{"_id":"1-85298","slug":"Mainpuri-85298-1","type":"story","status":"publish","title_hn":"18 साल में पूरी हुई अंतिम यात्रा, शहीद पंचतत्व में विलीन","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
18 साल में पूरी हुई अंतिम यात्रा, शहीद पंचतत्व में विलीन
Mainpuri
Updated Fri, 22 Aug 2014 05:30 AM IST
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किशनी (मैनपुरी)। शहीद गयाप्रसाद का शव उनके पैतृक गांव कुड़रिया समान में पहुंचने के बाद बुधवार की रात लोगों ने जागकर गुजारी। शहीद के घर विलाप था तो लोगों की आंखों में नहीं नहीं थी। गुरुवार पूर्वान्ह शहीद गयाप्रसाद को सैनिकों की टुकड़ी सलामी दी। 18 साल बाद उनके बेटे सतीश ने मुखाग्नि का फर्ज पूरा किया तो वहां मौजूद लोगों की आंखें भी भर आई। इस दौरान सेना के अधिकारियों के अलावा हजारों की संख्या में मौजूद लोगों ने उन्हें अंतिम विदाई दी।
बुधवार रात 11.05 बजे सेना के जवान शहीद गयाप्रसाद का शव लेकर गांव पहुंचे। शव देख परिवारीजनों की आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली। सुबह पौ फटते ही बड़ी संख्या में लोग शहीद के दर्शन करने के लिए पहुंचने लगे। दस बजे तक हजारों की संख्या में लोग दर्शन कर गांव में मौजूद थे। सवा दस बजे बिग्रेडियर सलीम आसिफ और कर्नल टीकेएस सेकुल के आने के बाद शवयात्रा शुरू हुई। सेना की विशेष टुकड़ी के जवान ताबूत लेकर अंतिम संस्कार वाले स्थान तक पहुंचे। वहां सेना के अधिकारियों और जवानों ने शहीद को श्रद्धांजलि दी। जवानों ने शास्त्र उलटे कर सलामी दी। इस दौरान सेना के बैंड के सदस्यों ने मातमी धुन बजाई। शहीद के बेटे सतीश ने 10.55 मिनट पर मुखाग्नि दी। इस दौरान जबरदस्त गरमी के बाद भी हजारों की संख्या में लोग मौके पर आसपास स्थित मकानों की छत पर मौजूद रहे। इनमें विभिन्न जनप्रतिनिधियों के अलावा पूर्व सैनिक और विभिन्न संगठनों के सदस्य भी शामिल थे।
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लाइव के लिए लगा मीडिया का जमावाड़ा
किशनी। कुड़रिया समान में बुधवार देर रात से ही मीडिया ने डेरा जमा लिया। विभिन्न चैनलों की आधा दर्जन से अधिक ओबी वैन गांव में पहुंची। सुबह से ही उनके संवाददाताओं ने गांव की स्थिति और अन्य क्रियाकलापों का रुक-रुक कर सीधा प्रसारण किया। अंतिम संस्कार के दौरान भी सभी चैनलों पर लाइव प्रसारण किया गया।
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जांबाज सिपाही थे गयाप्रसाद
किशनी। गयाप्रसाद के संग कार्य करने वाले रिटायर्ड सूबेदार बादशाह सिंह ने बताया कि वह काफी दिलेर व्यक्ति थे। किसी कार्य को करने में उन्होंने कभी हिचक महसूस नहीं की। जयपुर से आए रिटायर्ड कर्नल बलवीर पाठक ने बताया कि 1996 में वह गया प्रसाद की प्लाटून के कमांडर थे। उसने उनके साथ काफी लंबे समय तक कार्य किया। रिटायर्ड कर्नल ने बताया कि गयाप्रसाद काफी बहादुर सिपाही था। उसके बहादुरी भरे कारनामों के लिए कई मेडल भी मिले थे। गयाप्रसाद के समय के संस्मरण सुनाते समय उनकी आंखें भर आईं।
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अव्यवस्थाएं हावी, पानी के तरसे जवान
किशनी। तमाम दावों के बाद भी गांव में पूरे समय अव्यवस्थाएं हावी रहीं। न तो लोगों के बैठने के लिए ही जिला प्रशासन पर्याप्त इंतजाम कर सका और न ही पेयजल आदि की ही कोई व्यवस्था थी। शव लेकर आए सेना के अधिकारियों और जवानों के रुकने का भी पर्याप्त इंतजाम नहीं था। अंतिम संस्कार के बाद सेना के जवान पानी के लिए भटकते रहे। प्राथमिक स्कूल के अध्यापकों ने सेना के जवानों को पानी पिलाया। हालांकि बाद में नगर पंचायत किशनी का एक टैंकर पानी लेकर गांव पहुंचा। अंतिम संस्कार के दौरान अधिकारी अपने आराम की चिंता करते रहे। गुरुवार की सुबह गांव पहुंचे एसडीएम भोगांव शहीद के घर के बाहर पंखा लगवाकर उसके सामने बैठ गए। यह पंखा चलता रहे इसके लिए इसका कनेक्शन जनरेटर से था। वहीं शहीद के घर में बैठी महिलाओं और सेना के जवानों तक के लिए पंखे आदि की कोई व्यवस्था नहीं थी। इसको लेकर गांव के लोगों में आक्रोश दिखा।
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उमड़ा जन सैलाब
