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संगीतमय रामकथा सुनकर आनंदित हो गए श्रद्धालु
Updated Mon, 08 Jan 2018 11:53 PM IST
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बढुआ गोदाम। परदहा ब्लाक क्षेत्र के बकवल गांव में चल रही रुद्र चंडी महायज्ञ के छठवें दिन कथावाचक जगदीशाचार्य जी महराज ने राम के मनोहारी रूप का वर्णन किया।
उन्होंने कहा कि नगरवासियों को पता चलता है कि कि दोनों भाई रंगभूमि में आए हैं, तब बालक, जवान, बूढ़े, स्त्री, पुरुष सभी घर और कामकाज को छोड़कर चल दिए। जब जनक जी ने देखा कि बड़ी भीड़ हो गई है, तब उन्होंने सब विश्वासपात्र सेवकों को बुलवा लिया और कहा कि तुम लोग तुरंत सब लोगों के पास जाओ और सब किसी को यथायोग्य आसन दो। उन सेवकों ने कोमल और नम्र वचन कहकर उत्तम, मध्यम, नीच और लघु स्त्री पुरुषों अपने योग्य स्थान पर उसी समय राजकुमार राम और लक्ष्मण वहां आए। वे ऐसे सुंदर हैं, मानो साक्षात मनोहरता ही उनके शरीरों पर छा रही हो। सुंदर सांवला और गोरा उनका शरीर है। वे गुणों के समुद्र, चतुर और उत्तम वीर हैं। वे राजाओं के समाज में ऐसे सुशोभित हो रहे हैं, मानो तारागणों के बीच दो पूर्ण चंद्रमा हों। जिनकी जैसी भावना थी, प्रभु की मूर्ति उन्होंने वैसी ही देखी। महान रणधीर राजा लोग श्रीरामचंद्रजी के रूप को ऐसा देख रहे हैं, मानो स्वयं वीर रस शरीर धारण किए हुए हों। कुटिल राजा प्रभु को देखकर डर गए, मानो बड़ी भयानक मूर्ति हो छल से जो राक्षस वहां राजाओं के वेष में बैठे थे, उन्होंने प्रभु को प्रत्यक्ष काल के समान देखा। नगरवासियों ने दोनों भाइयों को मनुष्यों के भूषण रूप और नेत्रों को सुख देने वाला देखा। स्त्रिया हृदय में हर्षित होकर अपनी-अपनी रुचि के अनुसार उन्हें देख रही हैं। मानो श्रृंगार रस ही परम अनुपम मूर्ति धारण किए सुशोभित हो रहा है। विद्वानों को प्रभु विराट रूप में दिखाई दिए, जिसके बहुत से मुंह, हाथ, पैर, नेत्र और सिर हैं। जनकजी के सजातीय कुटुंबी प्रभु को किस तरह कैसे प्रिय रूप में देख रहे हैं, जैसे सगे सजन (संबंधी) प्रिय लगते हैं। जनक समेत रानियां उन्हें अपने बच्चे के समान देख रही हैं, उनकी प्रीति का वर्णन नहीं किया जा सकता। योगियों को वे शांत, शुद्ध, सम और स्वत: प्रकाश परम तत्व कमे रूप हरिभक्तों ने दोनों भाइयों को सब सुखों को देने वाले इष्टदेव के समान देखा। सीताजी जिस भाव से श्री रामचंद्रजी को देख रही हैं, वह स्नेह और सुख की अनुभूति होती रही हैं विनती करके अपनी कथा सुनाई और मुनि को सारी रंगभूमि (यज्ञशाला) दिखलाई। (मुनि के साथ) दोनों श्रेष्ठ राजकुमार जहां-जहां जाते हैं, वहां-वहां सब कोई आश्चर्यचकित हो देखने लगते हैं श्रद्धालु संगीतमय कथा सुनकर आनंदित हो गए। इस अवसर पर जगन्नाथ सिंह, रमाशंकर सिंह, हरेंद्र सिंह, विष्णु , राजेश कुमार, मुकेश कुमार, श्यामदेव राम,लल्लन सिंह , आदि उपस्थित रहे ।
