{"_id":"2-85916","slug":"Mathura-85916-2","type":"story","status":"publish","title_hn":"श्रीकृ ष्ण की अह्लादिनी शक्ति हैं रावल की राधा...","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
श्रीकृ ष्ण की अह्लादिनी शक्ति हैं रावल की राधा...
Mathura
Updated Tue, 02 Sep 2014 05:30 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
दिनेश शर्मा
रावल(मथुरा)। ब्रज क्षेत्र के गांव रावल में विराजी राधारानी भगवान श्रीकृष्ण की अह्लादिनी शक्ति हैं। श्रीराधाकृष्ण दो शरीर और एक प्राण हैं। राधा शक्ति यमुना में कीर्ति जी की तपस्या के बाद कमल पुष्प से पैदा हुई। राधाष्टमी पर राधारानी के गांव रावल में विशेष उत्सव आनंद छा गया है।
मथुरा से 12 किलोमीटर दूर यमुना किनारे बसे ब्रज क्षेत्र के गांव रावल में राधाजी की ननिहाल है। रावल गांव निवासी कीर्तिजी रोजाना तड़के यमुना स्नान करने जाती थीं और उनसे सुपात्र कन्या की मन्नत मांगती। एक दिन तड़के जब कीर्तिजी स्नान के बाद सूर्य देव को अर्घ्य दे रही थीं, तभी यमुना में एक कमल पुष्प प्रकट हुआ। कीर्तिजी के पास आकर कमल पुष्प की पंखुड़ियां खुल गईं और उसमें से एक दिव्य कन्या निकली। बालिका का नाम राधा रखा गया। राधा ने 11 माह 15 दिन तक नेत्र नहीं खोले। श्रीकृष्ण का जन्म होने पर कीर्तिजी बधाई देने के लिए बालिका राधा को लेकर नंदबाबा के यहां गोकुल गईं तो कृष्ण जी के पालना में दर्शन कर राधा बालिका के नेत्र खुल गए। इसका उल्लेख ब्रह्मवृत पुराण में भी मिलता है। तभी से राधा जी के गांव रावल में राधा जन्म की खुशियां उत्सव के साथ मनती रही हैं।
सोमवार को राधारानी मंदिर पर भजन, संकीर्तन और बधाई गायन के कार्यक्रम होते रहे। मंदिर सेवायत ललित मोहन मुखिया ने बताया कि मंगलवार सुबह चार से पांच बजे के बीच जन्म के दर्शन होंगे। सात से आठ बजे तक अभिषेक होगा। दोपहर में बधाई गायन और गौड़ीय मठ से चाव आदि का कार्यक्रम होगा।
विज्ञापन
-------------------------
करील वृक्ष से प्रकट है राधाजी का विग्रह
मथुरा। यमुना किनारे खादर में बसे राधा जी के गांव रावल में करील के वृक्ष से राधाजी के विग्रह की उत्पत्ति बताई जाती है। मंदिर सेवायत ललित मोहन बताया कि संत परमानंद को स्वप्न में आभास हुआ था। वह यहां आए तो एक श्यामा गाय करील के वृक्ष के पास आकर अपने आप दुहने लगी। खोदाई कराने पर वहां राधाजी का सुंदर विग्रह निकला। मंदिर के बीचोंबीच दीवार में चिने उस करील वृक्ष की जड़ें नहीं मिलती हैं। आज तक वह वृक्ष हरा-भरा है। वृक्ष पर धागा बांधकर श्रद्धालु मन्नत मांगते हैं।
------------------
मुगल, अंग्रेजी हुकूमत में भेजा जाता था पैसा
मथुरा। राधारानी के गांव रावल को मुगलकाल और अंग्रेजी शासन काल में महावन तहसील से प्रसाद के लिए सरकारी खजाने से पैसा भेजा जाता था। सेवायत बताते हैं कि मुगलकाल में 1739 मेें वजीर कमरुद्दीन खान के आदेश पर एक रुपया मंदिर के लिए प्रतिदिन आता था। राधाष्टमी पर विशेष इंतजाम होते थे। यह व्यवस्था अंग्रेजी शासन काल तक चली। आजादी के बाद महावन तहसील खत्म हो गई। उसके बाद सब बंद हो गया।
