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Mathura News: कूनो से 192 किमी दूर बंध बारेठा पहुंचा चीता

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sun, 31 May 2026 12:43 AM IST
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The leopard has reached Bandh Baretha, 192 km from Kuno.
बंध बारैठा में टहलता चीता 
भरतपुर। मध्यप्रदेश के कूनो नेशनल पार्क से निकलकर राजस्थान के करौली और धौलपुर की बीहड़ों से होता हुआ चीता 193 किलोमीटर की दूरी तय कर भरतपुर स्थित बंध बारेठा पहुंच गया है। वन अधिकारियों की टीम लगातार उसकी गतिविधियों पर नजर बनाए हुए है। मध्य प्रदेश वन विभाग की विशेष मॉनिटरिंग टीम भी उसके मूवमेंट को ट्रैक कर रही है।
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डीएफओ चेतन कुमार बीवी ने बताया कि चीता केपी 3 धौलपुर और करौली जिले के जंगलों के रास्ते व वन क्षेत्रों से होते हुए शुक्रवार को बंध बारेठा इलाके में पहुंचा है। यहां शनिवार को एक चीते की पुष्टि हुई है। चीते के गले में लगे सैटेलाइट कॉलर की मदद से उसकी लोकेशन ट्रैक की जा रही है। फिलहाल चीता स्वस्थ है और प्राकृतिक रूप से अपने क्षेत्र का विस्तार करते हुए यहां तक पहुंचा है। डीएफओ ने बताया कि भरतपुर वन विभाग भी पूरी तरह सतर्क है और मध्यप्रदेश की टीम को हर संभव सहयोग दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि चीते की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए क्षेत्र में निगरानी बढ़ा दी गई है। डीएफओ ने बताया कि चीते को कूनो ले जाना है या कुछ समय तक उसे इसी क्षेत्र में रहने देना है, इसका निर्णय मध्यप्रदेश वन विभाग की विशेषज्ञ टीम ही करेगी।
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डीएफओ ने बताया कि बंध बारेठा वाइल्ड लाइफ सेंचुरी में चीते के देखे जाने की पुष्टि हुई है। यह राजस्थान वन विभाग द्वारा अभयारण्य में किए जा रहे वन्यजीव संरक्षण प्रयासों की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। डीएफओ ने बताया कि यह चीता दो साल का है। अमूमन चीता दिन में करीब 30 किलोमीटर चल लेता है। कभी इससे भी ज्यादा चल सकता है। यह मध्यप्रदेश के कूनो नेशनल पार्क से निकलकर अलग अलग रास्तों ,जिलों के जंगलों से होता हुआ भरतपुर के बंध बारैठा पहुंचा है। मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क की दूरी लगभग 193 किलोमीटर के करीब है। यह धौलपुर और करौली के जंगलों में भी कई दिनों तक रुका था। अब भरतपुर के बंध बारेठ में दो दिन हो चुके हैं। बंध बारैठा का वन क्षेत्र प्राकृतिक वन्यजीव आवास के रूप में जाना जाता है। यहां नीलगाय, सांभर, चीतल सहित कई वन्य जीव पाए जाते हैं। वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि पर्याप्त शिकार आधार और अनुकूल वन क्षेत्र होने के कारण चीता यहां तक पहुंच गया है।
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