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उन्होंने कहा कि नगरवासियों को पता चलता है कि कि दोनों भाई रंगभूमि में आए हैं, तब बालक, जवान, बूढ़े, स्त्री, पुरुष सभी घर और कामकाज को छोड़कर चल दिए। जब जनक जी ने देखा कि बड़ी भीड़ हो गई है, तब उन्होंने सब विश्वासपात्र सेवकों को बुलवा लिया और कहा कि तुम लोग तुरंत सब लोगों के पास जाओ और सब किसी को यथायोग्य आसन दो। उन सेवकों ने कोमल और नम्र वचन कहकर उत्तम, मध्यम, नीच और लघु स्त्री पुरुषों अपने योग्य स्थान पर उसी समय राजकुमार राम और लक्ष्मण वहां आए। वे ऐसे सुंदर हैं, मानो साक्षात मनोहरता ही उनके शरीरों पर छा रही हो। सुंदर सांवला और गोरा उनका शरीर है। वे गुणों के समुद्र, चतुर और उत्तम वीर हैं। वे राजाओं के समाज में ऐसे सुशोभित हो रहे हैं, मानो तारागणों के बीच दो पूर्ण चंद्रमा हों। जिनकी जैसी भावना थी, प्रभु की मूर्ति उन्होंने वैसी ही देखी। महान रणधीर राजा लोग श्रीरामचंद्रजी के रूप को ऐसा देख रहे हैं, मानो स्वयं वीर रस शरीर धारण किए हुए हों। कुटिल राजा प्रभु को देखकर डर गए, मानो बड़ी भयानक मूर्ति हो छल से जो राक्षस वहां राजाओं के वेष में बैठे थे, उन्होंने प्रभु को प्रत्यक्ष काल के समान देखा। नगरवासियों ने दोनों भाइयों को मनुष्यों के भूषण रूप और नेत्रों को सुख देने वाला देखा। स्त्रिया हृदय में हर्षित होकर अपनी-अपनी रुचि के अनुसार उन्हें देख रही हैं। मानो श्रृंगार रस ही परम अनुपम मूर्ति धारण किए सुशोभित हो रहा है। विद्वानों को प्रभु विराट रूप में दिखाई दिए, जिसके बहुत से मुंह, हाथ, पैर, नेत्र और सिर हैं। जनकजी के सजातीय कुटुंबी प्रभु को किस तरह कैसे प्रिय रूप में देख रहे हैं, जैसे सगे सजन (संबंधी) प्रिय लगते हैं। जनक समेत रानियां उन्हें अपने बच्चे के समान देख रही हैं, उनकी प्रीति का वर्णन नहीं किया जा सकता। योगियों को वे शांत, शुद्ध, सम और स्वत: प्रकाश परम तत्व कमे रूप हरिभक्तों ने दोनों भाइयों को सब सुखों को देने वाले इष्टदेव के समान देखा। सीताजी जिस भाव से श्री रामचंद्रजी को देख रही हैं, वह स्नेह और सुख की अनुभूति होती रही हैं विनती करके अपनी कथा सुनाई और मुनि को सारी रंगभूमि (यज्ञशाला) दिखलाई। (मुनि के साथ) दोनों श्रेष्ठ राजकुमार जहां-जहां जाते हैं, वहां-वहां सब कोई आश्चर्यचकित हो देखने लगते हैं श्रद्धालु संगीतमय कथा सुनकर आनंदित हो गए। इस अवसर पर जगन्नाथ सिंह, रमाशंकर सिंह, हरेंद्र सिंह, विष्णु , राजेश कुमार, मुकेश कुमार, श्यामदेव राम,लल्लन सिंह , आदि उपस्थित रहे ।
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