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1947 के 90 साल पहले ही मिल गई थी आजादी

Fri, 14 Aug 2020 11:24 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Fri, 14 Aug 2020 11:24 PM IST
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90 years of 1947 had already got independence
मऊ। आजादी की पहली क्रांति 1857 में ही जिले के मधुबन क्षेत्र के क्रांतिकारियों से ब्रिटिश संसद थर्रा उठी थी। कलेक्टर बेनी बुल्स को गोली मारने के बाद यहां के क्रांतिकारियों ने कलेक्ट्री और कचहरी पर कब्जा कर लिया। 1947 में मिली आजादी के 90 साल पहले तीन जून 1857 को ही क्रांतिकारियों ने जिले को 22 दिन के लिए अंग्रेजी हुकूमत से आजाद करा दिया था। कलेक्टर को गोली मारने के बाद ब्रिटिश संसद में भी सनसनी फैल गई थी।
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हालांकि इस घटना के बाद क्रांतिकारियों में अग्रणी भूमिका निभाने वाले हरख और हुलास सिंह को सरेआम फांसी देकर अंग्रेजों ने फिर से जिले पर अपना आधिपत्य जमा लिया। लेकिन ऐसे शहीदों का नाम आज भी अमर है जिन्होंने मऊ जनपद क्षेत्र सहित तत्कालीन आजमगढ़ जनपद को मुक्त कराया था। 1857 के इस घटना के बाद अंग्रेजों ने फिर से भले ही कब्जा जमा लिया लेकिन यहां के क्रांतिकारियों का हौसला कम नहीं हुआ। अंग्रेजों ने पूर्व की घटना के बाद काफी जुल्म ढाहे। बीच में कई ऐतिहासिक लड़ाई लड़ते हुए यह आग 15 अगस्त 1942 को फिर से इतिहास दोहराने के लिए धधकने लगी। इसकी जानकारी जब जिलाधिकारी मि. निबलेट को हुई तो वह 15 अगस्त को दिन में ही मधुबन थाने पर जा पहुंचा।
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मधुबन क्षेत्र के आस-पास के सहित जनपद के विभिन्न स्थानों के क्रांतिकारी जगह-जगह सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचाते हुए मधुबन थाने पर कब्जा करने के लिए जा पहुंचे। हजारों की संख्या में क्रांतिकारियों को डाकखाना लूटते एवं जगह-जगह तोडफ़ोड़ करते देखकर थाने में बैठा जिलाधिकारी मि. निबलेट और अन्य अधिकारी बौखला उठे। 25 अगस्त 1942 को अंग्रेजों ने मधुबन थाने पर 149 राउंड गोलियां चलवाई। इसमें रामनक्षत्र पांडेय, सोम्मर, कुमार मांझी, हनीफ, शिवधन, रघुनाथ, राजेदव, भागवत सिंह, लछनपति, बनवारी, मुन्नी कुंवर, बंधू चौहान आदि शहीद हुए, जबकि दर्जनों घायल हो गए।
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इस घटना के बाद खुरहट, अमिला, दोहरीघाट, घोसी सहित पूरे जिले के कोने-कोने में क्रांतिकारियों ने तोडफ़ोड़, आगजनी, ट्रेन में अंग्रेजी संपत्ति की लूट की और अंतत: आजादी प्राप्त की। आजादी की इस लड़ाई में जिले के क्रांतिकारियों के योगदान को पहली क्रांति से लेकर आजादी प्राप्त करने तक भुलाया नहीं जा सकता। इसमें जयबहादुर सिंह, झारखंडे राय, पं. रामविलास पांडेय, अलगू राय शास्त्री आदि ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और आजाद भारत में इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने का भी सौभाग्य प्राप्त किया था।
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