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भाइयों में संपति नहीं विपति का बंटवारा हो
Updated Mon, 25 Jun 2018 12:52 AM IST
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स्वामी विवेकानंद जी ने अमेरिका में वेद का प्रचार कर अध्यात्म की दिशा में भारत को विश्व का सिरमौर बनाया। जो सच्चा ज्ञानी होता है वहीं समाज में ज्ञान का प्रकाश फैला सकता है। भरत-राम मिलन का प्रसंग सुनाते हुए कथा वाचक ने कहा कि भाइयों में संपत्ति नहीं विपत्ति का बंटवारा होना चाहिए।
उक्त बातें ग्रामसभा चेराराम का पूरा में मंगलवार से हो रहे राम कथा के पाचवें दिन शनिवार की शाम अयोध्या से पधारे कथा वाचक पं. किशोरी शरण जी महराज ने श्रोताओ से कहा। वे राम चरित मानस के भरत राम मिलन प्रसंग की कथा सुना रहे थे।
उन्होंने कहा कि भगवान राम और भाई भरत ने सम्पत्ति का बंटवारा नहीं किया बल्कि विपत्ति का बंटवारा किया। राम भरत मिलन का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि प्रभु राम, भरत को रघुवंश का हंस कह रहे हैं। भरत प्रेम रूपी अमृत के सागर हैं। भरत ने चित्रकूट से राम के चरण पादुका लेकर आए। चरण पादुका को ही सिंहासन पर रखकर भगवान के अयोध्या वापस आने तक राम-राज्य की स्थापना कर डाली। जब हम अपने जीवन मात्र में अपने प्रति तथा भगवान राम के चरित्र पर दृष्टिपात करेंगे तो अनुभव करेंगे कि जीवन में हमारा योगदान शून्य है। भरत से हमें प्रेरणा लेना चाहिए कि त्याग व भक्ति ही सदैव श्रेष्ठ होता है। हम सभी को अपनी योग्यता बढ़ानी होगी। जटायु के प्रसंग को वर्णन करते हुए बताया कि जो दूसरों की सेवा में लगा रहता है उसकी चिंता क्यों न हो उसे हारना पड़ता है और धर्म की विजय होती है। इस दौरान कार्यक्रम के विपिन त्रिपाठी सत्येंद्र त्रिपाठी प्रदीप साधु पंकज तिवारी समीर तिवारी विनोद जी अशोक खरवार आदि मौजूद रहे।
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उक्त बातें ग्रामसभा चेराराम का पूरा में मंगलवार से हो रहे राम कथा के पाचवें दिन शनिवार की शाम अयोध्या से पधारे कथा वाचक पं. किशोरी शरण जी महराज ने श्रोताओ से कहा। वे राम चरित मानस के भरत राम मिलन प्रसंग की कथा सुना रहे थे।
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उन्होंने कहा कि भगवान राम और भाई भरत ने सम्पत्ति का बंटवारा नहीं किया बल्कि विपत्ति का बंटवारा किया। राम भरत मिलन का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि प्रभु राम, भरत को रघुवंश का हंस कह रहे हैं। भरत प्रेम रूपी अमृत के सागर हैं। भरत ने चित्रकूट से राम के चरण पादुका लेकर आए। चरण पादुका को ही सिंहासन पर रखकर भगवान के अयोध्या वापस आने तक राम-राज्य की स्थापना कर डाली। जब हम अपने जीवन मात्र में अपने प्रति तथा भगवान राम के चरित्र पर दृष्टिपात करेंगे तो अनुभव करेंगे कि जीवन में हमारा योगदान शून्य है। भरत से हमें प्रेरणा लेना चाहिए कि त्याग व भक्ति ही सदैव श्रेष्ठ होता है। हम सभी को अपनी योग्यता बढ़ानी होगी। जटायु के प्रसंग को वर्णन करते हुए बताया कि जो दूसरों की सेवा में लगा रहता है उसकी चिंता क्यों न हो उसे हारना पड़ता है और धर्म की विजय होती है। इस दौरान कार्यक्रम के विपिन त्रिपाठी सत्येंद्र त्रिपाठी प्रदीप साधु पंकज तिवारी समीर तिवारी विनोद जी अशोक खरवार आदि मौजूद रहे।
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