किशनी। शहीद गयाप्रसाद की अंतिम यात्रा में शामिल होने के लिए रिश्तेदारों और गांव वालों के अलावा आसपास के गांवों के भी लोग हजारों की संख्या में शामिल हुए। अंतिम संस्कार के समय आलम यह था कि खेतों में दूर-दूर तक लोग ही नजर आ रहे थे। यहां तक कि लोग पेड़ों पर भी चढ़ गए। ताकि उन्हें दूर से अंतिम संस्कार होता नजर आए। इसके अलावा घरों की छतों से भी बड़ी संख्या में महिलाएं अंतिम संस्कार को देख रही थीं।
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बुधवार रात 11.05 बजे सेना के जवान शहीद गयाप्रसाद का शव लेकर गांव पहुंचे। शव देख परिवारीजनों की आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली। सुबह पौ फटते ही बड़ी संख्या में लोग शहीद के दर्शन करने के लिए पहुंचने लगे। दस बजे तक हजारों की संख्या में लोग दर्शन कर गांव में मौजूद थे। सवा दस बजे बिग्रेडियर सलीम आसिफ और कर्नल टीकेएस सेकुल के आने के बाद शवयात्रा शुरू हुई। सेना की विशेष टुकड़ी के जवान ताबूत लेकर अंतिम संस्कार वाले स्थान तक पहुंचे। वहां सेना के अधिकारियों और जवानों ने शहीद को श्रद्धांजलि दी। जवानों ने शास्त्र उलटे कर सलामी दी। इस दौरान सेना के बैंड के सदस्यों ने मातमी धुन बजाई। शहीद के बेटे सतीश ने 10.55 मिनट पर मुखाग्नि दी। इस दौरान जबरदस्त गरमी के बाद भी हजारों की संख्या में लोग मौके पर आसपास स्थित मकानों की छत पर मौजूद रहे। इनमें विभिन्न जनप्रतिनिधियों के अलावा पूर्व सैनिक और विभिन्न संगठनों के सदस्य भी शामिल थे।
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लाइव के लिए लगा मीडिया का जमावाड़ा
किशनी। कुड़रिया समान में बुधवार देर रात से ही मीडिया ने डेरा जमा लिया। विभिन्न चैनलों की आधा दर्जन से अधिक ओबी वैन गांव में पहुंची। सुबह से ही उनके संवाददाताओं ने गांव की स्थिति और अन्य क्रियाकलापों का रुक-रुक कर सीधा प्रसारण किया। अंतिम संस्कार के दौरान भी सभी चैनलों पर लाइव प्रसारण किया गया।
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जांबाज सिपाही थे गयाप्रसाद
किशनी। गयाप्रसाद के संग कार्य करने वाले रिटायर्ड सूबेदार बादशाह सिंह ने बताया कि वह काफी दिलेर व्यक्ति थे। किसी कार्य को करने में उन्होंने कभी हिचक महसूस नहीं की। जयपुर से आए रिटायर्ड कर्नल बलवीर पाठक ने बताया कि 1996 में वह गया प्रसाद की प्लाटून के कमांडर थे। उसने उनके साथ काफी लंबे समय तक कार्य किया। रिटायर्ड कर्नल ने बताया कि गयाप्रसाद काफी बहादुर सिपाही था। उसके बहादुरी भरे कारनामों के लिए कई मेडल भी मिले थे। गयाप्रसाद के समय के संस्मरण सुनाते समय उनकी आंखें भर आईं।
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अव्यवस्थाएं हावी, पानी के तरसे जवान
किशनी। तमाम दावों के बाद भी गांव में पूरे समय अव्यवस्थाएं हावी रहीं। न तो लोगों के बैठने के लिए ही जिला प्रशासन पर्याप्त इंतजाम कर सका और न ही पेयजल आदि की ही कोई व्यवस्था थी। शव लेकर आए सेना के अधिकारियों और जवानों के रुकने का भी पर्याप्त इंतजाम नहीं था। अंतिम संस्कार के बाद सेना के जवान पानी के लिए भटकते रहे। प्राथमिक स्कूल के अध्यापकों ने सेना के जवानों को पानी पिलाया। हालांकि बाद में नगर पंचायत किशनी का एक टैंकर पानी लेकर गांव पहुंचा। अंतिम संस्कार के दौरान अधिकारी अपने आराम की चिंता करते रहे। गुरुवार की सुबह गांव पहुंचे एसडीएम भोगांव शहीद के घर के बाहर पंखा लगवाकर उसके सामने बैठ गए। यह पंखा चलता रहे इसके लिए इसका कनेक्शन जनरेटर से था। वहीं शहीद के घर में बैठी महिलाओं और सेना के जवानों तक के लिए पंखे आदि की कोई व्यवस्था नहीं थी। इसको लेकर गांव के लोगों में आक्रोश दिखा।
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उमड़ा जन सैलाब
किशनी। शहीद गयाप्रसाद की अंतिम यात्रा में शामिल होने के लिए रिश्तेदारों और गांव वालों के अलावा आसपास के गांवों के भी लोग हजारों की संख्या में शामिल हुए। अंतिम संस्कार के समय आलम यह था कि खेतों में दूर-दूर तक लोग ही नजर आ रहे थे। यहां तक कि लोग पेड़ों पर भी चढ़ गए। ताकि उन्हें दूर से अंतिम संस्कार होता नजर आए। इसके अलावा घरों की छतों से भी बड़ी संख्या में महिलाएं अंतिम संस्कार को देख रही थीं।