विज्ञापन
रावल(मथुरा)। ब्रज क्षेत्र के गांव रावल में विराजी राधारानी भगवान श्रीकृष्ण की अह्लादिनी शक्ति हैं। श्रीराधाकृष्ण दो शरीर और एक प्राण हैं। राधा शक्ति यमुना में कीर्ति जी की तपस्या के बाद कमल पुष्प से पैदा हुई। राधाष्टमी पर राधारानी के गांव रावल में विशेष उत्सव आनंद छा गया है।
मथुरा से 12 किलोमीटर दूर यमुना किनारे बसे ब्रज क्षेत्र के गांव रावल में राधाजी की ननिहाल है। रावल गांव निवासी कीर्तिजी रोजाना तड़के यमुना स्नान करने जाती थीं और उनसे सुपात्र कन्या की मन्नत मांगती। एक दिन तड़के जब कीर्तिजी स्नान के बाद सूर्य देव को अर्घ्य दे रही थीं, तभी यमुना में एक कमल पुष्प प्रकट हुआ। कीर्तिजी के पास आकर कमल पुष्प की पंखुड़ियां खुल गईं और उसमें से एक दिव्य कन्या निकली। बालिका का नाम राधा रखा गया। राधा ने 11 माह 15 दिन तक नेत्र नहीं खोले। श्रीकृष्ण का जन्म होने पर कीर्तिजी बधाई देने के लिए बालिका राधा को लेकर नंदबाबा के यहां गोकुल गईं तो कृष्ण जी के पालना में दर्शन कर राधा बालिका के नेत्र खुल गए। इसका उल्लेख ब्रह्मवृत पुराण में भी मिलता है। तभी से राधा जी के गांव रावल में राधा जन्म की खुशियां उत्सव के साथ मनती रही हैं।
विज्ञापन
सोमवार को राधारानी मंदिर पर भजन, संकीर्तन और बधाई गायन के कार्यक्रम होते रहे। मंदिर सेवायत ललित मोहन मुखिया ने बताया कि मंगलवार सुबह चार से पांच बजे के बीच जन्म के दर्शन होंगे। सात से आठ बजे तक अभिषेक होगा। दोपहर में बधाई गायन और गौड़ीय मठ से चाव आदि का कार्यक्रम होगा।
विज्ञापन
-------------------------
करील वृक्ष से प्रकट है राधाजी का विग्रह
मथुरा। यमुना किनारे खादर में बसे राधा जी के गांव रावल में करील के वृक्ष से राधाजी के विग्रह की उत्पत्ति बताई जाती है। मंदिर सेवायत ललित मोहन बताया कि संत परमानंद को स्वप्न में आभास हुआ था। वह यहां आए तो एक श्यामा गाय करील के वृक्ष के पास आकर अपने आप दुहने लगी। खोदाई कराने पर वहां राधाजी का सुंदर विग्रह निकला। मंदिर के बीचोंबीच दीवार में चिने उस करील वृक्ष की जड़ें नहीं मिलती हैं। आज तक वह वृक्ष हरा-भरा है। वृक्ष पर धागा बांधकर श्रद्धालु मन्नत मांगते हैं।
------------------
मुगल, अंग्रेजी हुकूमत में भेजा जाता था पैसा
मथुरा। राधारानी के गांव रावल को मुगलकाल और अंग्रेजी शासन काल में महावन तहसील से प्रसाद के लिए सरकारी खजाने से पैसा भेजा जाता था। सेवायत बताते हैं कि मुगलकाल में 1739 मेें वजीर कमरुद्दीन खान के आदेश पर एक रुपया मंदिर के लिए प्रतिदिन आता था। राधाष्टमी पर विशेष इंतजाम होते थे। यह व्यवस्था अंग्रेजी शासन काल तक चली। आजादी के बाद महावन तहसील खत्म हो गई। उसके बाद सब बंद हो गया।