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दिहुली कांडः हाईकोर्ट ने पलटा फांसी का फैसला...एक दोषमुक्त, दो को आजीवन कारावास; 24 दलितों की हुई थी हत्या
Tue, 26 Aug 2025 09:43 PM IST
अरुन पाराशर
संवाद न्यूज एजेंसी, मैनपुरी
संवाद न्यूज एजेंसी, मैनपुरी
Published by: अरुन पाराशर
Updated Tue, 26 Aug 2025 09:43 PM IST
सार
गांव दिहुली में 24 दलितों की सामूहिक हत्या के मामले में तीन दोषियों को फांसी की सजा दी गई थी। हाईकोर्ट ने इस फैसले को पलट दिया है। एक को दोषमुक्त किया गया है, जबकि दो की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया गया गया है।
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कप्तान सिंह, रामपाल और रामसेवक।
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
विस्तार
फिरोजाबाद के जसराना के गांव दिहुली (पूर्व में मैनपुरी का हिस्सा) में 18 नवंबर 1981 को हुई 24 दलितों की सामूहिक हत्या में मैनपुरी की एडीजे डकैती द्वारा तीन दोषियों को सुनाई फांसी की सजा का फैसला हाईकोर्ट ने पलट दिया है। हाईकोर्ट की कोर्ट संख्या 44 ने अपने फैसले में रामपाल को सभी आरोपों से दोषमुक्त करते हुए बरी कर दिया है, जबकि कप्तान सिंह और रामसेवक की फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया गया है। वर्तमान में तीनों आरोपी सेंट्रल जेल, आगरा में बंद हैं।
हाईकोर्ट में बचाव पक्ष की ओर लगातार दो सप्ताह तक बहस की गई। दलीलों में कई अहम बिंदुओं को उठाया गया। बचाव पक्ष के अनुसार रामपाल पर अभियोजन पक्ष ने घटना के बाद आरोपियों को खाना खिलाने का आरोप लगाया था, जबकि कप्तान सिंह पर घटना में सीधे तौर पर शामिल होने का आरोप था। हाईकोर्ट में यह तर्क दिया गया कि सेशन कोर्ट ने रामपाल को 302 (हत्या) की धारा में बिना आरोप तय किए ही सजा दे दी थी। साथ ही उन्होंने पुलिस द्वारा बरामद की गई बंदूकों की एफएसएल रिपोर्ट का न होना, कुछ गवाहों की गवाही का संदिग्ध होना, और घटना के समय गांव में बिजली न होने जैसी परिस्थितियां को उजागर किया।
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हाईकोर्ट में बचाव पक्ष की ओर लगातार दो सप्ताह तक बहस की गई। दलीलों में कई अहम बिंदुओं को उठाया गया। बचाव पक्ष के अनुसार रामपाल पर अभियोजन पक्ष ने घटना के बाद आरोपियों को खाना खिलाने का आरोप लगाया था, जबकि कप्तान सिंह पर घटना में सीधे तौर पर शामिल होने का आरोप था। हाईकोर्ट में यह तर्क दिया गया कि सेशन कोर्ट ने रामपाल को 302 (हत्या) की धारा में बिना आरोप तय किए ही सजा दे दी थी। साथ ही उन्होंने पुलिस द्वारा बरामद की गई बंदूकों की एफएसएल रिपोर्ट का न होना, कुछ गवाहों की गवाही का संदिग्ध होना, और घटना के समय गांव में बिजली न होने जैसी परिस्थितियां को उजागर किया।
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सबसे महत्वपूर्ण दलील यह थी कि यह केस दस्यु प्रभावित क्षेत्र अधिनियम से संबंधित था, जिसके लिए सुनवाई हेतु विशेष जज और विशेष कोर्ट का नामित होना अनिवार्य होता है। लेकिन, 1998 के बाद इस केस की सुनवाई के लिए किसी भी जज को विधिवत नामित नहीं किया गया था, जिसके कारण 1998 से लेकर अब तक की समस्त कार्यवाही को कानूनी रूप से शून्य माना गया।
उम्रकैद की सजा को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का ऐलान
अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा (ब्रज प्रदेश) के प्रदेश अध्यक्ष अधिवक्ता दलवीर सिंह तोमर ने एक बयान जारी कर कहा है कि जिन रामसेवर और कप्तान की फांसी की सजा को उच्च न्यायालय ने आजीवन कारावास में बदला है। उम्रकैद की सजा को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाएगी।
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उम्रकैद की सजा को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का ऐलान
अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा (ब्रज प्रदेश) के प्रदेश अध्यक्ष अधिवक्ता दलवीर सिंह तोमर ने एक बयान जारी कर कहा है कि जिन रामसेवर और कप्तान की फांसी की सजा को उच्च न्यायालय ने आजीवन कारावास में बदला है। उम्रकैद की सजा को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाएगी।
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18 मार्च को एडीजे विशेष डकैती मैनपुरी कोर्ट से सुनाई गई थी फांसी की सजा
रामपाल, कप्तान और रामसेवर को 18 मार्च 2025 को एडीजे विशेष डकैती मैनपुरी कोर्ट से दोषी करार देते हुए फांसी की सजा सुनाई थी। कप्तान सिंह, रामसेवक को दो-दो लाख और रामपाल को एक लाख रुपये के जुर्माने से भी दंडित किया गया था।
रामपाल, कप्तान और रामसेवर को 18 मार्च 2025 को एडीजे विशेष डकैती मैनपुरी कोर्ट से दोषी करार देते हुए फांसी की सजा सुनाई थी। कप्तान सिंह, रामसेवक को दो-दो लाख और रामपाल को एक लाख रुपये के जुर्माने से भी दंडित किया गया था।