कि- कवनेउ सिद्धि कि बिनु विश्वासा। बिनु हरि भजन न भव-भय नासा। श्रीमद भागवत के मंगलाचरण में भी मूल रूप से श्रद्धा और विश्वास का स्तवन है। कहा कि श्रद्धा और विश्वास को काल संग्राम का महाविजेता एवं अध्यात्म जगत का प्रकांड योद्धा कहा गया है। श्रद्धालुओं को कथा का रसपान कराते हुए ज्ञानानंद सरस्वती ने कहा ने कहा कि जो मनुष्य अज्ञानता और अंधविश्वास रूपी ढाल से स्वंय को बचाते हुए लोभ, मोह, और मद रूपी वैरियों को पछाड़कर विजय प्राप्त करता है, वही अध्यात्म भक्ति पथ का महायोद्धा होता है। ऐसा ही मनुष्य काल के कपाल पर पैर रखकर भागवत धाम और ध्रुव लोक को प्राप्त करता है। इस अवसर पर मुख्यरूप से डॉक्टर सेन पाठक, डॉ. हृदय नरायन सिंह, हरिओम जी, संतोष तिवारी, मनिंद्र नाथ सिंह, प्रकाश सिंह, असीत पाठक, अभिमंयु दुबे, रामबचन यादव, राजाराम यादव, महेंद्र सिंह, साधना श्रीवास्तव, किरण यादव, धर्मदेव यादव, शिवानंद सिंह, रामबिलास सैनी, देवानंद सिंह आदि लोग उपस्थित रहे।
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ज्ञानानंद सरस्वती ने कहा कि माता उत्तरा के पुत्र महाराज परीक्षित ज्ञानपथ, पथिक, श्रद्धा ,संपन्न, और समर्पण के मूर्तिमान विग्रह हैं। बोले उत्तरा ने परीक्षित रूपी श्रद्धा वृत्ति को साक्षात जन्म दिया है। वहीं अटल भक्ति स्वरूप ध्रुव को माता सुनीति ने जन्म दिया है। परीक्षित श्रद्धा के मूर्तिमान विग्रह हैं तो ध्रुव जी विश्वास के मूर्तिमान विग्रह हैं। श्रद्धा और विश्वास के समनव्यक अनुष्ठान के बिना न तो भगवत सिद्धि होगी और न ही भागवत सिद्धि होगी। गोस्वामी जी ने भी लिखा है कि- कवनेउ सिद्धि कि बिनु विश्वासा। बिनु हरि भजन न भव-भय नासा। श्रीमद भागवत के मंगलाचरण में भी मूल रूप से श्रद्धा और विश्वास का स्तवन है। कहा कि श्रद्धा और विश्वास को काल संग्राम का महाविजेता एवं अध्यात्म जगत का प्रकांड योद्धा कहा गया है। श्रद्धालुओं को कथा का रसपान कराते हुए ज्ञानानंद सरस्वती ने कहा ने कहा कि जो मनुष्य अज्ञानता और अंधविश्वास रूपी ढाल से स्वंय को बचाते हुए लोभ, मोह, और मद रूपी वैरियों को पछाड़कर विजय प्राप्त करता है, वही अध्यात्म भक्ति पथ का महायोद्धा होता है। ऐसा ही मनुष्य काल के कपाल पर पैर रखकर भागवत धाम और ध्रुव लोक को प्राप्त करता है। इस अवसर पर मुख्यरूप से डॉक्टर सेन पाठक, डॉ. हृदय नरायन सिंह, हरिओम जी, संतोष तिवारी, मनिंद्र नाथ सिंह, प्रकाश सिंह, असीत पाठक, अभिमंयु दुबे, रामबचन यादव, राजाराम यादव, महेंद्र सिंह, साधना श्रीवास्तव, किरण यादव, धर्मदेव यादव, शिवानंद सिंह, रामबिलास सैनी, देवानंद सिंह आदि लोग उपस्थित रहे।
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