{"_id":"59f0d6004f1c1b97678b75bd","slug":"171508955648-mau-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"श्री हरि शरणागति ही परम पुरुषार्थ की साधना है","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
श्री हरि शरणागति ही परम पुरुषार्थ की साधना है
Updated Wed, 25 Oct 2017 11:58 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
मुहम्मदाबाद गोहना। मनुष्य के लिए श्री हरि की शरणागति प्राप्त करना ही परम् पुरुषार्थ की साधना है ,क्योंकि जीवमात्र की मृत्यु व भय का संकट हरण केवल भगवान ही कर सकते हैं। श्री हरि काल के भी काल हैं, जिनसे मृत्यु भी भयभीत रहती है। श्री हरि प्राण के भी प्राण हैं एवं शरणागत पालक धर्मा हैं।
मुहम्मदाबाद गोहना ब्लाक क्षेत्र के सुरहुरपुर गांव स्थित राजकुमारी विद्यावती शिक्षण संस्थान में आयोजित सात दिवसीय श्रीमद् भागवत कथा के तीसरे दिन मंगलवार को संत परमहंस स्वामी ज्ञानानंद सरस्वती महाराज ने प्रवचन के दौरान कही। कथा के दौरान श्री स्वामी जी ने महाराज परीक्षित एवं काल कर्मणा तक्षक नाग का उद्धरण देते हुए बताया कि जिन्हें माता की कोख में ही मृत्यु का पता चल गया था। महाराज परीक्षित की माता उत्तरा को श्री हरि की ताप-त्रय-विनाशक रहस्य लीला का ज्ञान था। अत: गर्भस्थ शिशु को तक्षक काल से बचाने हेतु आर्त भाव से श्रीहरि गोविंद की शरण ग्रहण किया। श्रीस्वामी जी मौजूद कथा श्रोताओं को महाराज परीक्षित के जीवन प्रसंग की कथा की चर्चा करते हुए कहा कि जीव शिशु का जन्म नहीं हुआ, लेकिन उसकी मृत्यु ने जन्म ले लिया। इसी प्रकार हमारी शरीर भी धारण करते ही इसकी मृत्यु का जन्म हो जाता है। चाहे वह शरीर माता की कोंख में हो या गोंद में हो। जिस प्रकार महाराज परिक्षित के पास सात दिन थे उसी प्रकार समस्त जीव-धारियों के पास भी सोमवार से रविवार तक सात ही दिन हरिशरण के लिए शेष हैं। यह जो सात दिन मात्र अवधि का निर्धारण किया गया है वह साधना पद है, आठवां दिन कभी नहीं आता है। स्वामी जी ने उक्त रहस्य का वर्णन करते हुए बताया है कि हम सभी प्राणी मात्र को अपनी प्रतिपल हो रही मृत्यु-भय के हरण हेतु श्रीहरि की साधना एवं शरणागति प्राप्त करनी चाहिए। महापुराण समस्त मनुष्यों को इसी शिक्षा का ज्ञान करता है। यह पुराण वेदों का सार एवं निगम कल्पतरु का अत्यंत परिपक्व फल है। इसका रसपान जीवन पर्यंत करते रहना चाहिए।इस दौरान प्रमुख रूप से डॉक्टर सेन पाठक,असीत पाठक, सुरेश पाठक, विजय राय,भागवत यादव, मनोज तिवारी, महेंद्र राय, राकेश सिंह, कुसुम राय, संध्या आदि मौजूद रहे।
विज्ञापन
मुहम्मदाबाद गोहना ब्लाक क्षेत्र के सुरहुरपुर गांव स्थित राजकुमारी विद्यावती शिक्षण संस्थान में आयोजित सात दिवसीय श्रीमद् भागवत कथा के तीसरे दिन मंगलवार को संत परमहंस स्वामी ज्ञानानंद सरस्वती महाराज ने प्रवचन के दौरान कही। कथा के दौरान श्री स्वामी जी ने महाराज परीक्षित एवं काल कर्मणा तक्षक नाग का उद्धरण देते हुए बताया कि जिन्हें माता की कोख में ही मृत्यु का पता चल गया था। महाराज परीक्षित की माता उत्तरा को श्री हरि की ताप-त्रय-विनाशक रहस्य लीला का ज्ञान था। अत: गर्भस्थ शिशु को तक्षक काल से बचाने हेतु आर्त भाव से श्रीहरि गोविंद की शरण ग्रहण किया। श्रीस्वामी जी मौजूद कथा श्रोताओं को महाराज परीक्षित के जीवन प्रसंग की कथा की चर्चा करते हुए कहा कि जीव शिशु का जन्म नहीं हुआ, लेकिन उसकी मृत्यु ने जन्म ले लिया। इसी प्रकार हमारी शरीर भी धारण करते ही इसकी मृत्यु का जन्म हो जाता है। चाहे वह शरीर माता की कोंख में हो या गोंद में हो। जिस प्रकार महाराज परिक्षित के पास सात दिन थे उसी प्रकार समस्त जीव-धारियों के पास भी सोमवार से रविवार तक सात ही दिन हरिशरण के लिए शेष हैं। यह जो सात दिन मात्र अवधि का निर्धारण किया गया है वह साधना पद है, आठवां दिन कभी नहीं आता है। स्वामी जी ने उक्त रहस्य का वर्णन करते हुए बताया है कि हम सभी प्राणी मात्र को अपनी प्रतिपल हो रही मृत्यु-भय के हरण हेतु श्रीहरि की साधना एवं शरणागति प्राप्त करनी चाहिए। महापुराण समस्त मनुष्यों को इसी शिक्षा का ज्ञान करता है। यह पुराण वेदों का सार एवं निगम कल्पतरु का अत्यंत परिपक्व फल है। इसका रसपान जीवन पर्यंत करते रहना चाहिए।इस दौरान प्रमुख रूप से डॉक्टर सेन पाठक,असीत पाठक, सुरेश पाठक, विजय राय,भागवत यादव, मनोज तिवारी, महेंद्र राय, राकेश सिंह, कुसुम राय, संध्या आदि मौजूद रहे।
विज्ञापन